फ़ीजी में हिन्दी

दक्षिण प्रशांत महासागर में, ऑस्ट्रेलिया के पूरब, भारत से बाहर तेरह हज़ार किलोमीटर दूर, फ़ीजी द्वीप समूह स्थित है। एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की भांति, फ़ीजी का इतिहास यूरोप के इतिहास से जुड़ा है। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में, पूरब के सस्ते मसालों के व्यापार के लिए यूरोप के देशों में आरंभ हुई होड़ उपनिवेशों के लिए संघर्ष बन गई।

समय के अंतराल से फ़ीजी द्वीप समूह पर ब्रितानी सत्ता स्थापित हो गई। इतिहास की अप्रत्याशित घटना। आपस में ही एक दूसरे से लड़ने वाले फ़ीजी के मूल निवासियों (काईवीती) के कबीलों के सरदारों ने फ़ीजी द्वीप समूह स्वयं ही ब्रितानी सरकार को समर्पित कर दिया- 10 अक्तूबर 1874 को। भाग्य की बात कि 1875 में एक अंग्रेजी लड़ाकू जहाज फ़ीजी के बन्दरगाह में चेचक की महामारी लेकर आया, जिसने मूल फीजीवासियों की संख्या एक तिहाई कर दी। गोरों के खेतों पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या अचानक कम हो गई। उनकी आर्थिक क्षति के परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन गवर्नर सर आर्थर हेमिल्टन गॉर्डन ने भारत से शर्तबंद मज़दूर लाने की प्रथा का श्री गणेश किया। दास व्यापार में यूरोपवासी पिछली तीन-चार शताब्दियों में काफी महारत हासिल कर चुके थे। फिर माननीय गवर्नर महोदय तो पहले मॉरीशस के गवर्नर भी रह चुके थे, जहां भारत से शर्तबंद मजदूर लाने का उनको अनुभव हो चुका था। मानव-व्यापार का नवीन अध्याय उन्हांेने फ़ीजी में भी प्रारम्भ किया, जिसके फलस्वरूप 1879 में ‘‘लेओनीदास’’ नामक जहाज़ में भारत के शर्तबंद मज़दूरों का पहला दल फ़ीजी में उतारा गया। फिर तो हर साल भारत से आने वाले जहाज़ फ़ीजी में सैंकड़ों भारतीय लाने लगे, जब तक यह प्रथा 1917 में बंद नहीं हुई।

अड़तीस वर्षों में लगभग 61000 भारतीय शर्तबंद मज़दूर फ़ीजी लाये गये। यह मज़दूर ब्रिटिश सरकार द्वारा एक ‘‘एग्रीमेंट’’ (समझौते) के अंदर लाए जाते थे, जिसे वे ‘‘गिरमिट’’ (एग्रीमेंट का अपभ्रंश) कहते थे। गिरमिट के पांच साल काटने के बाद अधिकांश फ़ीजी के ही हो के रह गए। केवल 10-15 प्रतिशत वापस गए।

गिरमिटया का प्रारम्भिक इतिहास श्रम, यातना, पीड़ा, क्लेश, आँसू, बीमारी और मौत का इतिहास है। साथ ही, गिरमिट का इतिहास संघर्ष, संकल्प, दृढ़ निश्चय और विजय का इतिहास है। भारतीय श्रम ने विषम और विषैली परिस्थितियों में भी फ़ीजी की धरती को अपने खून और पसीने से सींच कर सोना बना दिया। वह काम जिसे गोरे नहीं कर सके थे, जिसे प्रशांत महासागर के अन्य द्वीपों से लाये द्वीपवासी नहीं कर पाये, जिसे चीन से लाये गए मज़दूर नहीं कर पाये, उसे भारतीयों ने कर दिखाया। जिस धरती का चन्दन वृक्ष निकाल कर गोरों ने सुगंध विहीन कर दिया था, वह मीठे गन्नों से लहलहा उठी।

गिरमिट की झंझा ने भारतवंशियों की जात-पांत, परिवार-परंपरा आदि को तोड़कर चकनाचूर कर दिया। किन्तु हर विघटन में नई रचना के तत्व छिपे होते हैं। ब्राह्मण, ठाकुर, अहीर, बनिया, कुरमी, रैदास, पासी, बढ़ई, सुनार-सब मिलकर एक हो गए। भारत का जाति-विहीन समाज का सपना, भारत से इतनी दूर फ़ीजी में साकार हुआ।

फ़ीजी-बात

भारत का दूसरा सपना, एक भाषा का सपना भी साकार हुआ फ़ीजी में। गिरमिट के अंतर्गत प्रायः सभी प्रांतो से भारतवासी फ़ीजी आये। किन्तु सर्वाधिक संख्या में गिरमिट पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार से आये, अतएव अवधी और भोजपुरी की मिली-जुली बोली फ़ीजी में बोली जाने लगी। बाद में जब अपेक्षाकृत कम संख्या में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बंगाल आदि प्रदेशों से गिरमिटिए आए, तो उन्हांेने फ़ीजी में पहले से बोली जा रही अवधी/भोजपुरी को अपना लिया। आज भारतवंशियों में से यह बताना कठिन है कि किसके पूर्वज हिन्दी प्रदेश से आए थे, और किसके अहिंदी प्रदेश से।

कालान्तर में अवधी और भोजपुरी में साहिबी हिन्दी, अंग्रेजी और काइवाती शब्दों और मुहावरों का समावेश हो गया। इस प्रकार अवधी, भोजपुरी, साहिबी हिन्दी, अंग्रेजी और काइवीती के घोल-मेल से जो भाषा विकसित हुई, उसे भारतवंशी फ़ीजी-बात (फ़ीजी-हिन्दी) कहते हैं। यही उनकी मातृभाषा है। वे आपस में तथा परिवार में इसी भाषा का प्रयोग करते हैं।


फ़ीजी-बात में अवधी तथा भोजपुरी तत्व

फ़ीजी-बात नब्बे-पच्चानवें प्रतिशत अवधी और भोजपुरी का मिला जुला रूप ही है। भारतवंशी घर पर तथा मित्रों में आपसी वार्तालाप के लिए फ़ीजी-बात का ही प्रयोग करते हैं, लेकिन सभी औपचारिक अवसरों पर - अखबारों तथा रेडियों पर, पठन-पाठन के लिए खड़ी बोली (मानक हिन्दी) का प्रयोग करते हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे आज भी अधिकांश भारत के हिन्दीभाषी क्षेत्रों में पाई जाती है। उदाहरण के लिए आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के फै़जाबाद, सुल्तानपुर, सीतापुर, गाज़ीपुर, बनारस आदि जिलों के घरों में प्रायः अवधी या भोजपुरी बोली जाती है, किन्तु घरों के बाहर, दफ़्तरों में, अख़बारों में, स्कूलों में खड़ी बोली का प्रयोग किया जाता है।

फ़ीजी-बात की अधिकांश शब्दावली भोजपुरी/अवधी की ही देन है। उदाहरण के लिए, नगीच (नजदीक), घरे (घर पर), मुरहा (बदमाश), भिनसारे (दूसरे दिन सुबह), केरा (केला), बहिनी (बहन), जून (वक्त), गटई (गला), गोड़ (पैर), मूड़ (सिर), पलवार (परिवार) आदि फ़ीजी बात के शब्द अवधी/भोजपुरी की ही देन है। फ़ीजी-बात की वाक्य संरचना तथा क्रियाएं भी अवधी/भोजपुरी पर आधारित हैं।

भारत से दूर और निरंतर संपर्क के अभाव में, पिछले सौ वर्षों में अनेक हिन्दी शब्दों के अर्थ बदल गए हैं। जैसे बिहान का हिन्दी में अर्थ सुबह है, किन्तु फ़ीजी-हिन्दी में इसका अर्थ आने वाला कल हो जाता है। हिन्दी में कहेंगे- ‘‘मैं कल जा सकूँगा’’, तो फ़ीजी-हिन्दी में कहेंगे-‘‘हम बिहान जाए सकेगा’’। इसी प्रकार कल शाम को ‘‘बिहान सांझ के’’ कहेंगे। हिन्दी के ‘‘क्या’’ शब्द के लिए फ़ीजी-हिन्दी में ‘‘कौनची’’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। जैसे -‘‘ऊ बेग (थैले) में कौनची (क्या) है?’’ कौनची फ़ीजी-हिन्दी की अपनी विशेषता और आविष्कार है।


फ़ीजी-बात: साहिबी हिन्दी

भारत में अंग्रेजों ने डेढ़-दो सौ साल हुकूमत की और इसके कारण ‘‘मैन तुम कहाँ जाता?’’, ‘‘क्या मांगता?’’ आदि गोरेशाही हिन्दी के नमूनो से सब परिचित हैं। फ़ीजी में गिरमिटिया मजदूर को अंग्रेज़ ‘‘कोलंबरो’’ (ओवरसियरों) के साथ काम करना पड़ता था, अतएव उनकी बोलचाल में साहिबी हिन्दी के ये तत्व भी आ गये। तोताराम सनाढ्य अपनी पुस्तक ‘‘फ़ीजी में मेरे इक्कीस वर्ष’’ के पृष्ठ 21 पर उल्लेख करते हैं: गोरा कोठी वाल कहता है- ‘‘चला जाओ। खेत का बात हम सुनना नहीं मांगता।’’ इसी प्रकार वह पृष्ठ 62 पर लिखते हैं कि जब उन्होने ग़ैर-जात वालों के साथ एक ही कोठरी में रहने पर आपत्ति की, तो गोरा ओवरसियर बोला- ‘‘हम नहीं जानता। वहीं रहना होगा।’’ उस समय भारतीय मजदूरों से काम लेने के लिए अधिकांश गोरे ओवरसियर टूटी-फूटी हिन्दी बोलते थे। उनके प्रभाव से गिरमिटियों की भाषा में ‘‘आता’’ ‘‘जाता’’ ‘‘जानता’’ ‘‘मांगता’’ इत्यादि शब्द जुड़ गये। उदाहरण के लिए फ़ीजी-हिन्दी में कहा जाएगा- ‘‘हम लोग मांगता, सुवा देखे’’ या ‘‘ऊ केरा खाये मांगे।’’ (हम सूवा देखना चाहते हैं। वह केला खाना चाहता है।)

फ़ीजी-बात: अंग्रेजी तत्व

साहिबी हिन्दी के अतिरिक्त फ़ीजी-हिन्दी में बहुत से अंग्रेजी शब्द आ गये हैं - जैसे बुल (बैल), गरास (घास), किचेन (रसोईघर), माकेट (बाज़ार), पाकेट (जेब), रैट (सही), बेग (थैला) आदि, जिनका वे हिन्दी शब्दों के समान ही बोलने में प्रयोग करते हैं।


फ़ीजी-बात: काईवीती तत्व

पिछले सवा सौ सालों से फ़ीजी में भारतीय और काईवीती (फ़ीजी के मूल निवासी) एक साथ रह रहें हैं। इससे यह अपेक्षित है कि फ़ीजी-हिन्दी में काईवीती भाषा के अनेक शब्दों का समावेश हुआ होगा। किन्तु ऐसा नहीं है। इसका कारण यह है कि अंग्रेज स्वामी गिरमिट प्रथा के दौरान भारतीय मजदूरों और काइवीतियों को एक दूसरे से दूर रखते थे। उन्हे ये डर था कि कहीं इन दोनों के संबंध घनिष्ठ हो गए, तो फ़ीजी में उनके आधिपत्य की अवधि कम हो जाएगी। इसलिए अगर कोई गिरमिटिया अपनी लाइंस (जहां वह रखे जाते थे) से निकाल कर किसी काइवीती ‘कोरो’ (गाँव) में चला जाता था, तो उसे सज़ा दी जाती थी। बाद में जब अंग्रेजों ने फीजी में स्कूल खोले तो भारतवंशियों के लिए अलग और काइवीतियों के लिए अलग। सन् 1937 में भारत से श्री हृदय नाथ कुंजरू फ़ीजी गए तो वहां की शिक्षा प्रणाली देख कर चकित रह गये। उन्होंने लिखा - ‘‘हवाई और फ़ीजी की शिक्षा प्रणालियों में कितना अंतर है। फ़ीजी में भारतीय और काईवीती हर स्तर पर अलग-अलग रखे जाते हैं।’’ औपनिवेशिक सरकार के प्रयत्न के बावजूद भारतवंशी और काइवीती न्यूनाधिक संपर्क में आये और काईवीती भाषा के कुछ शब्द फ़ीजी-हिन्दी में आ गये हैं, जिनका प्रयोग भारतवंशी अपने शब्दो के समान ही करते हैं। ‘तलनुआ’ (बतियाना गपशप करना इत्यादि), ‘कैरे-कैरे’ (एक दूसरे की चीज को अपनी समझ कर ले लेना), नगोना (एक काइवीती मादक पेय), ‘तदीन’ (युवती), ‘तिनाना’ (माँ), ‘नाइस बोला’ (सुंदर स्त्री), ‘तबाले’ (साला या बहनोई), ‘कसो’ (शराब में धुत्त या शराब पीना-पिलाना) ‘नंगारी’ (केकड़ा) आदि।

और अब फ़ीजी-हिन्दी का एक नमूना: ‘‘बकन्दुआ’’ काईवीती भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है हाय गज़ब! हाय सत्यानाश! ‘‘गोड़वा’’ (पैर) अवधी और भोजपुरी का शब्द है। ‘‘नेलुआ’’ अंग्रेजी शब्द ‘‘नेल’’ (कील) का विकृत रूप है। इस तरह अंग्रेजी काइवीती तथा अवधी/भोजपुरी के घोलमेल से फ़ीजी-बात का वाक्य बना- ‘‘बकन्दुआ, गोड़वा में नेलुआ गढ़ गवा’’ (हाय सत्यानाश! पैर में कील लग गई)

गिरमिट के सुख दुःख के अभिव्यक्ति की भाषा

फ़ीजी-बात भारतीय गिरमिट के संघर्ष और बाद में उनकी विजय की साक्षी रही है। जब अपार संकट के क्षणों में गिरमिट गहन निराशा में डूब गए, या जब निराशा की घटाटोप कालिमा में उन्होने आशा की रजत-रेखा देखी: सब ही भावों में, सब ही परिस्थितियों में, उन्होंने अभिव्यक्ति के लिए फ़ीजी-बात का सहारा लिया।

गिरमिट में गए भारतीय मजदूरों का जीवन गन्ने के खेतों पर काम करने के बाद एक छोटी सी कोठरी तक सीमित रहा गया था। तब फ़ीजी-बात के अज्ञात कवि ने मुख से उनकी घुटन और छटपटाहट फूट पड़ीः-

सब सुखखान सी. एस. आर. की कोठरिया

छह फुट चौड़ी, आठ फुट लंबी

उसी में धरी है कमाने की कुदरिया

उसी में सिल और उसी में चूल्हा

उसी में धरी है जलाने की लकड़ियां

उसी में महला उसी में दो महला

उसी में बनी है सोने की अटरिया।

या फिर:-

सब दुखखान सी. एस. आर. की कोठरिया

यही में खाना यही में सोना यही में बहत पनरिया

पास कड़ा सरदरवा देवे सर पर हनत कुदरिया

मूड़ फटत है देह दुखत है टूटी जात कमरिया।

किसी कवि ने बहुतश्रुत दोहे की पैरोडी बनाकर अपना दुःख व्यक्त किया:-

जो मैं ऐसा जानती फीजी आए दुःख होय

नगर ढिंढोरा पाटती फीजी न जइयो कोय।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोकगायन शैली बिदेसिया का भारतीय मजदूरों ने फीजीकरण कर दिया:-

खून पसीने से सीचे हम बगिया

बैठा बैठा हुकुम चलाये रे बिदेसिया

भारतीय मज़दूर को ‘‘आरकाटी’’ (भरती एजेंट) धोखा देकर फीजी ‘‘गिरमिट’’ बनाकर लाते थे। इन आरकाटियों के प्रति आक्रोश भी फ़ीजी-बात में प्रकट हुआ:-

मर जा भरती वारो

मेरी सूनी कर दी सेजरिया।

लगभग डेढ़ सौ वर्षो में फ़ीजी-बात, फ़ीजी के भारतवशियों की अभिन्न पहचान बन गयी है। वह उनके आपसी सम्प्रेषण का एकमात्र माध्यम है। वह खड़ी बोली का प्रयोग सयास करते हैं, किन्तु फ़ीजी-बात उनके मुख से सहज प्रस्फुटित होती है। खड़ी बोली यदि उनके मस्तिष्क से उपजती है, तो फ़ीजी बात का उद्गम उनके हृदय में है। फ़ीजी बात वह भाषा है, जिससे माँ अपने नवजात शिशु पर ममता उंडेलती है, पिता अपने पुत्र को जीवन-मार्ग के अवरोधों से सावधान करता है, प्रेमी-प्रेमिका की आँखो-आँखो में बात होती है और वृद्धजन अपनी आयु की परिवक्वता में अपनेे अनुभव बखानतेें हैैं।


मानक हिन्दी

फ़ीजी में सभी औपचारिक अवसरों पर खड़ी बोली का प्रयोग होता है। विद्यालयों में सबसे छोटी कक्षा से ही खड़ी बोली में शिक्षा दी जाती है। रेडियो फ़ीजी की भाषा खड़ी बोली है। रेडियो उद्घोषक कार्यक्रमों की घोषणा और संचालन खड़ी बोली में ही करते हैं। वार्ताएं, साक्षात्कार, विचार-विमर्श, विवेचन, परिचर्चा, व्यवसायिक-विज्ञापन, आदि सभी खड़ी बोली में होते हैं। जैसे भारत में आकाशवाणी पर कुछ सीमित अवधि में ग्रामीण भाइयों के लिए स्थानीय लोकभाषा में कार्यक्रम होते हैं, वैसे ही ‘रेडियो फ़ीजी’ पर भी किसानो और ग्रामीणो के लिए एक दो घंटे फ़ीजी-हिन्दी में लोकगीतों आदि के लिए भी निश्चित हैं, किन्तु इन कार्यक्रमों का संचालन मानक हिन्दी में होता है।

खड़ी बोली धार्मिक प्रवचनों की भी भाषा है। भारत से फ़ीजी जाने वाले धर्म प्रचारक खड़ी बोली का प्रयोग करते हैं। धार्मिक साहित्य भी खड़ी बोली में ही उपलब्ध होता है। इसलिए चाहे आर्य समाज का आयोजन हो, या मंदिर में सनातन धर्मी प्रवचन, सभी जगह खड़ी बोली का प्रयोग होता है। सिख धर्मानुयायी, पिछली चार-पाँच पीढ़ियों में हिन्दी भाषियों से घुल-मिल कर हिन्दी में बोलने लगे हैं; प्रायः पंजाबी नहीं बोल पाते। अतएव गुरुद्वारों में भी खड़ी बोली ही चलती है। मस्जिदों में भी खड़ी बोली का प्रयोग होता है।

भारतवंशियों में हिन्दी अभी भी जीवित है, इसके लिए बहुत श्रेय हिन्दी फिल्मों को भी जाता है। हिन्दी फिल्मों का इंद्रधनुषी जादू ऐसा है कि अहिंदी भाषियों तक को सम्मोहित कर देता है, फिर इससे भारतवंशी कैसे बचते। फिल्मों के माध्यम से ही भारतवंशी अपनी मातृभूमि से भावात्मक संबंधो को जीवंत रखने में सफल हुये हैं। फिल्मों के माध्यम से ही भरतवंशी महिलाएं नवीनतम फैशन से अवगत होती हैं। जूड़ा और साड़ी बांधने के नवीनतम तरीके सीखती हैं। हिन्दी फिल्मों के माध्यम से खड़ी बोली एक मोहक, चित्ताकर्षक कलेवर में प्रस्तुत हुई, जिसके जादू से भारतवंशी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। फिल्मों के माध्यम से भारतवंशी खड़ी बोली के संपर्क में तो रहे ही, इससे उन्हे मानक हिन्दी पर अधिकार प्राप्त करने की प्रेरणा भी मिली।

आर्य समाज के प्रयत्नों से पिछली शताब्दी के दूसरे दशक में अनेक मेधावी बालक एवं बालिकाएँ भारत गुरुकुल में पढ़ने गए थे। ये बालक जब पढ़ लिख कर फ़ीजी लौटे तो इन्होंने फ़ीजी के भारतवंशी समाज का नेतृत्व गृहण किया। इनका मानक हिन्दी का ज्ञान वैसा ही था जैसा किसी भारतवाशी का हो सकता था। इन्होंने मानक हिन्दी में रचनाए कीं, समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं, स्कूलों में पढ़ाने में योगदान दिया, तथा समाज में मानक हिन्दी को प्रतिष्ठित किया। श्री कमला प्रसाद मिश्र जिनको भारत सरकार ने फ़ीजी में ही हिन्दी को विशिष्ट योगदान के लिए 1978 में सम्मानित किया था, उन बालकों में से एक थे जो शिक्षा-दीक्षा हेतु आर्य समाज द्वारा भारत भेजे गए थे। उनकी कविताओं में छायावादी प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जैसे:-

किरणों की रंजित लहर राशि कुछ गाती

तट से मिलने सागर से उठती आती

सपनों में डूबा मैं देख रहा उनको

मेरी चेतनता सहसा मिटती जाती।

फ़ीजी में रहते हुए भारतवंशी काइवीतियों के संसर्ग में आए, तो दोनों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी हुआ, जिसका साक्षी है, काइवीती मादक पेय ‘‘नगोना’’ की प्रशंसा में रचे एक भारतवंशी की हिन्दी कविता का एक अंश:-

सघन विपिन का कल्प मूल यह चिंताहरण अचूक अजेय,

मधुर सोमरस यह फ़ीजी का शांति प्रदायक सुखकर पेय,

तरल तरंगित मादक पेय।

कविता के अनुपात में फ़ीजी में हिन्दी गद्य लेखन अपेक्षाकृत कम हुआ है। गद्य रचनाओं में जोगेन्दर सिंह कमल की फ़ीजी पार्श्वभूमी पर लिखी उपन्यासत्रयी ‘‘करवट’’ ‘‘सबेरा’’ तथा ‘‘धरती मेरी माता’’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गिरमिट अवधि में भारतीय मजदूरों के उत्पीड़न और संत्रास के एक प्रारम्भिक दस्तावेज़ के रूप में विवेकानंद शर्मा का ‘‘जब मानवता कराह उठी’’ का अपना विशिष्ट स्थान है।


भारत की भूमिका

फ़ीजी के साहित्यिक परिदृश्य के संदर्भ में भारतवंशी उपन्यासकार जोगिन्दर सिंह कमल लिखते हैं कि:- ‘‘गुलशन नन्दा, कुशवाहा कान्त, राजवंश, गुरुदत्त जैसे लेखक फ़ीजी में बहुत लोकप्रिय हैं, यद्यपि पुराने पाठक मुंशी प्रेमचन्द्र तथा उनके समकालीनों को अभी भी पसन्द करते हैं।’’ यदि फ़ीजी के पाठक अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, जैनेन्द्र, धर्मवीर भारती आदि से परिचित नहीं हैं, तो इसका दोष भारत के हिन्दी-भाषियों का है, हिन्दी साहित्यकारों का है, हिन्दी सेवी संस्थाओं का है, भारत सरकार का है, जिन्होने फ़ीजी के भारतवंशियों की अपनी भाषा परंपरा को जीवित रखने के संघर्ष के प्रति उदासीनता का भाव रखा है। भारत से राजनेता तो फ़ीजी जाते ही रहे हैं, किन्तु कवि और लेखक फ़ीजी कभी नहीं भेजे गये। भारत और फ़ीजी का संबन्ध संस्कृति का है, राजनैतिक नहीं। अतएव इन संबन्धो को सुदृढ़ भी संस्कृतिकर्मी ही कर सकते है, राजनेता नहीं। भारत को यह देखना है इन संम्बन्धों को भविष्य में कैसे सुदृढ़ किया जाए।

जैसे भारत में धीरे-धीरे अवधी, बुन्देली, ब्रज भाषा आदि का प्रयोग कम हो रहा है और मानक हिन्दी का प्रसार बढ़ रहा है, इसी तरह फ़ीजी मंे भी आने वाले समय में फ़ीजी-बात का प्रयोग कम होगा। लोग खड़ी बोली के अधिक से अधिक ज्ञान और व्यवहार के लिए प्रयत्नशील होंगे। आज भी भारत से फीजी जाने वाले लोगों से भारतवंशी हिन्दी में बोलने में सकुचाते हैं। वे उनसे अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि फ़ीजी-हिन्दी अशुद्ध हिन्दी है और खड़ी बोली में बात करने में यह भारतवासियों के सम्मुख अपने को अक्षम पाते हैं। यह आवश्यक है कि भारत फ़ीजी-बात के प्रति भारतवंशियों में आत्मविश्वास जाग्रत करें, और उनको बताएं कि फ़ीजी-बात अशुद्ध हिन्दी नहीं है, अपितु हिन्दी के महानतम ग्रंथ रामचरितमानस की भाषा है; अतएव सम्मानीय है। साथ ही खड़ी बोली में उनकी सक्षमता बढ़ाने के लिए पुस्तकों, अध्यापकों, कैसटों, हिन्दी टंकण मशीनों आदि से सहायता करें। कवियों, लेखकों, और रंगकर्मियों का विनिमय करें। भारतीय पत्रिकाओं में फ़ीजी के रचनाकारों को स्थान दें। फ़ीजी के साउथ पैसिफिक विश्वविद्यालय में हिन्दी-पीठ की स्थापना में सहायता दें। और सबसे अंत में, चाहे फ़ीजी के हिन्दी लेखन की आलोचना ही करे, किन्तु किसी भी हालत में उसके प्रति उदासीन न हों।



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