हिन्दी और आने वाली पीढ़ियाँ

जब हिन्दी के भविष्य की चर्चा करनी है, तो हिन्दी के भूतकाल और वर्तमान की चर्चा करना आवश्यक है। नदी का प्रवाह जैसे अलग अलग टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता, उसी तरह समय-प्रवाह भी खंड खंड करना संभव नही है। हम केवल अपनी सुविधा के लिए समय को भूतकाल, वर्तमान और भविष्य में विभाजित करते हैं। जबकि सच यह है कि भूतकाल ही वर्तमान बन जाता है, और वर्तमान भविष्य में परिवर्तित हो जाता है। अतएव भविष्य की चर्चा भूतकाल और वर्तमान के संदर्भ में ही की जा सकती है।


हिन्दी: बीता हुआ कल


सन् 1857 के पहले की दिल्ली । बाबू सुभ्भन लाल दिल्ली में रहते थे। वह आखि़री मुगल बादशाह, बहादुर शाह ज़फ़र की चाकरी में थे। शायद ‘‘दीवान’’ या किसी ऐसे ही पद पर। वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे। उन्होने अपने बेटे बाबू सम्मन लाल को किशोरावस्था में लाहौर पढ़ने भेजा, ठीक वैसे ही जैसे आजकल के सम्पन्न लोग अपने बेटों को पढ़ने देहरादून भेजतें हैं।

सन् 1840 में अंग्रेजी स्कूल खुल गये थे। यद्यपि मुगल बादशाह दिल्ली के तख्त पर था, लेकिन हुकूमत अंग्रेजांे के हाथ मंे जा चुकी थी। मुग़ल बादशाह भी अंग्रेजांे के हाथ की कठपुतलीमात्र बन कर रह गया था। बाबू सुभ्भन लाल ने बहती हवा का रुख़ भाँपा। अतएव अपने पुत्र सम्मन लाल की उर्दू और फ़ारसी के साथ अंग्रेज़ी की शिक्षा का भी प्रबन्ध किया।


तब ही 1857 का विस्फोट हुआ। दिल्ली वालों के घर उजड़ गए। लोगों ने दिल्ली छोड़कर आस-पास के गावों और शहरों में शरण ली। सम्मन लाल भागकर उत्तर प्रदेश के किसी शहर में अपनी ननिहाल पहुंचे।


ग़दर के बाद, सम्मन लाल ने कोशिश करके अंग्रेजी स्कूल में नवीं कक्षा तक पढ़ाई की। उन दिनों में बस इतनी पढ़ाई करके उन्हे अंग्रेजी सरकार की नौकरी मिल गई। उनके पिता अरबी के बहुत बड़े जानकार थे, लेकिन सम्मन लाल अरबी बिल्कुल नही जानते थे। वह थोड़ी बहुत फ़ारसी जानते थे, जिसे धीरे धीरे भूलते जा रहे थे, क्योंकि अंग्रेजो ने निचली अदालतों की भाषा फ़ारसी की जगह उर्दू कर दी थी। बस फ़ारसी के नाम पर फ़ारसी के दो-चार शेर या कहावतें ही उनको याद थीं, जो जाने अनजाने में उनकी बातचीत में आ जाती थीं। लेकिन वह अच्छी तरह जानते थे कि वक्त बदल चुका है। फ़ारसी का ज़माना लद चुका है। एक वक़्त था कि जब सिर्फ फ़ारसी जानने वाला ही आलिम-फ़ाजिल, काबि़ल समझा जाता था। जो फा़रसी नहीं जानता था, वह चाहें अन्य विषयों का कितना भी बड़ा विद्वान क्यों न हो, उसे मूर्ख समझा जाता था। लेकिन आज फ़ारसी जानने वाले की काई इज़्जत नहीं थी, उसका कोई उपयोग नही था। इसी पर किसी जनकवि ने उन दिनों कहा था:-


पढ़ो फ़ारसी बेचो तेल । यह देखो किस्मत का खेल।


सम्मन लाल का काम सिर्फ उर्दू और अंग्रेजी से चलता रहा। अतएव उन्होने अपने पुत्र सुरजन लाल को फ़ारसी नहीं पढ़ाई। सिर्फ़ उर्दू और अंग्रेजी़ पढा़ई। मात्र तीन पीढियों में परिवर्तन इतने धीरे धीरे, दबे पांव आया कि लोग उसके क्रान्तिकारी परिणाम को नहीं देख सके। सुभ्भन लाल अरबी-फा़रसी के विद्वान थे। सुम्मन लाल उर्दू, फा़रसी और अंग्रेजी के जानकार। सुरजन लाल सिर्फ़ उर्दू और अंग्रेजी़ के। अरबी तथा फ़ारसी की गति उन्नीसवीं शताब्दी तक ही सिमट कर रह गई। किन्तु बीसवीं शताब्दी में उर्दू का प्रवेश उत्तर प्रदेश तथा अन्य हिन्दी प्रदेशों में एकमात्र भारतीय भाषा के रूप में नहीं हो सका, क्योंकि उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण से ही हिन्दी ने उर्दू के वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर दिया था।

मध्य प्रांत (सेन्ट्रल प्रोविन्सिज), जिसे वर्तमान मध्य प्रदेश का पूर्व संस्करण कहा जा सकता है, नें सन् 1872 में उर्दू के स्थान पर हिन्दी को निचली अदालतों, दफ्तरों की भाषा घोषित कर दिया। सन 1881 मे बिहार मे उर्दू का स्थान हिन्दी ने ले लिया। सन् 1884 मे अंटोनी मैकेडोनेल, उत्तर प्रदेश का गवर्नर बन कर आया। उसने उर्दू के स्थान पर हिन्दी को स्थापित करने का प्रयत्न किया, किन्तु वह भी सर सैयद अहमद खाँ के प्रभाव के कारण सफल नहीं हो सका। अतएव उसने सन् 1900 मे ‘‘हिन्दी प्रस्ताव’’ (हिन्दी रिजोल्यूशन) पारित कर, देवनागरी लिपि को उर्दू की फ़ारसी लिपि के समकक्ष घोषित कर दिया, और नीचे की स्तर की सरकारी नौकरियों के लिए दोनों ही लिपियों का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया।


यद्यपि इस आदेश से उर्दू भाषा और फ़ारसी लिपि का महत्व और उपयोग कम नहीं हुआ था, और मुसलमानों को इसका प्रयोग करने में कोई बाधा भी नहीं थी, किन्तु देवनागरी लिपि को दी गई छोटी सी रियायत भी उनको सहन नहीं हुई।


अलीगढ़ मुस्लिम कॉलेज प्रारम्भ से ही मुस्लिम अलगाववाद का गढ़ था। अतएव हिन्दी के विरूद्ध अभियान के नेतृत्व की कमान भी अलीगढ़ ने संभाली। उन्होने विरोध दर्ज किया कि उर्दू जैसी ‘आला ज़बान’ को ‘हिन्दी गन्दी’ की बराबरी में गिराया जा रहा है। उन्होने यह भी प्रचार किया कि इससे बेचारे ग़रीब मुसलमान अपनी रोज़ी-रोटी से जायेंगे, जबकि ‘‘पैसे वाले चालाक’’ हिन्दुओं को सरकारी नौकरी की ज़रूरत नहीं है। इसके उत्तर में गवर्नर मैक्डोनेल ने कहा - ‘‘चौदह प्रतिशत मुसलमान, साढ़े सैंतीस प्रतिशत सरकारी पदों पर पहले से ही हैं।’’


कुछ वर्ष पूर्व मुसलमानों ने ‘‘एंग्लो-ओरिएण्टल डिफेंस असोसिएशन’’ बनाया था। अलीगढ़ कालेज के सेक्रेटरी मोहसिन-उल-मलिक ने इस संस्था का नाम बदलकर ‘‘उर्दू डिफेंस असोसिएशन’’ कर दिया। ‘‘हिन्दी रेज़ोल्यूशन‘‘ के विरुद्ध मुस्लिम मानस को भड़काने मुस्लिम नेता पूरे देश मे अनेक जिलों मे गए। ‘‘इस्लाम खतरे मे है’’- जगह-जगह सुनाई पड़ा। अगस्त 1900 मे लखनऊ मे एक सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमे पंजाब, बंगाल, मद्रास, बंबई, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों तक से प्रतिनिधि आये।


कुल 400 प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया, जिसमे मुल्ला, मौलवी, जमीदार, वकील, पत्रकार आदि सभी शामिल थे। उन्होने इस्लामी मज़हब और तहजीब की हिफाज़त के लिए ‘‘हिन्दी रेजोल्यूशन’’ के खिलाफ़ आवाज़ उठाने को ललकारा। मोहसिन-उल-मुल्क ने तो यह भी कहा कि हालांकि हमारे हाथ के कलम मे ताकत नहीं है, लेकिन इन हाथो मे तलवार उठाने की ताकत है ।


मुसलमानों के विरोध के कारण ‘‘हिन्दी रेजोल्यूशन’’ बस कागजों में रह गया। कार्यान्वित नहीं किया गया। मैकडोनेल का स्थानांतरण कर दिया गया। हिन्दी को निचले दफ्तरों और अदालतों की भाषा बनने के लिए सैंतालीस वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। 1947 मंे आज़ादी के बाद ही हिन्दी को उत्तर प्रदेश मे सरकारी भाषा का दर्जा मिला।

हिन्दी बनाम हिन्दुस्तानी


सन 1900 मे हिन्दी, उर्दू से पराजित हो गयी थी। आज़ादी प्राप्त होने तक के 47 वर्षों मंे हिन्दी के विरुद्ध एक नया मोर्चा आया-हिन्दुस्तानी ।

महात्मा गांधी सन् 1915 मंे दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान वापस आए थे। दक्षिण अफ्रीका मे उन्होने देखा था कि भारत के विभिन्न भागों से आए अंग्रेज़ी न जानने वाले हिंदुस्तानियों की आपसी बोल-चाल की भाषा हिन्दी है। इसीलिए उन्होने पूरे देश को एक सूत्र मे जोड़ने के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे प्रचारित करने का कार्य शुरू किया। सन् 1918 मे उन्होनंे अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी का प्रचार करने मद्रास भेजा। मद्रास मंे हिन्दी पढ़ाने के लिए देवदास गांधी ने कक्षाएं चलाईं। हिन्दी के प्रति महात्मा जी का समर्पण देवदास गांधी को लिखे 1918 के निम्नलिखित पत्र मे स्पष्ट होता है - ‘‘मैंने हिन्दी कक्षाओं के बारे मे तुम्हारी दो महीने कि रिपोर्ट पढ़ी। मैं संतुष्ट हूँ।..... तुम अपने निश्चय मे दृढ़ रहो - तुम चिरायु हो, जिससे मद्रास प्रेसीडेंसी मे हिन्दी की धुन गूँजे, और जिससे उत्तर दाक्षेण के बीच की खाई मिट जाए और इन दो भागों में रहने वाले लोग एक हों जाएँ। अपनी हिन्दी का ज्ञान दिन प्रतिदिन बढ़ाओ, और अपना नैतिक चरित्र शुद्ध रखो। इससे तुम लोगो को अपनी ओर खींच सकोगे। तब तुमको उन्हे हिन्दी पढ़ाना आसान होगा।’’ (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खण्ड 15, पृष्ठ 28)


वहीं गांधी जी जो हिन्दी के अनन्य समर्थक थे, पाला बदलकर हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी के समर्थक बन गये। 1920-21 में उन्होने खिलाफ़त आन्दोलन के माध्यम से मुसलमानों को अपने साथ लाने की कोशिश की। उसी कोशिश में मुसलमानों के हिन्दी विरोध को देखते मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए उन्होने हिन्दी का बलिदान कर दिया। अब वह हिन्दुस्तानी का झंडा ऊंचा करने लगे।


हिन्दी का निर्णायक संघर्ष


1900 से 1947 की अवधि में, हिन्दी की संघर्ष यात्रा का स्वर्णिम इतिहास रचा गया। उस समय हिन्दी का चारों दिशाओं में विरोध हो रहा था। पूरी कोशिश की जा रही थी कि हिन्दी को समाज में कोई स्थान प्राप्त न हो। अंग्रेजी शासन उर्दू का पक्षधर था। निचली अदालतों और द़फ्तरों की भाषा के रूप में उर्दू अपनें स्थान पर सुदृढ़ थी। सरकारी नौकरी के लिए सबको अनिवार्य रूप से उर्दू पढ़नी पड़ती थी।


मुस्लिम लीग ने घोषित कर दिया था कि उर्दू मुसलमानों की मज़हबी जब़ान है। इसलिए मुसलमान प्राण-प्रण से उर्दू की रक्षा के लिए एकजुट थे।


अधिकांश हिन्दू कांग्रेस के साथ थे। गांधी जी ने हिन्दू सन्यासी का बाना धारण किया था। उनकी अहिंसा, शाकाहारी भोजन, व्रत-उपवास, जीवन शैली आदि की अपील केवल हिन्दुओं के लिए थी। इसलिए अधिकांश हिन्दू उनके प्रभाव मंडल में थे और अधिकांश मुसलमान उनके विरूद्ध मुस्लिम लीग में थे। मुसलमानों को मुस्लिम लीग से तोड़कर कांग्रेस में लाने के लिए गांधी जी ने प्राण-प्रण से कोशिश की। उनको रिझाने की कोशिश में ही उन्होने हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी की वकालत शुरू कर दी थी।


इन विरोधी परिस्थितियों में भी हिन्दी का प्रभाव निरंतर बढ़ता रहा। संघर्ष शक्ति देता है। जब मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना ने उर्दू को मुसलमानों की मज़हबी ज़बान घोषित किया, तो अधिकांश उर्दू पढ़ने वाले हिन्दुओं ने उर्दू को त्यागकर हिन्दी अपनाई। प्रेमचन्द जी ने भी, जो उर्दू के लेखक थे, उर्दू के स्थान पर हिन्दी में लिखना शुरू कर दिया।


हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में पूरे देश ने खुले हृदय से स्वीकार किया। तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल सभी दक्षिण प्रांतों में भारी संख्या में हिन्दी की गैर-सरकारी पाठशालाएं खुल गई, और लागों ने उत्साह से हिन्दी सीखी। उत्तर भारत में पंजाब, बंगाल आदि प्रान्तो में हिन्दी का प्रचार बढ़ा। पूरे देश में कहीं भी किसी प्रकार का हिन्दी विरोध नहीें था।


सुरजन लाल के पुत्र अर्जुन लाल जब पिछली शताब्दी के दूसरे दशक में स्कूल में पढ़ते थे, तो उनकी कक्षा में 30 बालक उर्दू पढ़ने वाले होते थे, और केवल 3-4 बालक हिन्दी वाले। किन्तु जब चौथे दशक में स्कूल में 30 बालक हिन्दी पढ़ने वाले थे और 3-4 उर्दू के। हिन्दी-उर्दू पढ़ने वाले विद्याथियों के अनुपात में जो क्रान्तिकारी परिवर्तन आया, वह समाज की स्वतः, स्वैक्षिक प्रतिक्रिया थी- अंग्रेजी शासन के उर्दू-पक्षपात के विरूद्ध, मुस्लिम अलगाववाद की चुनौती के विरूद्ध और गांधीवादी तुष्टिकरण के विरूद्ध।


हिन्दी का विकास और हिन्दी की लोकप्रयिता में वृद्धि उस समय हुई, जब हिन्दी को किसी भी प्रकार का सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं था। किन्तु आजादी के बाद जिस दिन से हिन्दी राजभाषा घोषित की गई, उसी दिन से, हिन्दी की अवनति और दुर्दशा प्रारम्भ हो गई।


आज़ादी के बाद हिन्दी की अवनति का प्रारम्भ


आज़ादी के संघर्ष का लक्ष्य था एक देश, एक राष्ट्र और एक भाषा।


हिन्दी को पूरे देश ने राष्ट्र की एकमात्र भाषा के रूप में स्वीकार किया था।


किन्तु जब सविधान सभा में देश की राजभाषा का प्रश्न आया तो उर्दू पक्षधर हिन्दी के विरोधी हो गये। वह खुले तौर पर उर्दू को राजभाषा बनाने की वकालत नहीं कर सकते थे, क्योंकि पाकिस्तान में उर्दू राजभाषा घोषित हो चुकी थी। अतएव, उन्होने हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी को राजभाषा बनाने की वकालत की।


जब राजभाषा का प्रश्न संविधान सभा के सामने विचाराधीन था, तब ही नेहरू जी ने मार्च, 1948 में मद्रास में घोषित किया कि अगर संविधान ने हिन्दी को राजभाषा स्वीकार किया तो वे उसका विरोध करेंगे। नेहरू जी के एलान से दो बाते स्पष्ट हैं। पहली, प्रजातांत्रिक व्यवस्था में उनका विश्वास नहीं था। तभी तो वह बहुमत द्वारा लिए गए निर्णय का विरोध करने की सार्वजनिक घोषणा कर रहे थे। दूसरी, नेहरू जी हिन्दी के वचनबद्ध विरोधी थे। अगर नेहरू जी का बस चलता तो वह कभी भी हिन्दी को राजभाषा नहीं बनने देतें, किन्तु बहुमत के आगे उनकी एक न चली।


नेहरू जी के गुप्त विरोध और हिन्दुस्तानी समर्थकों के मुखर विरोध के बावजूद हिन्दी राजभाषा के रूप में स्वीकार हुई। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने बहुमत से हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।


कानून बनाना एक बात हैै। उसको लागू करना दूसरी बात। नेहरू जी हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने के संवैधानिक प्राविधान को नहीं रोक सके, तो क्या हुआ ? उसे राजभाषा के रूप में लागू करना तो वह प्रधानमंत्री के रूप में रोक सकते थे। और उन्होनें यही किया। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होने वह सब कुछ किया, जिससे हिन्दी राजभाषा के रूप में कभी भी प्रभावी न हो सके।


हिन्दी और जवाहर लाल नेहरू


संविधान सभा में 13 सितम्बर 1949 को बोलते हुए जवाहर लाल नेहरू ने कहा - ‘‘ हमारी अपनी भाषा होनी चाहिए।.... इसके लिए हम प्रजातांत्रिक ढ़ंग अपनाएंगे या ज़ोर-ज़बर्दस्ती का (अथोरटेरियन) तरीका ? मैं यह सवाल हिन्दी केे उत्साहियों से पूछता हूं क्योंकि मैने कुछ भाषण जो यहां और दूसरी जगहों पर सुने हैं, उनमें जोर-ज़बरदस्ती की ध्वनि थी।़़.... यह हिन्दी के विकास के हित में नहीं होगा अगर आप लोग, जो हिन्दी को उन लोगों के गले ज़बरदस्ती उतारते हैं, जो हिन्दी का विरोध करते हैं।... अगर आप ऐसा करेंगे जिससे लगे कि आप ज़ोर-ज़बरदस्ती कर रहे हैं, तो हिन्दी ‘फेल’ हो जाएगी।’’


प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में बहुमत स्वीकार्य होता है, अल्पमत नहीं। यह एक सामान्य व्यवस्था है। इसमें अल्पमत से यह अपेक्षित है कि वह बहुमत का निर्णय स्वीकार करें। सभी प्रजातांन्त्रिक देशों में बहुमत से ही शासन चलता है अल्पमत से नहीं। किन्तु अगर अल्पमत यह कहने लगे कि बहुमत अपने मत-बाहुल्य से अपना निर्णय हम पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती थोप रहा है, और उसका विरोध करने पर उतारू हो जाए तो प्रजातान्त्रिक प्रणाली की नींव हिल जायेगी। नेहरू ने बहुमत के निर्णय को अल्पमत पर ‘ज़ोर-ज़बर्दस्ती’ थोपने की बात कहकर, बहुमत के निर्णय को बदनाम करते हुए, हिन्दी विरोधियों को एक हथियार पकड़ा दिया। नेहरू जी की नक़ल में हर दो-टके का नेता तक कहने लगा कि हिन्दी को ज़बर्दस्ती दूसरों पर नहीं थोपना चाहिए। बहुमत से पारित विधेयक को ज़ोर-ज़बर्दस्ती का विशेषण देकर हिन्दी को बदनाम करने का षड़यंत्र उन हिन्दी विरोधियों ने रचा, जो संविधान सभा के पटल पर अल्पमत में होने के कारण परास्त हो गऐ थे। उन लोगों ने हवा बनाई कि हिन्दी को ज़बरदस्ती थोपकर अहिन्दी भाषाओं को नष्ट करने की साज़िश है। हिन्दी के राजभाषा के रूप को ‘‘हिन्दी साम्राज्यवाद’’ और हिन्दी समर्थकों को ‘हिन्दी फ़ैनेटिक’ की संज्ञा दी गई।


हिन्दी को राजभाषा घोषित हो जाने के बाद भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व बना रहा, क्योंकि हिन्दी राजभाषा इस शर्त पर बनाई गई थी कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी का भी प्रयोग सरकारी काम-काज में होता रहेगा। कहा गया है कि इस अवधि में हिन्दी का विकास किया जाएगा। यह ऐसी ही बात हुई कि किसी को राजा घोषित करके यह कह दिया जाए कि उसे सिंहासन पर बैठने का अधिकार पन्द्रह वर्ष के बाद ही प्राप्त होगा, और तब तक उसका एक सेवक सिंहासन पर बैठेगा। यहां उल्लेखनीय है कि इज़रायल ने अपनी स्थापना के पहले वर्ष में ही हिब्रू को अपनी राजभाषा घोषित कर दिया गया था-बिना ‘प्रोबेशन’ पर रखे। कारण स्पष्ट है। इज़राइल के नेतृत्व में अपनें राष्ट्र और अपनी भाषा के प्रति जो गौरव और आत्म-विश्वास था, उसका तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं में सर्वथा अभाव था।


भारतीयता में विश्वास की कमी के कारण ही जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के बाद विदेशों में राजदूत के पद एवं अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए चुन-चुनकर उन लोगों को नियुक्त किया जो अंग्रेजी में पारंगत थे, और व्यवहार तथा जीवनशैली में पाश्चात्य। इससे जनसाधारण को यह संकेत गया कि आज़ाद हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ी का अभी भी वही महत्व है जो आज़ादी के पहले अंग्रेजो की गुलामी में था। ईसाई मिशनरी जो अपने अंग्रेज़ी स्कूलों को बन्द करके जाने वाले थे, जाते-जाते रुक गए।


राजभाषा हिन्दी के प्रोबेशन की पन्द्रह वर्ष की अवधि, नेहरू सरकार ने हिन्दी के स्थान पर अंग्रेज़ी को प्रतिष्ठित करने, तथा अन्य भारतीय भाषाओं में हिन्दी के विरुद्ध भावना भड़काने के लिए उपयोग किया। इस परिप्रेक्ष्य में प्रसिद्ध पत्राकार दुर्गादास द्वारा रचित पुस्तक ‘‘इंडिया फ्रॅाम कर्ज़न टु नेहरू एण्ड आफ्टर’’ (कॉलिन्स: पृष्ठ 329-31) से उद्घत दो प्रकरणों का उल्लेख करना समीचीन होगा:


पहला: यह प्रविधानित था कि हिन्दी को पूरी तरह से एकमात्रा राजभाषा बनाए जाने के लिए किए गए प्रयासों का लेखा-जोखा लेने और इस संबंध मे सुझाव देने के लिए एक कमीशन नियुक्त की जाएगी। ऐसी ही कमीशन की रिपोर्ट, संसदीय समिति की सिफ़ारिशों के साथ जब 1958-59 मंे मंत्रिमंडल के सम्मुख तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने प्रस्तुत की, तो नेहरू जी अचानक कहने लगे कि दिल्ली के लोगों की भाषा उर्दू है, इसलिए दिल्ली मे उर्दू को राजभाषा घोषित किया जाना चाहिए। जब पंत जी ने कहा कि केवल छह प्रतिशत दिल्ली वालों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा घोषित किया है, तो नेहरू जी भड़क उठे। उन्होनंे कहा- ‘‘सांख्यिकी (स्टेटिस्टिक्स) गलत हैं।’’ यही नहीं, क्रोध मे उन्होनें यह भी कहा- ‘‘सब बकवास है। हिन्दी मंे वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्द भी नहीं हैं।’’ चर्चा का विषय हिन्दी मे वैज्ञानिक शब्दावली नहीं था, फिर भी नेहरू जी ने इसका उल्लेख हिन्दी के प्रति अपनी विष्तृणा और नफ़रत व्यक्त करने को किया। नेहरू जी के अचानक क्रोध एवं दुर्व्यवहार से गोविंद वल्लभ पंत इतने क्षुब्ध और विचलित हुये कि कुछ ही दिनों में उनको हृदय का दौरा पड़ा, और मृत्यु हो गयी। उनके निकटस्थ सभी का मानना था कि हिन्दी के मामले मे नेहरू जी के दुर्व्यवहार ने उनको इतना अधिक आहत किया, कि उसने उनकी जान ले ली।


दूसरा: मुख्य मंत्रियों के सम्मेलन (जून 1961) में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने यह प्रस्ताव भेजा कि जिस तरह योरोप के सभी देशों की अलग-अलग भाषाएं केवल एक लिपि (रोमन लिपि) का प्रयोग करती हैं, उसी प्रकार यदि भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, तो यह राष्ट्रीय एकता की दिशा में महत्वपूर्ण पग होगा। केरल के मुख्यमंत्री श्री पोट्टम तनु पिल्लई ने राष्ट्रपति के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। और सभी मुख्यमंत्रियों ने एक मत से इस प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए पारित किया। उस बैठक में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी थे, और बंगाल के भी। उनकी भी देवनागिरी लिपि को स्वीकारने की सहमति थीं। विरोध का केवल एक, एकाकी स्वर था। नेहरू मंत्रिमंडल के शिक्षा मंत्री, हुमायूं कबीर ने जो बैठक मे उपस्थित थे, देवनागरी का विरोध करते हुऐ, सब भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि का प्रयोग प्रस्तावित किया। उसे सब मुख्य मंत्रियों ने अस्वीकार कर दिया। उस समय पूरे देश मे हिन्दी के प्रति आस्था थी। कहीं कोई विरोध नहीं था। और जब मुख्य मंत्रियों द्वारा एकमत से पारित देवनागरी लिपि संबंधी प्रस्ताव भारत सरकार मे पहुंचा, तो नेहरू जी और उनकी सरकार ने उसे ठंडे बस्ते मे डाल दिया। राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण अवसर नेहरू जी ने जानबूझकर बिखर जाने दिया। अगर नेहरू जी ने मुख्यमंत्रियों की उस सिफ़ारिश को लागू किया होता, तो बंगाली, तमिल, तेलगू, उड़िया, असमीं, कन्नड़ आदि सभी भाषाएं देवनागरी लिपि मे लिखी जा रही होतीं।


हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाएं


जब देश आज़ाद हुआ था तो विवाद इस बात का था कि देश की भाषा हिन्दी हो, या उर्दू या हिन्दुस्तानी या अंग्रेजी। हिन्दी की प्रतिस्पर्धा किसी अन्य भारतीय भाषा, जैसे तमिल, तेलगू आदि से नहीं थी। कालान्तर में उर्दू और हिन्दुस्तानी के दावेदार अपने आप ही, परिस्थितिवश, परिदृश्य के हट गए। अन्त में केवल हिन्दी और अंग्रेजी के बीच प्रतिस्पर्धा रह गई। किन्तु निहित स्वार्थ ने ऐसा मोड़ दिया जैसे भाषाई विवाद केवल ‘‘हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाएं’’ है, और अंग्रेजी, भारतीय भाषाओं के झगडों के बीच, देश की एकता बनाए रखने के लिए एकमात्र विकल्प है। सरकार और अंग्रेजी समाचार पत्रों ने अंग्रेजी को निष्पक्ष अनिवार्यता के रूप में पूरे देश पर सदा-सदा के लिए थोप दिया। आज स्थिति यह है कि अगर देश की 100 करोड़ जनता हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की मांग करंे और मिज़ोरम के केवल पंाच लाख लोग उसका विरोध करें, तो पंाच लाख लोगों की बात मानी जाएगी, 100 करोड़ लोगों की नहीं। यह है भारतीय प्रजातन्त्र।






सब भारतीय भाषाओं की पराजय


हिन्दी की पराजय केवल हिन्दी की ही पराजय नहीं है। यह सब भारतीय भाषाओं की पराजय है। अंग्रेजी से हिन्दी ही पराजित नहीं है, तमिल, तेलगू, कन्नड़, बंगाली आदि भी पराजित हैं।

आप दिल्ली के अंग्रेजी स्कूल में पढ़े लड़के के सामने बातचीत के दौरान कहें- ‘सैंतीस ’, तो वह तुरन्त आपसे पूछेगा - ‘‘सैंतीस ? क्या माने ?’’ आप सैंतीस का अंग्रेजी में अनुवाद करते हुए बताएंगे - ‘‘थर्टी सेवन’’। वह तुरन्त समझ जाएगा; ‘‘ओह यस, थर्टी सेवन’’। इसी तरह बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि के बच्चे भी बंगाली, तमिल और कन्नड़ में गिनती नहीं समझेंगें। अहिन्दी भाषी भारतीय प्रदेशों में भी नई पीढ़ी के अधिकांश बच्चांे की मातृभाषा धीरे-धीरे अंग्रेजी होती जा रही हं,ै क्योंकि उनकी माताओं की भाषा अंग्रेजी है। वे बच्चे भी अंग्रेजी के अतिरिक्त न कोई भारतीय भाषा जानते हैं, और न जानने की इच्छा रखते हैं। इसलिए तमिल, तेलगू, कन्नड़, बंगाली आदि में भी उत्कृष्ट साहित्य को पढ़ने वालों की संख्या में कमी होती जा रही है। बंगाली की प्रसिद्ध पत्रिका ‘देश’ हर बंगाली घर में वैसी ही अनिवार्य थी जैसी कभी हिन्दी भाषी घरो में ‘धर्मयुग’। आज पाठकों के अभाव में ‘देश’ साप्ताहिक से पाक्षिक हो गया है। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब ‘देश’ भी ‘धर्मयुग’ की तरह बन्द हो जाएगा। यही स्थिति अन्य सभी भारतीय भाषाओं की उत्कृष्ट पत्रिकाओं की है। भारतीय भाषाओं के खण्डहर पर अंग्रेजी के नए नए अकुंर फूट रहे हैं। भारत में अंग्रेजी के पक्षधरों की भी कमी नहीं है।


भारत के अंग्रेजी के पक्षधरों की मानसिकता


पिछली शताब्दी के तीसरे दशक मंे, जब लार्ड विलियम बैंटिक भारत में गवर्नर जनरल था, तब हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी शिक्षा देने की वकालत मैकॉले ने की थी। उसकी दलील थी कि हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा देकर ‘‘एक ऐसे लोगों के वर्ग का निर्माण करना चाहिए, जो रंग और रक्त में हिन्दुस्तानी हों, किन्तु अपनी रुचियों, अपनें चिन्तन, अपने चरित्र और अपने बुद्धि में एकदम अंग्रेज...।’’


मैकॉले का अनुमान कुछ हद तक सही निकला। अंग्रेजी शिक्षा पाकर ‘काले अग्रेजों’ की अनेक पीढियां भारत में उदित हुई हैं। जवाहर लाल नेहरू भी उनमें से एक थे।


जवाहर लाल नेहरू ने पन्द्रह वर्ष की आयु में लण्डन से अपने पिता को लिखा था: ‘‘शिक्षा में हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजों के स्तर तक आने में करोड़ो वर्ष लगेंगे’’। जवाहर लाल नेहरू को उस समय यह नहीं मालूम था कि दो हजार वर्ष पूर्व जब भारत ज्ञान-विज्ञान में विश्व में सबसे आगे था, तब इंग्लैंडवासी पाषाण-युग में थे। वह धातु का उपयोग नहीं जानते थे। वह लोग उस समय पत्थरों के औजारों का उपयोग करते थे। मैकॉले की शिक्षा की काली पट्टी आँखों पर होने के कारण नेहरू जी भारत की संस्कृति की महानता को देखने में असमर्थ थे ।


इक्कीस वर्ष की आयु में कैम्ब्रिज छोड़कर आक्सफोर्ड जाने की अपनी इच्छा का कारण उन्होंने अपने पिता को लिखा- क्योंकि कैम्ब्रिज अब हिन्दुस्तानियों से भर गया है। (स्टेनली बोलपोर्ट, नेहरू, ओ0यू0पी0 पृष्ठ 25) स्पष्ट है मैकॉले की कल्पना को मूर्तरूप करता आधा अंग्रेज, हिन्दुस्तानियों को उतना ही नापसंद करता था, जितना पूरा अंग्रेज।


नेहरू जी जीवन के अन्त तक अपने को अंग्रेज समझते रहे, तब ही तो पचहत्तर वर्ष की आयु में वह तत्कालीन अमरीकी राजदूत गेलब्रेथ से कह सके - ‘‘मैं इस देश पर राज करने वाला अन्तिम अंग्रेज हूं।’’ (बी.आर. नन्दा: रिबल नेहरू)। ये कुछ उदाहरण स्पष्ट करते हैं-नेहरू जी का हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का विरोध और अंग्रेजी के प्रति मोह।


आजादी प्राप्त होने के एक सौ बारह वर्ष पूर्व मैकॉले ने भारत में अग्रेजी प्रतिष्ठित की थी। मैकॉले की मृत्यु भी भारत की आज़ादी के एक सौ आठ वर्ष पूर्व हो गई थी। लेकिन वह आज भी भारत में जीवित है। उसके भारत में मानसपुत्रों की कमी नहीं है, जो जी-जान से भारतीय भाषाओं की क़ब्रों पर अंग्रेजी गुलाब उगाने के सपने देख रहे हैं।


हिन्दी: आज


आज़ादी के इतने वर्ष बाद, आज हिन्दी की स्थिति शोचनीय है। वह पूरी तरह हाशिए पर आ चुकी है। शासन और समाज के केन्द्र में अंग्रेज़ी है, और मात्रा तीन प्रतिशत अंग्रेज़ी जानने वाले लोग। अंग्रेज़ी से पराजित हाने के बाद हिन्दी के समर्थक मन से भी पराजित हो चुके हैं। उन्होंने अपने हथियार डालकर आत्म-समर्पण कर दिया है। सब तरफ अंग्रेज़ी का बोलबाला है। समाज में आज श्रेष्ठत्व का मापदंड अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान बन गया है। जो अंग्रेज़ी जाने वह विद्वान, कुलीन, सभ्य संभ्रान्त। जो अंग्रेज़ी न जाने (चाहे वह संस्कृत या हिन्दी का कितना ही बड़ा बिद्वान क्यों ने हो), वह मूर्ख, मूढ़ गवार, तुच्छ, हीन, छोटा । जो

बच्चे अंग्रेज़ी-माध्यम स्कूलों में पढ़ते है, वह हिन्दी-माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले बालकों से अपने आपको श्रेष्ठ मानते हैं। यही नहीं, हिन्दी-माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी अपने आपको छोटा मानते हैं। हीन-भावना से ग्रसित रहते हैं।


हम लोगों की पीढ़ी के लोग, चौथे तथा पांचवे दशक में गर्व से कहते थे कि हिन्दी हमारी मातृमाषा है। आज महानगरों के मध्यवर्ग के बच्चे न यह कहते हैं, और न कह सकते हैं कि हिन्दी उनकी मातृभाषा (मां के बोलने की भाषा) ह;ै क्योंकि उनकी माताएं अब हिन्दी नहीं बोलतीं। वे सब अंग्रेज़ी बोलती हैं, अतएव उनके बच्चों की मातृभाषा भी अंग्रेज़ी है, हिन्दी नहीं ।

महानगरों के मध्यवर्ग के बच्चे तो थोड़ी बहुत हिन्दी समझ भी लेते हैं, लेकिन उनके कुत्ते तो सिर्फ अंग्रेज़ी समझते हैं। हिन्दी तो ज़रा भी नहीं जानते। उनके कुत्तों से जब उनके मालिक अग्रेज़ी में ‘सिट डाउन’ कहते हैं, तो यह बैठ जाते हैं। अगर उनसे हिन्दी में कहो ‘बैठो’, तो वह ऐसे खडे रहेंगे, जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।


हम लोग अपने बचपन से ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ पढ़ते थे। नया अंक आता था तो घर के सभी सदस्यों में होड़ हो जाती थी कि कौन ‘धर्मयुग’ पहले पाता है, और पढता है। हमारे बाद की पीढ़ी अंग्रेज़ी स्कूलों में पढी हैं। उसे कामचलाऊ हिन्दी आती है, किन्तु हिन्दी भाषा के प्रति न उसमें लगाव है, और न उसके साहित्य में रुचि। पाठकों के अभाव में ‘धर्मयुग’ बन्द हो गया, और कुछ वर्षों बाद ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ भी। आज मध्यवर्ग की नई पीढ़ी तो हिन्दी और भी कम जानती है। इसीलिए आज हिन्दी में एक भी लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका नहीं है।


यह सही है कि आज हिन्दी अख़बारों के वितरण की संख्या अभूतवपूर्व है। हिन्दी ही नहीं, समी भारतीय भाषाओं के अख़बारांे का वितरण, अंग्रेज़ी अखबारों की अपेक्षा कहीं अधिक है, और लगातार बढ़ रहा है। इसका कारण यह है कि अंग्रेज़ी जानने वाले मात्र तीन प्रतिशत हैं। शेष सत्तानवे प्रतिशत में जैसे-तैसे साक्षरता का विकास हो रहा है, और हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं के अखबारों की माग बढ रही है। किन्तु इन नए साक्षरों का सांस्कृतिक स्तर सामान्य है। उच्च साहित्यिक कृतियों को पढ़ने और समझने की क्षमता उनमें नहीं है। इसलिए जहां श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाएं बन्द हो रही हैं, वहीं सामान्य कोटि के अखबार, सस्ते मनोरंजन से भरपूर पत्रिकाएं, रहस्य-रोमांच आदि के प्रकाशनों की वृद्धि हो रही है। यहां यह तथ्य पुनः रेखांकित करना उचित होगा कि निर्णय करने वाले उच्च वर्ग की भाषा अंग्रेज़ी है, और उनकी प्रेरणा के स्त्रोत और आदर्श पश्चिमी देश।


अक्सर यह कहते हुए सुना जाता है कि हिन्दी के समर्थक अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं। यदि वह चाहते है कि देश में अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी राजभाषा बने, तो उन्हें सबसे पहले अपने बच्चों को स्वयं हिन्दी स्कूलों में भेजना चाहिए। इस आक्षेप के पीछे तर्क यह है कि हिन्दी समर्थक अगर अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में न भेजकर हिन्दी स्कूलों में भेजेंगे, तब ही अन्य लोग भी हिन्दी को वरीयता देंगे। यह तर्क बहुत ही सतही और खोखला हैं। एक सामान्य व्यक्ति के व्यवहार से पूरे देश की नीति और प्रवृत्ति प्रभावित नहीं होती। कोई हिन्दी समर्थक अपने बच्चों को केवल हिन्दी की शिक्षा देकर उनके भविष्य को नष्ट करने का जोख़िम नहीं उठा सकता। अपने व्यक्तिगत आदर्शाें और मान्यताओं पर किसी को अपनी सन्तान के भविष्य की बलि चढ़ाने का अधिकार नहीं हैं। व्यक्तियों के निजी कार्यों से देश की दिशा नहीं बदलती। देश नई दिशा तभी अपनाता है, जब उस देश के राजनैतिक नेतृत्व में नई दिशा पर चलने की इच्छा-शक्ति होती हैै। यद्यपि संविधान निर्माताओं ने पन्द्रह वर्षों में हिन्दी को राज्यभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का निर्णय लिया था, किन्तु राजनैतिक नेतृत्व में न निष्ठा थी, और न इच्छाशक्ति, इसलिए इतने बर्षाें बाद भी राजभाषा बनकर भी वनवासित हैं।


आज होटल का जो बेयरा अंग्रेज़ी जानता है, वह अच्छा, जो केवल हिन्दी जानता है, वह बेकार। आज मोटर मैकेनिक, नाई, दर्जी, सेल्समैन, चपरासी, स्वागती, आदि के लिए भी अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। बडी दुकान में कोई हिन्दी में बात कहे, तो उस पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। वहीं अंग्रेज़ी में कोई बात करे, तो दुकान के सभी कर्मी उसे आदर की निगाह से देखेंगे और मुस्तैदी से जवाब देंगे।

राजनेताओं मंे डा. राम मनोहर लोहिया ने हिन्दी का परचम उठाया था। उन्होंने ‘‘अंग्रेजी हटाओ’’ आन्दोलन का भी सूत्रपात किया था। किन्तु उनकी असामयिक मृत्यु के साथ ही हिन्दी-आन्दोलन का भी अवसान हो गया।

आज अंग्रेज़ी का ज्ञान वर्ग-वैशिष्ट्य का द्योतक (स्टेटस सिंबल) है। पूरे समाज की यह मानसिकता बन गई है कि अंग्रेजी का ज्ञान अभिजात्य का परिर्यायवाची है। सुसंस्कृत और सभ्य होने का लक्षण है। सामाजिक आरोहण का एकमात्र पथ है।


इसी मानसिकता के कारण विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों की संख्या गिरती जा रही है। हिन्दी अध्यापकांे के पास काम नहीं है। उनके अवकाश-प्राप्ति करने पर उनकी जगह नए अध्यापक भर्ती नहीं किए जा रहें हैं।


हिन्दी सिनेमा के माध्यम से लाखों करोड़ों अर्जित करने वाले सितारे, फिल्म के बाहर, सामान्य बातचीत प्रायः अंग्रेज़ी में ही करते हैं।


हिन्दी के प्रथम प्रकाशनों की संख्या कभी ज्यादा नहीं रही। पहले 1000 पुस्तकों के संस्करण छपते थे, अब मुश्किल से 500 या 300 के।


पहले श्रेष्ठ हिन्दी कवियों को सुनने हजारो लोग उमड़ पड़ते थे। कवि बच्चन की लोकप्रियता किसी सितारे से कम नहीं थी। महादेवी, पन्त, निराला का नाम संभ्रान्त परिवारों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता था। आज हिन्दी लेखक को न कोई पढ़ता है, न जानता है और न उसका कोई सम्मान है।


दूरदर्शन पर अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी पर समाचार सुनाए जाते हैं। ‘हिंगलिश’ का विस्तार और प्रभाव दोनों ही बढ़ रहे हैं। दूरदर्शन पर ‘हिंगलिश’ का प्रारंभ तब हुआ था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। शुद्ध हिन्दी बोलने वालांे को लोग विदूषक की तरह देखते हैं। फिल्मों में भी शुद्ध हिन्दी बोलने का काम अक्सर हास्य-चरित्र को दिया जाता है। जैसे हिन्दी भाषा नहीं, कोई मज़ाक है।


दूरदर्शन तथा अन्य चैंनलों पर ‘हिगलिश’ के माध्यम से की जा रही दुर्गति और अत्याचार के विरुद्ध किसी हिन्दी वाले ने आज तक कोई आवाज़ नहीं उठाई। हिन्दीभाषी अंग्रेज़ी से पराजित ही नहीं हुए हैं, उनका मनोबल भी टूट चुका है।


हिन्दी के समाचार पत्रो में प्रायः अंग्रेज़ी के स्तंभकारों -जैसे कुलदीप नायर, खुशवन्त सिंह, अरुण शौरी के स्तंभ अनुवादित होकर छपते हैं। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में स्तंभलेखकों की कमी है। कमी हैं तो हिन्दी अखबारों के हीनताग्रस्त संपादकों और मालिकों की मानसिकता में।


आज हिन्दी पत्रिकाओं के नाम भी अंग्रेजी में होते हैं। मकानों, दुकानों, कारखानों- सभी जगह नामपट्ट अंग्रेज़ी के लिखे होते हैं । विवाह, मुंडन, टूंडन आदि जैसे पारिवारिक आयोजनों के निमंत्रण भी अंग्रेज़ी में छापे जाते हैं। यही नहीं, दो प्रेमियों की बीच नितान्त व्यक्तिगत प्रेमालाप भी अक्सर अग्रेजी में होता है, और प्रेम-पत्र भी अंग्रेजी में लिखे जाते हैं।


सरकार ने दिखाने के लिए कुछ हिन्दी अकादमियाँ स्थापित की हैं। हिन्दी वालांे को चुप रखने के लिए कुछ पुरस्कार स्थापित किए हैं, कुछ छोटे-बड़े आयोजन किए हैं; हिन्दी के नेताओं को विश्व भ्रमण करवाया है। किन्तु पिछले पचास वर्षों में हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने और उसे समाज में आदर दिलवाने के लिए कुछ नहीं किया। प्रशासनिक स्वीकृति से विहीन और रचनात्मक ओज से वंचित हिन्दी के कभी इतने दुर्दिन नहीं थे।


हिन्दी: आने वाला कल


भविष्य में हिन्दी का क्या स्वरूप होगा, यह देश की राजनेैतिक परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा। पिछले वर्षों में देश में मिली-जुली सरकारें आती रहीं थीं, जिन्होने हिन्दी की स्थिति और अधिक दयनीय कर दी थी। कोई भी मिली-जुली सरकार हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात नहीं करती। उसे हमेशा डर बना रहता है कि अगर उसने हिन्दी की पक्षधरता की, तो अहिन्दी भाषी प्रदेशों की क्षेत्रीय पार्टियां रुष्ट हो जाएंगी, और वह मिली-जुलीं सरकार से अलग होकर, उसे तोड़ सकती हैं। मिली-जुली सरकारों के दौर में राष्ट्रीय पार्टियों की अपेक्षा क्षेत्रीय पार्टियां अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं। केवल राष्ट्रीय पार्टियां ही पूरे देश के परिप्रेक्ष्य से एक राजभाषा की बात सोच सकती हैं। क्षेत्रीय पार्टियों के चिन्तन में अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य का अभाव होता है, अतएव वह कभी भी हिन्दी को पूरे देश की एक राजभाषा स्वीकार करने में सहमत नहीं होंगी।


जब जब मिली-जुली सरकार आएगी, तब तब हिन्दी की दयनीय स्थिति और अधिक शोचनीय हो जाएगी। अंग्रेज़ी का वर्चस्व और अधिक बढे़गा। तीन प्रतिशत अंग्रेज़ी जानने वाले लोगों की संख्या बढ़कर साढ़े तीन प्रतिशत हो सकती है। किन्तु अंग्रेजी जानने वाले लोगों का प्रभुत्व और दबदबा उनकी संख्या के अनुपात में कहीं अधिक होगा। अंग्रेज़ी जानने वाले लोगों और अंग्रेज़ी न जानने वाले लोगों के बीच खाई और फासला बहुत बढ़ जाएगा। अंग्रेज़ी ही सभ्य और सुसंस्कृत होने की एकमात्र पहचान रह जाएगी। जो अंग्रेजी जानेगा, उसी का महत्व होगा, उसकी ही पहचान होगी। जो अंग्रेज़ी नहीं जानेगा, वह महत्वहीन होगा; पहचान विहीन, जैसे वह है भी, तो नहीं होने के बराबर है। उसका होना या न होना, कोई माइने नहीं रखेगा। जैसे गांव में भेड़-बकरियं, वैसे ही समाज में अंग्रेज़ी अनपढ़े लोग। इसका यह अर्थ नहीं कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाएं एकदम समाप्त हो जाएगी। करोड़ों लोग तब भी हिन्दी, तमिल, तेलगू आदि भारतीय भाषाएं बोलेंगे, लेकिन उनकी बोली का वही महत्व होगा, जो आज भील, मुंडा, ओराँव, माड़िया आदि जनजातीय बोलियों का समाज की मुख्य धारा में है।



‘हिंगलिश’ के जन्म की आशंका


सन 1192 से पृथ्वीराज चौहान को धोके से हराकर मोहम्मद गौ़री ने मारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव डाली थी। मुहम्मद ग़ौरी से लेकर बाबर तक, प्रायः साढे तीन सोै सालों तक सभी मुस्लिम राजवंशों की जब़ान तुर्की थी। लेकिन जब शेरशाह सूरी से हारकर हुमायूं ने सोलहवीं शताब्दी में ईरान में शरण ली, तो वह पन्द्रह वर्षांे के प्रवास में पूरी तरह ईरानी रग में रंग गया। और जब भारत लोैटा, तो उसने तुर्की की जगह फा़रसी को अपने दरबार की भाषा बनाया।


मुगलों के लगभग तीन सौ सालों के शासन काल में फ़ारसी ही संम्रान्त होने की पहचान बन गई। मुगल हुकूमत में नौकरी पाने के लिए सभी को, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, फारसी पढ़नी पड़ती थी। लेकिन फ़ारसी इतनी आसान नहीं थी कि सब हिन्दुस्तानी उसे सीख लेते। सिर्फ थोडे़ से लोग ही फ़ारसी में महारत हासिल कर, शासकों कि पंक्ति तक पहँुच पाते थे। शेष, हिन्दी को ही फ़ारसी लिपि में लिखकर संतोष करते थे।


कालान्तर में फ़ारसी लिपि में लिखी जाने वाले हिन्दी एक अलग नई भाषा-उर्दू के रूप में जानी जाने लगी। अब उर्दू का एक स्वतन्त्र अस्तित्व है। उसका अपना साहित्य है। उसके अपने समर्थक हैं।


अगर अंग्रेजी का कुछ काल तक वैसा ही वर्चस्व बना रहा, जैसा कभी उर्दू का था, तो सामान्य हिन्दुस्तानी जो अपनी आर्थिक या बौद्धिक सीमाओं के कारण अंग्रेजी नहीं सीख सकेगा, हिन्दी को रोमन लिपि में लिखकर संतोष करेगा। कालान्तर में रोमन लिपि में लिखी हिन्दी का एक भाषा के रूप में अलग अस्तित्व विकसित होगा, जैसे फ़ारसी लिपि में लिखी हिन्दी का ‘उर्दू’ नाम से जन्म हुआ था। रोमन लिपि में लिखित हिन्दी के लिए ‘हिंगलिश’ नाम इधर प्रचार में आने लगा है। प्रतिस्ठित हिन्दी के समाचार-पत्रों में हिंगलिश का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है।


राजीव गांधी के समय से ही दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों में हिन्दी-अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा का प्रयोग होने लगा था। इधर उदारीकरण के युग में जब टी0वी0 की विदेशी चैनलों का प्रादुर्भाव हुआ, तब से तो आधी हिन्दी और आधी अंग्रेजी की खिचड़ी भाषा के प्रयोग की जैसे बाढ़ ही आ गई है। समाज में भी अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी बोलना अभिजात्य-लक्षण मान लिया गया है। कालान्तर में जब हिन्दी-अंग्रेज़ी की खिचडी (जो अब तक केवल बोलने तक ही सीमित है) लिखने में रोमन लिपि में प्रचलित होगी, तो ‘‘हिंग्लिश’’ उर्दू के समान ही, एक अलग भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होगी। उसके समर्थक, ‘हिंग्लिश’ में साहित्य रचेंगें, कवि-सम्मेलन करेंगे, सरकार से उसकी मान्यता के लिए संघर्ष करेंगे। मिली-जुली सरकारें स्वभावतः कमज़ोर सरकारें होती हैं। वे तुरन्त ही ‘हिंगलिश’ को भारतीय भाषा के रूप में मान्यता दे देगी। पूरे देश पर अंग्रेजी छा जाएगी - उच्च वर्ग में, उनकी मातृभाषा के रूप में, और निचले वर्गाें में ‘हिंगलिश’ के माध्यम से। उस समय लोग भूल जाऐंगे कि कभी पूरे देश के लोगों ने हिन्दी को राजभाषा के रूप ने स्वीकार किया था।

हिन्दी के अच्छे दिन

उपरोक्त कलिमामय परिदृष्य में प्रधानमंत्री मोदी जी ने एक प्रकाश की उज्जवल रेखा खींच दी है। इससे हिन्दी के भविष्य के प्रति कुछ आशा बनती है। 1950 के दशक में चीन और रूस के प्रधानमंत्री/अध्यक्ष प्रायः आया करते थे। तब भारतीय जन देखते थे कि चीनी अतिथि अपने देश की भाषा चीनी में बोलते थे, और रूसी अतिथि रूसी भाषा में। दुभाषिए इनका अनुवाद हिन्दी/अंग्रेजी में करते थे। किन्तु हमारे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने देश की भाषा न बोलकर अंग्रेजी में बोलते थे। नेहरू जी को ‘‘निज भाषा और न निज देश पर अभिमान’’ नहीं था। इसीलिए वह विदेशी भाषा का सहारा लेते थे। अब बात बदल गई है। प्रधानमंत्री मोदी विदेशी मंचो पर अभिमान से हिन्दी बोलते हैैं। जिसमें उनका अपने देश और अपनी भाषा के प्रति सम्मान और गर्व झलकता है। अब लगता है, वर्षों बाद हिन्दी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं।



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