मैकॉले मुस्करा रहा है

राष्ट्र के निर्माण में भाषा का महत्व नींव के पत्थर के समान है। जैसे नींव का पत्थर कमजोर हो जाए या अपने स्थान से हिल जाए तो भवन गिर जाता है, उसी प्रकार भाषा के नष्ट होने या काट दिए जाने पर राष्ट्र भी पतित हो जाता है। आज भारत में हिन्दी ही नहीं, अपितु अन्य सभी राष्ट्रीय भाषाओं, जैसे तमिल, तेलगू, बंगाली आदि भाषाओं का अवमूल्यन हुआ है। उसका मुख्य कारण है देश में राष्ट्रवाद का क्षरण।


इतिहास साक्षी है कि सभी आक्रमणकारी, पराजित देशों पर अपना आधिपत्य सुदृढ़ करने से पहले, उनकी भाषा नष्ट करते हैं। अरबी साम्राज्यवादी इस्लाम का विस्तार जब मिश्र, ईरान, तुर्की, अफगानिस्तान आदि देशों में हुआ, तो उसने वहां अरबी भाषा को थोपा। इन देशों की प्राचीन भाषाओं और लिपियों को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट करके, उनको अपने गौरवशाली अतीत से काट दिया। भाषा के साथ विजित देशों का आत्मविश्वास भी तोड़ दिया। साउथ अमेरिका के ब्राजील में पुर्तगाली बोली जाती है और क्यूबा, चिली, मैक्सिको, अर्जेण्टीना आदि देशों में स्पेनिश भाषा, क्योंकि इन देशों को विदेशियों ने आक्रंात कर अपनी भाषाएँ थोप दी थी।


राष्ट्रीय चेतना और भाषा के रिश्ते का सर्वाधिक सटीक रूपायन इंग्लैण्ड के इतिहास से प्राप्त होेता है। सन् 1066 में नॉरमन (फ्रांसीसी वंशज) राजा विलियम ने इंग्लैण्ड को पराजित करके वहां नॉरमन शासन की नींव डाली। उसने फ्रंेच को इंगलैण्ड की राजभाषा घोषित किया। तीन सौ वर्षों में फ्रेंच भाषा इंग्लैण्ड में कामकाज, सामन्त वर्ग, उच्चाधिकारियों, अदालतों, स्कूलों और विद्यालयों की भाषा बन गई। पार्लियामेंट में भी फ्रेंच का बोलबाला हो गया। अंग्रेजी गांव और अनपढ़ों की भाषा बन कर अन्तिम सांसे गिनने लगी। फ्रेंच बोलना सभ्यता की पहचान बन गया। जो फ्रेंच ना जानें वे असभ्य। उस समय इंग्लेैंड में फ्रेंच की वही स्थिति थी जो आज भारत में अंग्रेजी की है। और अंग्रेजी की स्थिति वैसी ही सम्मानहीन और दुत्कारी सी थी जैसी आज भारत में हिन्दी की है। उस समय पराजित अंग्रेजी समाज आत्मविश्वासहीन था, गौरव औेर राष्ट्रीय चेतना-शून्य। सन् 1338 में इंग्लैण्ड के नॉरमन (फ्रंासीसी वंशज) राजा एवर्ड तृतीय का युद्ध फ्रांस के राजा फिलिप षष्ठम् से हो गया। इंग्लैण्ड और फ्रांस का यह युद्ध रुक-रुककर लगभग सौे वर्षों तक चला। इस युद्ध में नॉरमन राजा को इंग्लैण्ड की पराजित प्रजा की सहायता की आवश्यकता थी। उनके सहयोग के बिना युद्ध जीतना संभव नहीं था। इसलिए उनका हृदय जीतने के लिए लगभग तीन सौ वर्षाें के शासन के बाद फ्रांसीसी के स्थान पर उसनें अंग्रेजी को राजभाषा घोषित किया। सन् 1362 में पहली बार इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट को उसने फ्रेंच भाषा में संबोधित नहीं किया। उसके स्थान पर अंग्रेजी में संबोधित किया।


इसने पूरे अंग्रेजी समाज में जैसे नए प्राण फूंक दिए। राष्ट्रीयता के ज्वार ने थके-हारे, गिरे-पड़े अंग्रेजी समाज को ऐसा संगठित किया, कि उन्होंने फ्रांस को मिट्टी चटाकर ही दम लिया। भाषा के उद्धार ने राष्ट्र को उठा कर खड़ा कर दिया।


ईस्ट इंडिया कंपनी का सन् 1830 तक भारत के अधिकांश भूभाग पर कब्जा हो गया था। गवर्नर जनरल सहित ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी उच्चाधिकारी चिन्तित थे कि किस प्रकार भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को चिरस्थाई बनाया जाए। उस समय कंपनी के आगे एक और प्रश्न भी था। इतने बड़े भूभाग की भारतीय जनता के स्कूलों का पाठ्यक्रम क्या हो? क्या उनको पारंपरिक संस्कृत पाठ्यशालाओं और मुस्लिम मकतबों के अनुसार पढ़ाया जाए, या कि इंग्लैण्ड के स्कूलों के नमूने पर शिक्षा दी जाए? अधिकारियों का एक दल हिन्दुस्तानियों की परंपारगत शिक्षा के पक्ष में था, तो दूसरा अंग्रेजी शिक्षण के पक्ष में। कंपनी के अधिकारी अपने परामर्श में एकराय नहीं थे। उनके विवाद का अन्त लार्ड मैकॉले के सुझाव ने किया, जिसे गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैन्टिक ने स्वीकार करके अंग्रेजी को भारतीयों की शिक्षा का माध्यम बनाने का आदेश दिया।


लार्ड मैकॅाले के सुझाव में यह तर्क था कि अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और उसे चिरस्थाई बनाने में भी कारगर होगी। उसने गवर्नर जनरल को सन् 1835 में लिखे अपनें ‘मिनिट्स’ में लिखा कि अगर हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी में शिक्षित करेंगे, तो ‘‘हम एक ऐसे वर्ग का निर्माण करेंगे जो केवल रंग और रक्त में हिन्दुस्तानी होगा, लेकिन अपनी पसन्द, अपनी सोच, अपनी नैतिकता और बुद्धि में एक अंग्रेज होगा, और जो हमारे और लाखों हिन्दुस्तानियों की प्रजा के बीच, जिन पर हम शासन करते हैं, बिचौलिये का काम करेगा।’’


मैकॉले का सपना सच ही हुआ। कुछ ही वर्षाें में अंग्रेजी स्कूलों ने हजारों-लाखों ‘‘भूरे अंग्रेजों’’ की फौज़ तैयार कर दी, जो अंग्रेजों के समान ही भारत और भारतीय संस्कृति, सभ्यता, विरासत और उससे संबंधित हर चीज को हेय दृष्टि से देखते थे। कालान्तर में, यह ‘‘भूरे अंग्रेज़’’ भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के सबसे बडे़ हिमायती और स्तम्भ सिद्ध हुए। स्वाभाविक रूप से, इन ‘‘भूरे अंग्रेजों’’ में राष्ट्रीय चेतना का एकदम अभाव था। जब वे ‘‘भूरे अंग्रेज’’ जिनके नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रवाद क्षीण हआ था, देश की आजादी के बाद सत्तासीन हुए, तो राष्ट्रवाद का और पतन स्वाभाविक था। राष्ट्रवाद के पतन के साथ ही दबे-पड़े जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और मजहबी उन्माद के पिशाच प्रकट हो गए। ‘‘भूरे अंग्रेजों’’ का राष्ट्रवादहीन नेतृत्व कभी इस पड़ोसी देश, कभी उस पड़ोसी देश से पिटता रहा, और वह भी अपनी झेंप मिटाने के लिए शांति, शांति का जाप करता रहा।


जवाहर लाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री बनें। वे जब लंदन में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे, तो उन्होंने अपने पिता मोतीलाल नेहरू को जुलाई 15, 1910 को पत्र लिखा जिसका आशय था कि वे अब ऑक्स्फ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना चाहते हैं, क्योंकि अब ‘‘कैम्ब्रिज में बहुत हिन्दुस्तानी भर गए हैं’’। (नेहरू: स्टेन्लीवोपार्ट: ऑक्स्फ़ोर्ड: पृष्ठः23)। उन्हंे हिंदुस्तानियों से नफरत थी और वे नहीं चाहते थे कि लंदन में उनका ही साथ रहे। लंदन मंे वह गोरे अंग्रेजों के साथ के लिए उतावले हो रहे थे। हिंदुस्तानियों को छोटा, हीन मानने का भाव, जो तरुणाई में था, उनकी वृद्धावस्था तक नहीं बदला। बहत्तर-तिहत्तर वर्ष की आयु में उन्होंने अमेरिकी राजदूत जे.के. गैेलब्रेथ से कहा -‘‘आप जानते हैं मैं इस देश मे हुकूमत करने वाला आखरी अंग्रेज़ हूँ’’। (जे.के. गैलब्रेथ: ‘ए लाइफ ऑफ अवर टाइम्स: मेमोएर’: बास्टन, 1981 पृष्ठ 408) अंततः असलियत निकल आई। कब्र मंे मैकॉले संतोष से मुस्कुराया होगा। स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री अपने आपको अंग्रेज बताकर गर्वित अनुभव कर रहा है। क्या इसी कारण से 15 अगस्त, 1947 की आधी रात को, जब अंग्रेजी झंडा उतारा जा रहा था, और तिरंगा फहराया जा रहा था, जवाहर लाल नेहरू ने अपना भाषण अंग्रेजी में दिया ?


संविधान सभा ने एक स्वर में हिन्दी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया। नेहरुजी को यह स्वीकार नहीं था। इस प्रस्ताव के पारित होने के पूर्व उन्होंने घोषित किया था कि वे हिन्दी को राजभाषा नहीं बनने देंगे। उनकी घोषणा के वावजूद जब संविधानसभा ने उपरोक्त प्रस्ताव पारित किया, तो उनकी उर्जा इस प्रस्ताव को निष्प्रभावी करने में लग गई। यह निर्णय लिया गया कि हिन्दी राजभाषा के रूप में पन्द्रह वषों के बाद लागू की जाएगी। तब तक अंग्रेजी पहले के समान बनी रहेगी। इस बीच 1961 में देश के सब मुख्यमंत्रियों ने एकमत से यह प्रस्ताव पारित किया कि देश की सभी भाषाओं के लिए देवनागरी स्वीकार की जाए, जैसे योरोप की सभी भाषाएँ रोमन लिपि में लिखी जाती हैं। उनका तर्क था कि यह राष्ट्रीय एकता की दिशा में समुचित पग होगा। किन्तु जब यह प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास गया तो प्रधानमंत्री नेहरु ने इसे ठंडे बस्ते में डाल कर खत्म का दिया। देश ने राष्ट्रीय एकत्व का एक बड़ा अवसर खो दिया। (दुर्गादास: इंडिया फ्रॉम कर्जन टु नेहरु एण्ड आफ्टर)।


साथ ही नेहरू ने यह भी आश्वासन दिया कि जब तक सब प्रदेशों की सहमति नहीं प्राप्त होगी, तब तक अंग्रेजी, हिन्दी के साथ राजभाषा बनी रहेगी। नेहरुजी के आश्वासन की कृपा से आज देश की स्थिति यह है कि देश की 100 करोड़ जनसंख्या में से यदि 99 करोड़ 95 लाख हिन्दी को एकमात्र राजभाषा बनाना चाहें, ओैर अगर मिजोरम राज्य के मात्र 5 लाख लोग न बनाना चाहें, तो हिन्दी एकमात्र राजभाषा नहीं बन सकती। अंग्रेजी अपनी सिंहासन पर पूर्ववत बनी रहेगी, सदा-सदा के लिए। आज हिन्दी समेत सभी अन्य भाषाएँ जैसे तमिल, तेलगू आदि अपने देश में निष्कासित, तिरस्कृत हैं, जबकि विदेशी भाषा अंग्रेजी हिन्दुस्तानियों के सर माथे पर है। ऐसा तो होना ही था। स्वतन्त्रता संघर्ष के दिनों से ही देश पर हावी ‘‘भूरे अग्रेजों’’ ने आजादी के बाद सत्ता पर कब्जा करके देश को आत्म विश्वासहीन बना कर भारतीयों के राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय चेतना को क्षीण कर दिया है।


कुछ दिनों पहले मेरे अंग्रेजी स्कूल में पढ़े हुए चौदह साल के नाती ने पूछा कि आपके भाई का जन्म किस सन् में हुआ था। मैंने बताया - सन् सैंतीस में। मेरा उत्तर उसकी समझ में नहीं आया। उसने पूछा - सैंतीस मानें ? मैंने बताया - ‘‘थर्टी सेवन’। वह समझ गया। जब मैंने अपने एक मलयाली मित्र को यह बात बतायी तो वह हँसने लगे। मैंने पूछा इसमें हँसने की क्या बात है ? वह बोला - मेरे पोते का भी यही हाल है। अगर मैं उससे मलयाली में कहूँ ‘‘मुपत्तियेल’’। वह तुरंत पूछेगा - व्हाट ? जब मेैं कहूँगा ‘‘थर्टी सेवन’’। तब वह भी समझ जाएगा।


मेरे एक मित्र कन्नड़ के प्रख्यात लेखक हैं। वह बताने लगे कि उनका बेटा कन्नड़ बोल तो लेता है, लेकिन लिखना-पढ़ना नहीं जानता। उसकी कन्नड़ साहित्य में कोई रुचि नहीं है। कन्नड़ का साहित्य इतना समृद्ध है, इतना श्रेष्ठ है कि विश्व के किसी भी भाषा के साहित्य से कम नहीं है। अचानक उनके स्वर में हताशा आ गई। वह बड़ी पीड़ा से बोले - ‘‘कौन पढे़गा यह साहित्य? क्या यह ऐसे ही नष्ट हो जाएगा? बहुत सी ऐसी जनजातियां हैं, जिनकी केवल बोलने की भाषा है, लिखी नहीं जा सकती, क्योंकि उनके पास लिपि नहीं है’’। उनकी खाली निगाहों में दर्द उभर आया - ‘‘क्या कन्नड़ भी इसी तरह बोलने की भाषा बन कर रह जाएगी’’? मैं इसका उत्तर नहीं दे सका। क्या उत्तर देता। यह दर्द केवल कन्नड़ का नहीं है। यह दर्द भारत की सभी राष्ट्रीय भाषाओं का है।


कब्र में मैकॉले मुस्करा रहा है।

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