हिंदी का विस्तार : उर्दू का योगदान

आधुनिक भारत के इतिहास में हिंदी और उर्दू भाषाएं प्रतिद्वंदी के रूप में उभर कर आतीं हैं | भारतीय प्रशासन और जनमानस पर दावेदारी करती ये भाषाएँ सतत द्वन्द और संघर्ष करती दिखायीं पड़ती हैं | इस सन्दर्भ में यदि ये कहा जाए कि वर्तमान काल में हिंदी के अखिल भारतीय और अखिल पाकिस्तानी विस्तार का श्रेय अधिकांशतः उर्दू को जाता है, तो सहसा विश्वास नहीं होगा | अतएव इस कथन की सत्यता के परीक्षण की आवश्यकता है |


बारहवीं शताब्दी के भारत के भाषाई परिदृश्य में क्षेत्रीय विविधता दिखाई पड़ती है | हर क्षेत्र में अलग – अलग जनभाषाएँ बोली जाती थीं | उत्तर भारत में दिल्ली के आसपास ’खड़ी बोली’ का प्रचलन था | वर्तमान उत्तर प्रदेश तथा बिहार में बुन्देली, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिलि, वज्जिका आदि बोली जातीं थीं। इनमें ब्रज, अवधी और मैथिलि सर्वाधिक विकसित भाषाएँ थीं। इनमें रचित साहित्य भी उच्चकोटि का था।


मथुरा-वृन्दावन कृष्ण भक्ति के केंद्र थे, तथा अयोध्या-मिथिला रामभक्ति का। भक्ति-केंद्र होने के कारण वहाँ साधु-संतों, विद्वानों, कवियों, कलाकारों, चित्रकारों, गायकों, नर्तकों आदि का जमाव होता था। इसके कारण ब्रजभाषा, अवधी और मैथलि में, अन्य भाषाओं की तुलना में अपेक्षाकृत प्रचुर और श्रेष्ठ साहित्य रचा गया। इन भाषाओं के समान खड़ी बोली विकसित नहीं थी। वह साहित्यिक दृष्टि से दरिद्र थी।

तुर्की का दबदबा

सन ११९२ में, तरायन के युद्ध में मुहम्मद गौरी से पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद देश में इस्लामी हुकूमत स्थापित हो गयी | गौरी तुर्क प्रजाति (नस्ल ) का था | उसकी भाषा तुर्की थी | तुर्की भाषा अरबीलिपि में लिखी जाती थी। इसका कारण था| जब दसवीं शताब्दी में अरबी लोगों ने मध्य एशिया में बसे तुर्की प्रजाति को पराजित कर उसको इस्लाम में परावर्तित किया, तो उसकी भाषा तुर्की को अरबीलिपि में लिखना अनिवार्य कर दिया। इसके फलस्वरूप तुर्कीजन धीरे धीरे अपनी मूलतुर्की लिपि भूल गए, और उसे अरबीलिपि में ही लिखने लगे। अतएव जब बारहवी शताब्दी के अंत में जब तुर्की साम्राज्य भारत में स्थापित हुआ तो शासकवर्ग तुरकी बोलता था, किन्तु तुर्की को अरबीलिपि में लिखता था।

तुर्की विजेताओं की राजधानी दिल्ली थी | तुर्की शासकवर्ग दिल्ली में अपने नौकरों, चाकरों, दरबानों, चौकीदारों, नाइयों, धोबिओं, पालकी उठाने वाले कहारों, सईसों, सिपाहियों, गायकों, नर्तकों, साजिंदों, वेश्याओं आदि के संपर्क में दिनरात आया, जो प्रायः खड़ीबोली बोलते थे | तुर्की शासक, अपनी बोली से भिन्न, इन हिन्दुस्तानी सेवकों की भाषा खड़ीबोली को ‘हिंदी’/हिन्दवी (अर्थात हिंद की भाषा) कहने लगे | कालान्तर में हिंदी शब्द खड़ीबोली का पर्यायवाची बन गया |


हिंदुस्तान में रहते हुए, कुछ शताब्दियों में तुर्की विजेता स्वयं खड़ीबोली बोलना सीख गए | तुर्की प्रजाति के सुल्तानों जैसे कुतबुद्दीन ऐबक, अल्तमश, बलबन, अलाउद्दीन खिलजी, आदि की फ़ौज में बहुसंख्यक हिन्दुस्तानी थे | वे हिन्दू हों या परावर्तित मुसलमान – दोनों ही तरह के हिन्दुस्तानी खड़ीबोली बोलते थे। इन दोनों तरह के हिंदुस्तानियों के साथ संचार करने के लिए भी तुर्की-शासकों को खड़ीबोली बोलनी पड़ती थी। वे नागरी लिपि नहीं जानते थे, इसलिये सिपाहियों को खड़ी बोली में दिये जाने वाले आदेश को वह पहले अरबीलिपि में लिखते थे। कालांतर में खड़ीबोली को दो लिपियों में लिखने की परंपरा का विकास हुआ। खड़ीबोली परंपरागत रूप में, पहले के समान, नागरी लिपि में लिखी जाती रही। साथ ही तुर्की जानने वाले विदेशी उसे अब अरबी लिपि में भी लिखने लगे। छावनियों में, अरबी लिपि में लिखी खड़ीबोली का सर्वाधिक प्रसार था। तुर्की भाषा में उर्दू का अर्थ छावनी होता है | अतएव अरबीलिपि में लिखी खड़ी बोली को लोग उर्दू कहने लगे |


अमीर खुसरो का पिता तुर्क था | उसने एक हिन्दुस्तानी महिला से विवाह किया था | इस प्रकार अमीर खुसरो की माता और नाना हिदुस्तानी थे, जिनकी मातृभाषा खड़ीबोली थी | उनके साथ पले बढे अमीर खुसरो को खड़ीबोली अच्छी तरह आती थी | इसलिए उसने अपनी शायरी तुर्की भाषा के अलावा खड़ीबोली में भी की | लेकिन खड़ीबोली की रचनाओं के लिए उसने अरबी लिपि का प्रयोग किया | अतएव अमीर खुसरो की खड़ीबोली की रचनाओं को हिंदी भी कहा जा सकता है, और उर्दू भी |


दक्कनी हिंदी

कालान्तर में मुस्लिम राजवंशों की अगली पीढ़ियों में खड़ीबोली का प्रयोग धीरे धीरे बढ़ा | भारतीयकरण के साथ वे द्विभाषिए हो गए | वे खड़ीबोली भी उसी कुशलता से बोलने और समझने लगे जैसे तुर्की बोलते और समझते थे | और जब उनके शासन का विस्तार दक्षिण भारत में हुआ, तो लाखों की संख्या में सैनिक और सैनिक अधिकारी अपने साथ ‘हिंदी’ भी वहां ले गए | और जब मोहम्मद तुगलक ने दिल्ली के एक एक निवासी को दौलताबाद जाने का आदेश दिया, तो भी लाखों की संख्या में खड़ीबोली बोलने वाले नर्मदा पार कर के दक्षिण भारत पहुँच गए | दिल्ली से दूर जाने के बाद तुर्की अधिकारियों का तुर्कीभाषा का ज्ञान धीरे धीरे क्षरित हो गया। खड़ीबोली उनकी अभिव्यक्ति की मुख्य भाषा बन गई। दक्षिण में खड़ीबोली 'दक्किनी हिन्दी' के नाम से विख्यात हुई। इस तरह आरंभ हुआ दक्षिण भारत में हिन्दी का विकास और विकसित हुई दक्किनी हिन्दी। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है दक्किनी हिन्दी के कवि और बीजापुर के सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय (1526-1610) की रचना:-

ज़बान हिंदवी मुंज सो हूँ देहलवी।

न जानब अरब और अज़ब मसनवी।।

(मैं दिल्ली की ज़बान हिंदवी जानता हूँ। न मैं अरबी जानता हूँ,न फारसी।)


फ़ारसी का रुतबा

सन १५२६ में इब्राहीम लोदी को परास्त करके बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली | बाबर तुर्की भाषा बोलता था | किन्तु हुमायूँ ने तुर्की के स्थान पर फ़ारसी को मुग़ल हुकूमत की भाषा बनाया | सन १५४० में शेरशाह सूरी से पराजित हो कर हुमायूँ ने ईरान में शरण ली। वह पंद्रह वर्षों तक ईरान के सुल्तान क संरक्षण में रहा | इस अवधि में उसका पूरी तरह फारसीकरण हो गया | ईरान के सुल्तान ने हुमायूँ को जिन शर्तों पर भारत को पुनः विजय करने के लिए सैनिक सहायता दी थी, उनमे एक शर्त यह भी थी कि वह फारसी को तुर्की के स्थान पर मुग़ल शासन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करेगा | इस तरह भारत में तुर्की का स्थान फारसी ने ले लिया |


मुगल शासन में ऊंची या नीची नौकरी पाने के लिए फारसी का ज्ञान आवश्यक था। इसलियर हर हिन्दुस्तानी को जो मुगल हुकूमत के अंतर्गत नौकरी चाहता था, उसके लिए फारसी पढ़ना मजबूरी थी। उस काल में पढे-लिखे होने का अर्थ था, फारसी भाषा में पारंगत होना। इस तथ्य को व्यक्त करती हुई एक लोकोक्ति प्रचलित है:-

हाथ कंगन को आरसी क्या?

पढे लिखे को फारसी क्या?


हुकूमत की भाषा के तुर्की से फारसी हो जाने के बाद भी, सामान्यजन की भाषा में कोई अंतर नहीं आया। दिल्ली के आसपास के लोग पहले भी खड़ीबोली बोलते थे, और आज भी भी बोलते हैं। पहले भी खड़ी बोली को नागरी लिपि में लिखते थे, आज भी लिखते हैं। जब तुर्की भाषा का दबदबा था, तब खड़ीबोली अरबी लिपि में लिखी जाती थी | और जब फ़ारसी भाषा का वक्त आया, तब भी खड़ीबोली अरबी लिपि में ही लिखी जाती रही | दोनों ही स्थितियों में अरबी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ीबोली को उर्दू कहा जाता रहा |


फोर्ट विलियम कॉलेज

भारत में आधिपत्य के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन १८०० में कोलकाता में फोर्ट विलियम कोलेज स्थापित किया | इसका मुख्य उद्देश्य, इंग्लॅण्ड से आने वाले कम्पनी के कर्मचारियों को भारत की संस्कृति, भाषाओँ, धर्मों अदि से अवगत करवाना था, जिससे वे भारत में कम्पनी का प्रशासन सुचारु रूप से चला सकें | फोर्ट विलियम कॉलेज ने लिपि के आधार पर हिंदी और उर्दू के विभेद को मान्यता दी | नागरी लिपि में लिखी खड़ीबोली को हिंदी तथा अरबी लिपि में लिखी खड़ीबोली को उर्दू का नाम स्थायी रूप से निश्चित कर दिया।


हिन्दी और उर्दू, दोनों एक ही भाषा के दो नाम हैं, इसलिए सत्रहवीं-अठारवीं शताब्दियों में अरबी लिपि में लिखी खड़ीबोली की रचनाओं को हिन्दी/हिंदवी/रेख़ता आदि भी कहा जाता था। दोनों भाषाओं के अलग अलग अस्तित्व की स्थापना से दोनों ही भाषाओं में अपने अपने अलगाव को प्रतिष्ठित करने की होड़ लग गई। इसके चलते जहां हिन्दी में संस्कृतनिष्ठ शब्दों का समावेश हुआ, वहीं उर्दू में अरबी/फारसी के शब्दों को कोशिश करके भरा गया।


फारसी का पतन

सन १८३३ में ईस्ट इंडिया कंपनी ने फारसी के स्थान पर अंग्रेजी को राजभाषा घोषित किया | राजभाषा के पद से पतन के पश्चात फारसी का समाज में महत्त्व एकदम समाप्त हो गया। पहले मुगल हुकूमत में, सत्ता के निकट पहुँचने और भागीदारी के लिए फारसी का ज्ञान अनिवार्य शर्त थी। शहजादों, अमीरों, आलिमों, और इज्ज़तदारों की ज़बान फारसी थी। अब फारसीदाँ का हुकूमत या समाज में कोई उपयोग नहीं था। फारसी की इस दुर्गति पर एक लोकोक्ति प्रचालित है:-

पढ़ो फारसी बेचो तेल।

यह देखो किस्मत का खेल।।


ईस्ट इंडिया कंपनी ने अँग्रेजी को राजभाषा घोषित करने के साथ ही निचली अदालतों और दफ्तरों के लिए उर्दू को मान्यता दी। फ़ारसी के राजभाषा पद से स्खलित हो जाने पर अधिकाँश हिन्दुस्तानियों (हिन्दू और मुसलमान दोनों) ने फ़ारसी से नाता तोड़ दिया | हिन्दुओं ने फ़ारसी के स्थान पर अंग्रेजी का पल्ला पकड़ा | मुगल हुकूमत की समाप्ति से नाराज़ मुसलमान फारसी के स्थान पर उर्दू से चिपक गए | इसका मुख्य कारण धार्मिक था। बचपन से ही कुरान शरीफ पढ़ने से वे अरबी लिपि से परिचित हो जाते हैं। इसके कारण अरबी लिपि में लिखी उर्दू भाषा को वह आसानी से सीख और पढ़ सकते हैं। इसलिए वे स्वाभाविक रूप से उर्दू के हिमायती हो गए। परिणाम स्वरूप यह स्थापित हो गया कि हिंदी हिन्दुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है |


देश में मुग़ल शासन की समाप्ति के बाद, तथा फारसी के राजभाषा के पद से हटाये जाने के बाद मुसलमानों ने उर्दू को अपनी पहचान के रूप में अपनाया | विभाजन के पूर्व, मोहम्मद अली जिन्ना ने बार बार घोषित किया था की उर्दू मुसलामानों की भाषा है | इसकी प्रतिक्रिया में जो हिन्दू परिवार अब तक उर्दू के हिमायती थे और उसे अपनाए हुए थे, उन्होंने भी उर्दू को त्याग दिया |

पाकिस्तान में उर्दू के साथ हिन्दी का विस्तार

देश के विभाजन के बाद, पाकिस्तान में उर्दू को राजभाषा घोषित किया गया | इस घोषणा के विरुद्ध विद्रोह कर के बांगला देश पाकिस्तान से अलग हो गया | अब पाकिस्तान में चार प्रांत हैं --- सिंध, पंजाब, बलोंचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा | इनमे से किसी भी प्रान्त की अपनी भाषा उर्दू नहीं है | इनकी अलग अलग भाषाएँ हैं। सिंध में सिंधी, पंजाब में पंजाबी, बलोचिस्तान में बलोची तथा खैबर पख्तूनख्वा में पश्तो सदा से बोली जाती है | इन भाषाओँ से अलग, पाकिस्तान की एक मुस्लिम पहचान बनाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को पाकिस्तान की राजभाषा घोषित किया | इसका परिणाम यह हुआ है कि पिछले साठ वर्षों में पाकिस्तान के चारों प्रान्तों के लोग अब उर्दू बोलना और समझना सीख गए हैं | इन प्रान्तों के सामान्यजन, जो केवल सिन्धी, बलोची , पश्तो या पंजाबी जानते थे, अब उर्दू के माध्यम से हिंदी भी समझने लगे हैं| उर्दू का प्रचार अप्रत्यक्ष रूप से खड़ीबोली का ही प्रचार है | इसी कारण पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता भारत से कम नहीं है |


भारत के अहिन्दी प्रदेशों के मुसलमानों में उर्दू द्वारा हिन्दी का प्रसार

पाकिस्तान के चारों प्रान्तों के समान कश्मीर घाटी भी अहिन्दी-भाषी है | मुसलिम बहुल इस प्रदेश के लोगों की मातृभाषा कश्मीरी है | किन्तु पाकिस्तान के सामान, कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री शैख़ अब्दुल्ला ने, जो मुस्लिम अलगाववादी सोच के थे, पाकिस्तान के समान कश्मीरीभाषी कश्मीरियों पर उर्दू थोप कर उसे राजभाषा का दर्जा दिया | कश्मीर के अतिरिक्त भारत के बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, असम, महाराष्ट्र, गुजरात आदि प्रदेशों के मुसमान भी सैकड़ों वर्षों से अपने प्रदेश की भाषा बोलते रहें हैं | वे उर्दू या हिंदी नहीं जानते थे | मुंबई, कोलकता जैसे महानागर इसके अपवाद हैं | किन्तु विभाजन के बाद से ही, मुस्लिम राजनैतिक और मज़हबी नेतृत्त्व, इन अहिन्दीभाषी प्रदेशों के मुसलमानों को उर्दू में प्रशिक्षित करने में संलग्न है | उनमें अलगाव की भावना जागृत करने के उद्देश्य से, उनकी कोशिश है कि सम्पूर्ण भारत के मुसलमान अलग अलग भाषाएँ न बोल कर केवल उर्दू बोलें | इस प्रकार गैर-मुसलमानों से अलग, हिंदुस्तान और पाकिस्तान में, मुसलमानों की पहचान बनाने के लिए उर्दू का प्रचार और विस्तार किया जा रहा है |


उर्दू के साथ हिंदी का विस्तार

पाकिस्तान के चारों प्रान्त पूर्णरूपेण अहिन्दी भाषी थे | उर्दू के प्रचार के कारण, आज वहां हिंदी समझी जाती है | इसी प्रकार भारत के अहिन्दी प्रदेशों के मुसलामानों में भी, उर्दू के प्रचार के कारण, हिंदी बोली और समझी जाती है | आज़ादी के पूर्व इन प्रदेशों के मुसलमान हिंदी से नितांत अनभिज्ञ थे | किन्तु अब ऐसा नहीं है| हिंदी और उर्दू के बीच अंतर केवल लिपि का है| भाषा में कोई अंतर नहीं है | मूलरूप में ये दोनों एक ही भाषा हैं | इसलिए जहां जहां उर्दू पहुँच रही रही है, वहां हिंदी अपने आप पहुँच रही है | आज हिंदी फ़िल्में, हिंदी टीवी, हिंदी संगीत आदि की मांग उन क्षेत्रों में बढ़ी है, जहाँ पहले हिंदी का एक शब्द भी बोलने और समझने वाला कोई नहीं था | इनके माध्यम से भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्य अहिन्दीभाषी मुसलमानों तक पहुँच रहें है, जो इस्लामी अलगाववाद को समाप्त कर, हिन्दू-मुस्लिम सौमनस्य की दिशा में महत्त्वपूर्ण पग है | पाकिस्तान और हिंदुस्तान के उर्दूभाषी मुसलमानों में हिंदी के अप्रत्यक्ष प्रचार के लिए, हिन्दीवालों को मोहम्मद अली जिन्ना तथा इस्लामी नेतृत्त्व का कृतज्ञ होना चाहिए |

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