हिन्दी का प्रचार-प्रसारः विश्व संदर्भ

जब विश्व स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात आती है, तो सबसे पहला प्रश्न उठता है कि क्यों विश्वस्तर पर हिन्दी का प्रचार किया जाए?


भारत की सभी भाषाएं भारतीय संस्कृति की संवाहिका हैं, इनमें हिन्दी का विशेष महत्व है। यह भारत के सबसे बड़े भूभाग की भाषा है। भारत के बहुजन हिन्दी बोलते हैं। अहिन्दी प्रदेशों मेें भी हिन्दी बोली और समझी और बोली जाती है। भारत के चार महानगरों में से तीन चेन्नई, मुम्बई और कोलकाता अहिन्दी प्रदेशों की राजधानियां हैं। यहां पर संबधित प्रदेशों की भाषा के अतिरिक्त भारत की अन्य भाषाओं में से जो सर्वाधिक बोली और समझी जाती है, वह हिन्दी है। इसी के आधार पर संविधान ने भारत की सभी भाषाओं में से हिन्दी को राजभाषा का गौरव प्रदान किया था। भारत की सांस्कृतिक संपन्नता और विविधता की अभिव्यक्ति, सर्वसमावेशिक हिन्दी के माध्यम से ही संभव है। अतएव विश्व की विभिन्न संस्कृतियों के बीच, भारत की संस्कृति को पूर्णता के साथ प्रतिष्ठित करने का दायित्व हिन्दी पर बनता है। इस परिप्रेक्ष्य में विश्व पटल पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है।


यह सच है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अभूतपूर्व आविष्कारों की कृपा से यह विशाल संसार एक विश्वग्राम बनकर सिमट गया है। संचार माध्यमों की क्रांति अभूतपूर्व है। दूरस्थ देशों में अलग-अलग बिखरी संस्कृतियां आज एक-दूसरे के निकट और आमने-सामने आ गई हैं। उनमें लगातार आदान-प्रदान और विचार-विनिमय हो रहा है। यह भी सच है कि एक अघोषित विश्व-संस्कृति अनजाने ही विकसित हो रही है। इसमें अगर पश्चिमी पोशाक की पतलून है, तो चीनी भोजन और भारतीय योग भी है। हर संस्कृति के श्रेष्ठतम तत्वों और विचारों को ग्रहण करना तथा अपनें में आत्मसात करना विश्व संस्कृति की विशेषता है।


विश्व-संस्कृति का एक नकारात्मक पक्ष भी है। क्या धनी-मानी संपन्न देशों की संस्कृतियां पूरे विश्व पर छा जाएंगी? संस्कृति किसी भी देश की अस्मिता होती है। क्या शक्तिशाली देशों की प्रभुता के सम्मुख छोटे-छोटे देशों की संस्कृतियां विलोप हो जाएंगी ? यह आवश्यक नहीं कि जो देश शक्तिसंपन्न हैं, उनकी संस्कृतियां भी उतनी ही उदात्त और श्रेष्ठ हों। देश की आर्थिक संपन्नता और सांस्कृतिक संपन्नता में कोई प्रत्यक्ष गणित नहीं है। मानव सभ्यता की हजारों वर्षों की प्रगति की विरासत विश्व की विविध संस्कृतियों में बिखरी है। प्रभुतापूर्ण देशों से उद्भूत विश्व संस्कृति की आँधी में इनके विलीन होने से रोकने के लिए आवश्यक है कि विश्व की वाटिका में विविध और बहुरंगी संस्कृतियों के पुष्पों को संजोया जाए। सांस्कृतिक एकरूपता एक प्रतिगामी कदम होगा। यह विश्व को रंगहीन और श्रीविहीन कर देगा। इस संदर्भ में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पांच हजार वर्षों की अजस्र धारा को सूखने से बचाना है। समसामयिक बाजारवाद और ‘‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’’ वाली अनैतिक मानसिकता के प्रदूषण से भी बचाना है। विश्व के मानचित्र पर भारतीय संस्कृति के रंग भरने का ऐतिहासिक दायित्व हिन्दी के कंधों पर है। यह हिन्दी के प्रचार के महत्व को अतिरिक्त रूप से रेंखाकित करता है।


विदेशों में हिन्दी प्रचार के लिए तीन श्रेणी के जनसमूह श्रेणीबद्ध किए जा सकते हैं। प्रथम गैरभारतीय विदेशी, द्वितीय वे भारतवंशी, जिनके पुरखे विदेशों में रोजी-रोटी के तलाश में गए थे और अब वहीं बस गए हैं; और तृतीय, विदेशी में बसे प्रथम पीढ़ी के प्रवासी भारतीय। इन तीनों ही श्रेणी के लोगों को हिन्दी सीखने के लिए कोई आर्थिक दबाव या अनिवार्यता नहीं है। हिन्दी का इनकी रोजी-रोटी से कोई संबंध नहीं हैं। हिन्दी पढ़कर विदेशों में सामान्यतया कोई नौकरी नहीं मिल सकती है, और न किसी प्रकार का लाभ।


विदेशी में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की रणनीति निश्चित करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि किस श्रेणी के विदेशियों के लिए यह योजना बनाई जा रही है। जहां विदेशी आर्थिक अकादमिक, जासूसी या धर्म प्रचार के लिए हिन्दी का पठन-पाठन करते हैं, वहीं भारतवंशी विदेशियों और अप्रवासियों के लिए हिन्दी उनकी भावनात्मक और सांस्कृतिक आवश्यकता से जुड़ी है। इसलिए विशुद्ध विदेशियों और भारतवंशी विदेशियों में हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिए एकदम अलग-अलग योजनाएं उनकी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए।


पूरे संसार को ज्ञात है कि यद्यपि हिन्दी भारत में बहुसंख्यक लोगों की भाषा है, फिर भी भारत से व्यापार करने के लिए हिन्दी के ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं है। भारत में व्यापार के लिए अंग्रेजी जानना आवश्यक है। अतएव अंग्रेजी न जानने वाले देश चीन, जापान, रूस जर्मनी, फ्रांस, इटली आदि की कंपनियां भारत से व्यापार करने के लिए अपने देश के प्रतिनिधियों/कर्मचारियों को अंग्रेजी में प्रशिक्षित करके भारत भेजती हैं। सन् 1947 में आजादी के बाद भारत से व्यापार करने के लिए जापान ने विशेष हिन्दी प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी, किन्तु जब उनको वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ तो उन्होंने हिन्दी प्रशिक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर दिया। इस परिपेक्ष्य में, यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखना होगा कि विदेशों में हिन्दी सीखने के लिए किसी भी वर्ग में आर्थिक कारणों से अनिवार्य नहीं है।


कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों में एशिया विभाग हैं, अथवा दक्षिण-एशिया या दक्षिण-पूर्व एशिया विभाग हैं, जिनमें चार-छह विद्यार्थी सामान्य जिज्ञासा में हिन्दी सीख लेते हैं। विदेशी सरकारों के गुप्तचर विभागो को भी कुछ एक हिन्दी जानने वालों की जरूरत होती है या कभी कोई विदेशी लड़की किसी भारतीय नौजवान से विवाह कर ले, तो वह अपने पति के देश की भाषा सीखना चाह सकती है। कुछ ईसाई संगठन, भारत में ईसाई धर्म के प्रचार के लिए भी हिन्दी सीखने की अनिवार्यता को पहचानते हैं और व्यवस्था करते हैं। विशुद्ध शोध और ज्ञान से प्रेरित हिन्दी अध्येता उंगली पर गिने जा सकते हैं। चेकोस्लोवाकिया के डा. ऑदोलेन स्मेकल, पौलैंड के डा. ब्रिन्सकी, रूस के डा. बारान्निकोव तथा जापान के प्रोफेसर दोई आदि विदेशी विद्वानों की संख्या कितनी ही कम क्यों न हो, ये बहुत महत्त्वपूर्ण नाम हैं। इनकी प्रेरणा और इनके उदाहरण से ही विदेशों में हिन्दी के प्रचार का काम बहुत धीरे-धीरे लेकिन सधे हुए दृढ़ कदमों से आगे बढ़ा और आगे भी बढ़ेगा।


विदेशियों में हिन्दी के प्रचार का सर्वश्रेष्ठ साधन है- विश्वविद्यालय। आज आवश्यकता है कि जिन विश्वविद्यालयों में पहले से हिन्दी का अध्यापन हो रहा है वहां हिन्दी के अध्यापन को और अधिक सशक्त और सघन किया जाए। उनके पुस्तकालयों को खुले हाथों से हिन्दी पुस्तकें निःशुल्क दी जाएं।


विदेशी हिन्दी अध्यापक अन्य विदेशी छात्रों की हिन्दी पढ़ने के लिए अप्रत्यक्ष, अवचेतन के स्तर पर, जिज्ञासा जागृत करते हैं। अतएव विदेशों में हिन्दी के प्रचार के लिए इन विदेशी हिन्दी अध्यापकों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन अध्यापकों को विशेष रूप से सम्मानित करने की आवश्यकता है। भारत के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में इन विदेशी हिन्दी अध्यापकों पर विशेष लेख प्रकाशित करने की व्यवस्था की जाए और वे पुरस्कृत किए जाएं। हिन्दी अध्यापकों और विद्यार्थियों के लिए भारत यात्राएं, प्रतियोगिताएं, विशेष कार्यशालाएं, साहित्यिक आयोजन आदि भी क्रियान्वित किए जाने चाहिए। जिन प्रमुख विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग नहीं हैं वहा पर भारत सरकार को ऐसे विभाग खुलवाने का प्रयत्न करना चाहिए।


विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों द्वारा नाट्यायोजन बहुत ही महत्वपूर्ण है। कक्षा में सीखी हुई हिन्दी का नाटकों में प्रयोग विद्यार्थियों को अपनी हिन्दी बोलने की क्षमता के प्रति आश्वस्त करेगा। साथ ही भारत के विश्वविद्यालयों के हिन्दी नाट्यदलों की प्रस्तुतियां इन विदेशी हिन्दी विद्यार्थियों के लिए समय-समय पर आयोजित की जानी चाहिए। हिन्दी की आधारभूमि पर नवयुवकों का अन्तरराष्ट्रीय विनिमय हिन्दी का भविष्य सुरक्षित रखेगा।


दूसरी श्रेणी में सूरीनाम, फीजी, मॉरिशस, ट्रिनीडाड, गयाना आदि देश हैं जहां भारतवंशी डेढ़ दो सौ वर्ष पूर्व गिरमिट प्रथा के अंतर्गत मजदूर बना कर ले जाए गए थे। इन भारतवंशियों में भी भारत जीवित है, यद्यपि वह हर पीढ़ी के साथ कुछ कम होता जा रहा है। इनके गिरमिटये पुरखे, भारत के अनेक प्रान्तों से ले जाए गए थे। इन गिरमिटयों में बंगाली और मद्रासी बोलने वाले भी थे किन्तु अधिकांश बिहार और उत्तर प्रदेश के थे। अतएव अवधी और भोजपुरी मिश्रित हिन्दी इनकी भाषा बन गई। कालांतर में अहिन्दी भाषी प्रान्त से ले जाए गए गिरमिटयों ने भी हिन्दी बोलना सीख लिया। इस प्रकार इन सभी देशों के भारतवंशियों में, किसी न किसी रूप में, हिन्दी जीवित है।


यद्यपि गिरमिटये स्वयं अनपढ़ थे, फिर भी एक ऐसी संस्कृति के वारिस थे, जिसने सदैव शिक्षा और ज्ञान की सरस्वती की पूजा की है, और जिसने कभी पुस्तकालय नहीं जलाए। इसीलिए घोर दरिद्रता में भी अपना पेट काट कर, अधभूखे रह कर गिरमिटयों ने अपने स्कूल चलाए। इनको विदेशी सरकार से न तो कोई आर्थिक सहायता मिलती थी और न कोई प्रोत्साहन। स्वयं आपसी सहकार से आर्थिक संसाधनों को एकजुट करके स्कूल चलाए जिनमें हिन्दी की पढ़ाई सर्वोपरि थी।


इन सभी देशो में भारतवंशियों के लिए हिन्दी रोटी और रोजगार की भाषा नहीं है। हिन्दी उनके लिए आजीविका का साधन नहीं है। इसलिए हिन्दी का अध्ययन और अध्यापन धीरे-धीरे कम हुआ है। यहा उल्लेखनीय है कि अपवाद स्वरूप अनेक भारतवशी इन देशों में मिशन को तरह हिन्दी के प्रचार को समर्पित हैं। फिर भी हिन्दी के प्रयोग की वह सीमाएं बन गई है। प्रायः भारतवंशी अपनी हिन्दी आधारित मातृभाषा सूरीनामी, क्रियोल, फीजीबात आदि आपस में घरों में और अनौपचारिक संदर्भों में बोलते हैं। साथ ही वह मानक हिन्दी भी समझते हैं। हिन्दी फिल्मों का आनन्द लेते है। औपचारिक अवसरों पर और शिक्षण में प्रयोग करते है, किन्तु देवनागरी में उसे लिख नहीं पाते। मुझे आज भी याद है जब तीस वर्ष पूर्व मैने फीजी के भारतवंशी युवाआंे के साथ हिन्दी नाटक किया था, तो प्रायः सबने अपने हिन्दी संवाद रोमन लिपि में लिखकर याद किये थे। इसका यह अर्थ निकालना सर्वथा गलत होगा कि फीजी के उन भारतवंशियों में हिन्दी के प्रति उपेक्षा का भाव था। सच तो यह है कि हिन्दी के प्रति उनके मन में वही अपनापा था, जो उनके गिरमिटया पुरखों में था, किन्तु परिस्थितिवश वे हिन्दी लिखना नहीं सीख सके। आज काईवीतियों (फीजी के मूलवासियों), चीनियों और गोरों के बीच हिन्दी स्वयं उनकी अपनी पहचान की भाषा है। उनकी सभ्यता और संस्कृति की भाषा है, लेकिन दिन प्रतिदिन उसके प्रयोग न होने के कारण मात्र अप्रयोग से वे हिन्दी लिखना भूलते जा रहे हैं। न्यूनाधिक यही स्थिति इस श्रेणी के अन्य देशों में भी है। इस श्रेणी के सभी देशों में जिले कुछ वर्षों में हिन्दी पठन-पाठन में वृद्धि हुई है। भारत सरकार द्वारा स्थापित सांस्कृतिक केद्रों द्वारा भी हिन्दी के प्रचार को बल मिला है। सांस्कृतिक केन्द्र में जो भारतवंशी संगीत सीखता है वह अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय संस्कृति और भाषा से भी जुड़ता है।


डेढ़-दो सौ वर्षों में इन देशों में हिन्दी को जीवंत रखने में हिन्दी सिनेमा का विशेष अवदान है। सिनेमा और नाटक भाषा को ग्लैमराइज (आकर्षणमंडित) करते हैं। हिन्दी सिनेमा के माध्यम से जहां भारतवंशी महिलाएं साड़ी पहनने के नए-नए फैशन सीखती रहीं है, वहीं सामान्य भारतवंशियों को भी लगातार हिन्दी से संपर्क बनाए रखने और मुहावरेदार हिन्दी सुनने का अवसर मिलता रहा है। जब भारतीय फीजी, मारीशस आदि देश जाते हैं तो इस कारण से ही उन्हे लगता है कि भारत से दूर, वह एक दूसरे भारत में पहुंच गए हैं।


भारतवंशी-बहुल देशों में हिन्दी को लेकर एक नया विवाद इधर देखने में आया है। कुछ लोगों का कहना है कि फीजी, सुरीनाम, ट्रिनीडाड, मॉरिशस तथा गयाना में सामान्य भारतवंशियों की अपनी बोली है। यद्यपि इन बोलियों के मूल में अवधी, भोजपुरी, मगही आदि भारत की भाषाएं हैं, फिर भी पिछले सौ, डेढ़ सौ वर्षों में अन्य विदेशी भाषाआंे के संपर्क में इनका अपना अलग चरित्र निकल कर आया है। इनका सर्वथा स्वतंत्र एक नवीन भाषा का स्वरूप है, जो हिन्दी (मानक हिन्दी अथवा खड़ी बोली) से एकदम भिन्न है। मुझे याद है कि आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व एक अमेरीकी विद्वान डॉ. रोडनी मोग ने ‘फीजी हिन्दी’ नाम से एक पुस्तक लिख कर यह स्थापित करने का प्रयास किया था कि फीजी हिन्दी, मानक हिन्दी से स्वतन्त्र, एक अलग भाषा है। इन लोगों का मानना है कि इन देशों में हिन्दी एक विदेशी भाषा के समान है। हिन्दी का प्रचार, वहां की अपनी बोली जैसे फीजीबात, सूूरीनामी, क्रियोल आदि का धीरे-धीरे ह्रास कर देगी। भारतवंशी जिस सहजता से अपनी भाषाओं में अभिव्यक्ति कर सकते हैं वह आयातित भाषा (मानक हिन्दी) में संभव नहीं है। यह भारतवंशी-बहुल विदेशों में हिन्दी के प्रचार के विरुद्ध एक तर्क है।


यह तर्क एक अर्ध-सत्य है। यह अज्ञान से प्रेरित है। यह जमीनी सच्चाई को नहीं देखता। ऐसी ही स्थिति भारत में 19वीं शताब्दी के अंत तथा बीसवीं शताब्दी की प्रारंभिक दशाब्दियों में थी।


खड़ी बोली सिवाए दिल्ली और मेरठ के आसपास के क्षेत्रों के और कहीं नहीं बोली जाती थी। केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में ही ब्रजभाषा, बुन्देलखण्डी, अवधी, भोजपुरी, मगही मैथिली बज्जिका, आदि बोली जाती थीं। इनमें ब्रजभाषा, अवधी और मैथिली भाषाओं की साहित्यिक रचनाएं खड़ी बोली की अपेक्षा कई गुणा संपन्न थीं। किन्तु छापाखाने और रेलगाड़ी के प्रचार के बाद एक ऐसी भाषा की आवश्यकता अनुभव हुई जो प्रदेश मे एक साथ समझी जाए। ऐतिहासिक कारणों से दर्जनों भाषाओं के बीच खड़ी बोली एक मानक भाषा के रूप में और राजभाषा के रूप में चुनी गई। इतिहास का अपना तर्क और गतिमयता होती है। अंग्रेज़ी ने उर्दू के माध्यम से खड़ी बोली को फ़ारसी के स्थान पर अदालतों को भाषा बनाया था। कालांतर में राष्ट्रीय शक्तियों की प्रबल धारा ने खड़ी बोली को देवनागरी लिपि से संवार कर मानक हिन्दी प्रतिष्ठित की। आज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, झारखंड तथा छतीसगढ़ में बिखरी तमाम भाषाओं में मानक हिन्दी सर्वसमावेशित एवं सर्वस्वीकार्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। रचनात्मक साहित्य जैसे - कविता, कहानी, नाटक आदि के अतिरिक्त हिन्दी में दर्शन, भाषा, विज्ञान, भूगोल, इतिहास, रसायन शास्त्र, भौतिक विज्ञान, जीव-विज्ञान, कृषि, चिकित्सा विज्ञान, यांत्रिकी, सूचना प्रौद्योगिकी आदि का इतना साहित्य पिछले सौ वर्षों में रचा गया है कि वह अब सभी क्षेत्रीय भाषाओं (बोलियों) से अधिक सपन्न है। इतिहास की धारा अब मोड़ी नहीं जा सकती। अगर आज कहें कि विश्वविद्यालयों में हिन्दी का स्थान ब्रजभाषा या अवधी को दिया जाए तो वह हास्यास्पद लगेगा। इसी तरह मानक हिन्दी का स्थान फीजी में फीजीबात नहीं ले सकती है और न सूरीनाम में सूरीनामी।


फीजीबात, सूरीनामी आदि की सीमाएं हैं। ये बोलियां घर और बाजार के अनौपचारिक संदर्भों में प्रभावी हो सकती हैं। घर और बाजार की पार्श्वभूमि पर लिखे उपन्यासों, कविताओं में अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हो सकती हैं। किन्तु विचार साहित्य इन बोलियों के सामर्थ्य के बाहर है। गूढ़ दर्शन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और यान्त्रिकी का साहित्य न तो इन बोलियों में उपलब्ध है और न इनकी रचना के लिए इन बोलियों मैं शब्द संपद्रा हैं। यदि इन भारतवंशी-बहुल देशों में किसी भारतीय भाषा को सार्थक भूमिका का निर्वहन करना है, तो वह स्थानीय बोली नहीं, अपितु मानक हिन्दी ही होगी।


यहां यह भी विचारणीय है कि क्या हिन्दी और स्थानीय भारतवंशी बोली में विरोध का संबंध होगा, या एक दूसरे की पूरकता का ?

भारत में अवधी, मगही, भोजपुरी आदि बोलियां हिन्दी की पूरक भाषाएं हैं। मानक हिन्दी के पाठ्यक्रम में अवधी (तुलसीदास), भोजपुरी (रविदास), मैथिली (चंडीदास, विद्यापति), बुंदेली (ईसुरी) आदि के कवि पढ़ाए जाते हैं। आज भी भारत में मानक हिन्दी में साहित्य रचना के साथ भोजपुरी, अवधी, मेवाड़ी, मारवाड़ी आदि में साहित्य रचा जा रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं और मानक हिन्दी के बीच पारस्परिक पूरकता ही हिन्दी की शक्ति है। इसी प्रकार भारतवंशी-बहुल देशों में स्थानीय भाषाओं और मानक हिन्दी के बीच भी पारस्परिक पूरकता का संबंध होना चाहिए। जो एक को हटाकर दूसरे को स्थापित करने की बात करते हैं वे न तो हिन्दी के मित्र हैं और न उन देशों की भाषाओं के हितैषी।


तीसरी श्रेणी में अमरीका, यूरोप, मध्य एशिया आदि के देश हैं जहां आजादी के बाद भारतीय जन प्रवासी बनकर भारत से गए हैं। इन प्रवासी भारतीयों के संबंध भारत से लगभग बराबर बने रहे हैं। इन प्रवासी भारतीयो में अंग्रेजी का बोलबाला है और अपनी भाषा से कटने के बाद ये अपने देश की संस्कृति से धीरे-धीरे कटते जा रहे हैं। किन्तु इनके हृदयों में अपनी पहचान बनाए जाने की ललक है। अन्तरराष्ट्रीय समुदायों के बीच जब प्रवासी भारतीय देखते हैं कि चीनी, जापानी, स्पैनी, इटलीवासी, फ्रांसीसी सब अपनी-अपनी परंपराओं पर गर्व करते हैं, और घरों में अपनी मातृभाषा में बोलते हैं तो प्रवासी भारतीयों के मन में भी अपनी पहचान को ललक जागती है। वह जमाने गए, जब लंदन से वापस भारत आने वाला जयकिशन, जैक्सन बनकर लौटता था। आज जयकिशन विलायत जाकर जी जयकिशन बना रहता है। अपनी जड़ों के प्रति सम्मान का भाव प्रवासी भारतीयों में हिन्दी के प्रसार के लिए अनुकूल है। कमी है तो भारत में भारतीय शासकों में हिन्दी के प्रसार के लिए इच्छाशक्ति की।


प्रायः हिन्दी में निष्णात कूछ विदेशी तथा प्रवासी भारतीय हिन्दी में अपनी रचनात्मक प्रतिभा कहानी और कविता के माध्यम से प्रकट करते है। विदेशों में हिन्दी की पत्रिकाओं का अभाव है। अतएव वे चाहते है कि उनकी रचनाएं भारत के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हों। वैसे भी इन विदेशी रचनाकारों के लिए उनकी कृतियों का भारत में प्रकाशन उनको एक विशेष सम्मान और उपलब्धि का संतोष देता है। इसलिए वे अपनी कृतियों के भारत में प्रकाशन के लिए लालायित रहते हैं। ऐसा प्रायः संभव नहीं हो पाता। भारत में पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक विदेशी रचनाकारों की कृतियों को भारतीय साहित्यकारों की रचनाओं से तौलते हैं और उनको हल्का पाते हैं। और इसलिए प्रकाशित नहीं करते। इससे वे निराश हो जाते हैं। कुंण्ठाग्रस्त हो वे लिखना बंद कर देते हैं। इसके साथ ही उनका हिन्दी के प्रति उत्साह और समर्पण भी ठंडा हो जाता है।


यह पूरी स्थिति विदेशी रचनाकारों के साथ अन्याय है, और विदेशों में हिन्दी संचार के अभियान में भारी अवरोध। विदेशी रचनाकारों की कृतियों का भारतीय साहित्यकारों की कृतियों से तुलना मूलतः त्रुटिपूर्ण है। जो विदेशी हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप में सीख रहे हैं, वे उन भारतीय साहित्यकारों के सामने कहाँ खड़े हो सकते हैं जो आजीवन हिन्दी की सांस लेते हैं। विदेशी साहित्यकारों की एक अलग श्रेणी है। इनकी रचनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए भारतीय साहित्यकारों के परिप्रेक्ष्य में नहीं। भारत की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में एक विशेष खण्ड केवल विदेशी साहित्यकारों की रचनाओं के लिए आरक्षित होना चाहिए। इस माध्यम से उनको भारत में प्रकाशन के अधिक अवसर प्राप्त हांेगे और उनका मूल्यांकन विदेशी हिन्दी लेखन के प्रतिमान के आधार पर हो सकेगा। हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय विस्तार के आकांक्षियों को विदेशी रचनाकारों को विशेष सम्मान देने की व्यवस्था करनी ही पडे़गी।


एक भारतवंशी-बहुल देश में भारतीय दूतावास के द्वारा सत्यजीत राय के फिल्मों का एक समारोह आयोजन करने के लिए स्थानीय भारतवंशी समाज के नेताआंे को चर्चा के लिए बुलाया गया था। सबने एक स्वर में कहा कि प्रस्तावित समारोह में वे फिल्म न दिखाए जाएं, जो भारत की दारुण दरिद्रता चित्रित करते हैं। बात समझ में आती है। भारत, भारतवंशियों के सपनों का देश है। वह नहीं चाहते कि उस सपने को खण्डित किया जाए। भारत की दरिद्रता से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। वे भारत को दरिद्रता से निवारने के लिए कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। फिर क्यों दरिद्रता के दृश्य देखकर अपने सपनों को खंडित करें। इस परिप्रेक्ष्य में हिन्दी के विदेशों में प्रचार से संबद्ध अधिकारियों और समाज सेवकों को यह भी देखना होगा कि वे हिन्दी के माध्यम से कैसा भारत निर्यात करते हैं। क्या वे हिन्दी के माध्यम से समाज के दुर्गणों को जैसे जातिगत-विभेद, दलितों पर अत्याचार, सतीप्रथा, राजनैतिक अपराधिकरण, नौकरशाही भ्रष्टाचार चित्रित करते हैं, या कि एक ऐसे भारत को प्रस्तुत करते हैं जो हजारो सालों की गुलामी से उद्भूत इन सामाजिक विकृतियों से ऊपर उठकर, पूरी मानवता के लिए सत्य, अहिंसा, प्रेम और समता के मार्ग का अन्वेषण कर रहा है ? इसका सयास प्रयास करना होगा कि हिन्दी प्रचार के मार्ग से भारत की हजारों साल की सभ्यता की उपलब्धियों से विदेशी अवगत हो सकें। संगीत, नृत्य, नाटक, चित्रकला, शिल्प, वास्तु, इतिहास, धार्मिक सहिष्णुता का परिचय उन्हे हिन्दी के माध्यम से हो सकता है। अतएव केन्द्रीय स्तर पर एक ऐसी समन्वय समिति की आवश्यकता है जो विदेशों में हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिए सुविचारित नीति निर्धारण के साथ कार्यान्वयन हेतु विशिष्ट योजनाओं की संस्तुति करे।


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