मदर टेरेसा सर क्यों ढँकती थीं ?

मदर टेरेसा एक बहुत ही प्रसिद्ध हस्ती थीं। अल्बानिया में जन्मी रोमन केथोलिक मत की ईसाई ‘नन’ (मठवासिनी) ने भारत को अपना घर बनाया था। कलकत्ते मंे उनका आश्रम है, जिसमे वह सड़कों पर पड़े मृत्यु-प्राय अनाथ-वृद्धों को उठवा कर अपने आश्रम में लाती थीं और आश्रम के शांतिमय एवं आत्मीय वातावरण में उन्हंे सम्मान से मरने का अवसर देती थीं। उनके इस कार्य के लिए उन्हे अनेकों अनतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए, और अगणित विदेशी सहायता भी।


मदर टेरेसा किनारेदार धोती पहनतीं थीं जिससे उनका सर बराबर ढँका रहता था। उनकी संस्था में कार्य करने वाली सहायकाएँ भी, उनके समान धोती के पल्ले से सर ढँके रखती हैं। देखने से प्रतीत होता है कि उत्तर भारत की ग्रामीण वृद्धा के समान धोती से अपना सर ढंकना मदर टेरेसा की विनम्रता का परिचायक था। किन्तु वास्तविक इससे भिन्न है।


मदर टेरेसा कट्टर केथोलिक थीं। वह ईसाई मत के प्रचार को समर्पित थीं। इसीलिए जब दलित ईसाइयों के सरकारी सेवा मंे आरक्षण के लिए ईसाई संस्थाओं ने, उनके जीवन के अंतिम वर्षों मंे धरना दिया था, तो मदर टेरेसा ने भी उस धरने में भाग लिया था।


औरतों को सर ढंकने के लिए बाईबिल में आदेश हैं। मदर टेरेसा कैथोलिक ईसाई थीं। केथोलिम ईसाई बाईबिल के निर्देशों का अक्षरशः पालन करने में विश्वास करते हैं। अतएव वह सदा सर ढंके रहती थीं।


इस संदर्भ में बाईबिल (कोरिन्थियन) का निम्नलिखित अंश अवलोकनीय है:-

‘आदमी को अपना सर नहीं ढकना चाहिए क्योंकि वह ‘ईश्वर का रूप और कृति है, लेकिन औरत आदमी की कीर्ति है’।

(11: 7)

‘‘आदमी औरत के लिए नहीं बनाया गया है; बल्कि औरत आदमी के लिए बनाई गई है’’।

(11: 8)

‘‘इसलिए औरत के सर पर अधिकार का प्रतीक होना चाहिए’’।

(11: 10)


बाईबिल के अनुसार औरत पर आदमी का अधिकार है, और आदमी के इस अधिकार को दर्शाने के लिए ही औरत को अपना सर ढंकना चाहिए।

मदर टेरेसा धर्मगुरु थीं, और ईसाई धर्म मे उनकी आस्था गहरी थी। एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में वह और अपना सर ढंक कर, मर्दों के औरतों पर अधिकार को स्वीकार करते हुए, ईसाई मत का अनुपालन करती थीं। और आज उनकी शिष्याएँ सर ढँककर, औरतों पर मर्द के अधिकार को प्रकट करती हैं।


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