मृत्यु के पश्चात भी शत्रुता : प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल

आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाण् राजेन्द्र प्रसादए प्रथम प्रधानमंत्री से आयु में पाँच साल बड़े थे । राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 1884 में हुआ थाए और जवाहर लाल का 1889 में। इस प्रकार नेहरू की 125वें जयंती वर्ष में 3 दिसंबर 2014ए राजेन्द्र प्रसाद के जन्म का 130वां वर्ष था।


सत्ता के उच्चतम दो केन्द्रों पर अवस्थित राजेन्द्र प्रसाद तथा जवाहर लाल नेहरू के बीच ऐसा कुछ भी नहीं था जो समान हो। अगर एक पूरब थाए तो दूसरा पच्छिम। एक दिन थाए तो दूसरा रात। एक सफ़ेद थाए तो दूसरा काला। यह गांधी जी का कमाल थाए जिन्होने श्कहीं की ईंट कहीं का रोड़ाश् इकट्ठा कर के अपना श्कुनबा जोड़ाश् था।


राजेन्द्र प्रसाद का जन्म एक निम्न मध्यम.वर्गीय परिवार में हुआ था। जवाहर लाल एक अति.संपन्न परिवार में जन्मे थे। अङ्ग्रेज़ी के मुहावरे का इस्तेमाल किया जाए तो कहा जा सकता है कि जवाहर लाल अपने मुंह में चाँदी की चम्मच ले कर पैदा हुए थे।


राजेन्द्र प्रसाद अति मेधावी छात्र थेए जो सदा अपनी कक्षा में प्रथम स्थान लाते थे। इसके विपरीत जवाहर लाल अति सामान्य छात्र थे।


राजेन्द्र प्रसाद बहुत ही सफल वकील थे। उनके जीवनीकरों के अनुसार अगर उन्होने कोंग्रेसी आंदोलनों में भाग न लिया होताए तो वह हाईकोर्ट के जज होते। इंग्लैंड से लाई गई बैरिस्टर की डिग्री के बावजूदए जवाहर लाल की इलाहाबाद में वकालत नहीं चली। वह अपनी पत्नी कमला तथा पुत्री इंदिरा सहित पूर्णतः अपने पिता मोतीलाल नेहरू पर अवलम्बित थे। उनका मन भी वकालत में नहीं लगता था। एक दिन जब पिता नेए हर पिता के समान उनको काम में मन लगा के मेहनत करने की सीख दीए तो जवाहर लाल रूठ गए। घर में खाना बंद कर दिया। चना.गुड खा कर काम चलाने लगे। साथ ही गांधी जी को भी गुहार लगाई। गांधी जी के हस्तक्षेप से पिता.पुत्र में सुलह हुई। इसके बाद जवाहर लाल पहले के समान अपने पिता पर आश्रित हो गए।


राजेन्द्र प्रसाद ने एक पत्नीव्रत आजीवन निभाया। पत्नी छोटे क़द की थींए और रूपवान भी नहीं थीं। इसके विपरीत जवाहरलाल रोमानी और दिलफेंक क़िस्म के आदमी थे। पत्नी कमला नेहरू के अतिरिक्त उनके एडविना नेहरू तथा पद्मजा नायडू के साथ प्रेमसंबंध जगतविख्यात हैं। भारती साराभाईए चित्रकार अमृता शेरगिल तथा श्रद्धा माता के नाम भी जोड़े जाते हैं।


राजेन्द्र प्रसाद खामोश.तबियतए सौम्यए वैष्णवी.आस्थावानए विनम्रए धर्मभीरुए व्यक्ति थेए जो प्रथम दृष्टया गंवई.गाँव के किसान लगते थे। जवाहरलाल तेज.तर्रारए अचानक आए क्रोध से विस्फोटित हो जाने वालेए पश्चिमी तौर.तरीकेवालेए धार्मिक रीतिरिवाजों को हेय दृष्टि से देखने वालेए चुस्त.दुरुस्तए दुनियाबीए सफल उच्चवर्गीय लगते थेए जो सदा अपने हाथों में एक डेढ़ फीट का डंडा रखते थे। जन सभाओं में भीड़ को अनुशासित करने के लिए वह डंडा भी चला देते थेए और अनपढ़ जनता उसी प्रकार श्जमाहिर लालश् से डंडा खाकर प्रसन्न होती थीए जैसे गाँव में जमींदार से लात खा कर।


बिहार में गांधीजी के बाद राजेन्द्र प्रसाद ही सबसे अधिक लोकप्रिय नेता थे। गांधीजी के साथ श्राजेन्द्र प्रसाद ज़िन्दाबादश् के भी नारे लगाए जाते थे। वहाँ उत्तर प्रदेश जैसी जवाहरलाल की जयजयकार नहीं होती थी।


बिहार के सच्चिदानंद सिन्हा के बाद राजेन्द्र प्रसाद 1946 में संविधान सभा के अध्यक्ष बनाए गए। 1950 से 1962 तक वह भारत के राष्ट्रपति पद पर अवस्थित रहे। वह अकेले ऐसे थेए जो दो काल.अवधियों में राष्ट्रपति रहे। अवकाश.प्राप्ति के पश्चात वह सदाकत आश्रमए पटना में रहने गए। वहाँ कुछ महीनों पश्चात उनका 1963 में देहांत हो गया।


बारह वर्षों तक सत्ता के शीर्षस्थ पद पर बने रहने के बाद भी उन्होने कभी अपने किसी परिवार के सदय को न पोषित कियाए और न लाभान्वित किया। इस कला में जवाहर लाल पारंगत सिद्ध हुए। अन्तरिम प्रधान मंत्री बनाते ही उन्होने जो पहला काम कियाए वह अपने प्रिय बहन विजयलक्ष्मी पंडित को रूस में भारत का राजदूत नियुक्त करने का था। कुनबा.परस्ती में ही उन्होने सेना में जनरल ब्रज मोहन कौल को प्रोन्नति दिलवाईए जिसका परिणाम भारत.चीन युद्ध में भारत की पराजय के रूप में पूरे देश को भुगतना पड़ा।


राजेन्द्र प्रसाद को राजनीति और सत्ता के सोपान की हर सीढ़ी पर जवाहर लाल का विरोध सहना पड़ा। कॉंग्रेस पार्टी उस काल में पटेल.गुट और नेहरू.गुट में विभाजित थी। राजेन्द्र प्रसाद वल्लभ भाई पटेल के साथ थेए इसलिए नेहरू उनके विरुद्ध थे।


राजेन्द्र प्रसाद और जवाहर लाल के बीच तनाव और खटास का बीज आज़ादी के पूर्व ही पड़ गया थाए जब कॉंग्रेस अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए जब उन्होने 1936 में कॉंग्रेस.जनों को श्कॉमरेडश् कह कर संबोधित कियाए और घोषित किया कि कॉंग्रेस का उद्देश्य श्निजी संपत्ति का उन्मूलनश् और निजी उद्योग का श्सहकारी उद्योगश् में परिवर्तित करना है। और साथ हे यह भी कहा कि ष्मैं चाहता हूँ कि कॉंग्रेस एक समाजवादी संगठन बन जाये।


समाजवाद गांधी जी को अस्वीकार था। अतएव राजेन्द्र प्रसाद ने कॉंग्रेस की कार्यकारी समिति से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र पर वल्लभ भाई पटेलए राजगोपालाचारीए कृपलानी तथा तीन अन्य सदस्यों ने हस्ताक्षर किए। गांधी जी के बीच.बचाव करने पर राजेन्द्र प्रसाद ने त्यागपत्र तो वापिस ले लियाए किन्तु इससे राजेंद्र प्रसाद और नेहरू के बीच ऐसी गांठ पड़ गईए जो राजेन्द्र प्रसाद की मृत्यु के बाद भी बनी रही।


प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गा दास अपनी बहुचर्चित पुस्तक श्इंडिया फ़्रोम कर्ज़न टु नेहरू एंड आफ्टरश् में लिखते हैं कि राजेन्द्र प्रसादए नेहरू से सीधेए आमने.सामने बात करने से कतराते थे। एक तरह से वे उनसे डरते थेए क्योंकि जब भी बात होती थीए तो उसमें गर्मी आ जाती थीए और नेहरू आपे से बाहर हो जाते थे। इसलिए राजेन्द्र प्रसाद उनको अपनी बात लिख कर देना पसंद करते थे।


प्रथम राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के बीच दूरी और अविश्वास लगातार बना रहा। राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी.चीनी भाई.भाई की नीति से असहमत थे। नेहरू सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटालों से भी वह चिंतित थे। उन्होने राष्ट्रपति की अध्यक्षता में श्लोकपालश् की नियुक्ति का भी प्रस्ताव दियाए जिस पर प्रधान मंत्री ने कोई ध्यान नहीं दिया।


राज्यभाषा हिन्दी को ले कर भी दोनों में विभेद था। मुख्यमंत्रियों की सभा ;1961द्ध को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएँ देवनागरी लिपि अपना लेंए जैसे योराप की सब भाषाएँ रोमन लिपि में लिखी जाती हैंए तो भारत की राष्ट्रीयता संपुष्ट होगी। सभी मुख्य.मंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लियाए किन्तु नेहरू की केंद्र सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में ड़ाल दिया।


फरवरी 1963 में राजेन्द्र प्रसाद की मृत्यु हुईए तो नेहरू उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना नहीं गए। यही नहींए उन्होने तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दी। राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श की अवहेलना करके राजेन्द्र प्रसाद के अंतिम संस्कार मे भाग लिया। नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद की मृत्यु के बाद भीए उनसे अपनी शत्रुता निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


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