भारत में विदेशी विषकन्या

प्राचीन काल में किसी शत्रु राजा को पराजित करने के लिए सुन्दर बालाएं उसको सम्मोहित करने के लिए भेजी जाती थीं। इन सुन्दरियों को विषकन्या कहा जाता था। ब्रिटिश हित साधन के लिए जवाहर लाल नेहरू को प्रलोभित करके अपने प्रेमजाल में फांसने वाली एडविना माउण्टबैटेन को क्या भारतीय इतिहास की आधुनिक विषकन्या कहना अनुचित होगा?


किसी से अगर पूछा जाए कि भारत कब आज़ाद हुआ था, तो वह फौरन जवाब देगा कि 15 अगस्त, 1947 को। अगर उसे यह कहा जाए कि हिन्दुस्तान है 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद नहीं हुआ था, तो वह ऐसा कहने वाले को मूर्ख समझेगा या गैर-जानकार। लेकिन यह सच है कि देश है 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद नहीं हुआ था। कैसे ?


15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने भारत को ‘‘पूर्ण स्वराज’’ या पूरी आज़ादी नहीं दी थी। ‘डोमीनियन स्टेटस’ दिया था। ‘डोमीनियन स्टेटस’ (आधी आजादी) देने का अर्थ था कि 15 अगस्त, 1947 के बाद भी भारत अंग्रेजी ताज के अधीन ही रहा। 15 अगस्त 1947 के बाद भी ब्रिटेन की साम्राज्ञी, भारत की साम्राज्ञी थी। इसीलिए भारत के अंतिम वायसराय लुई माउण्टबैेटेन के जाने के बाद, ब्रिटिश साम्राज्ञी के आदेश से ही चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथाकथित स्वंतत्र भारत के गवर्नर जनरल बनाये गये थे।


15 अगस्त, 1947 के बाद नियुक्त, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी ब्रिटिश साम्राज्ञी रानी ऐलिजाबेथ द्वितीय के अधीन थे। 15 अगस्त, 1947 के बाद भारतीय जलसेना, थलसेना और वायुसेना तीनों के ही सेनापति ब्रिटिश ताज के अधीन थे। भारत, ब्रिटिश ताज के आधिपत्य से 26 जनवरी, 1950 को ही (जब भारत ने अपना संविधान लागू किया) मुक्त हुआ। अतएव 15 अगस्त, 1947 से 25 जनवरी, 1950 की अवधि में ‘डोमीनियन स्टेटस’ के रूप में वह केवल आधा ही आजाद हुआ था। अतएव यह कहना कि देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ था, निश्चित ही सही नहीं है।


ब्रिटिश सरकार की भारत में हुकूमत उसकी सेना के हिन्दुस्तानी सिपाहियों के सहारे टिकी थी। लेकिन जब सुभाष बोस की पुकार पर ब्रिटिश सरकार के हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने आज़ाद हिन्द फौज में भरती होकर, अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाये, उसी दिन अंग्रेज समझ गये कि हिन्दुस्तान में उनकी हुकूमत की एकमात्र बैसाखी टूट गई। और जब फरवरी 1946 में नौसेना में विद्रोह हुआ, और जब यह विद्रोह वायुसेना तक फैल गया और गोरे सिपाहियों और काले हिन्दुस्तानी सिपाहियों के बीच गोली चली, तो अंग्रेज समझ गये कि हिन्दुस्तान से उनका दाना-पानी उठ गया ।


ब्रिटिश सरकार ने फरवरी 1946 में यह निर्णय ले लिया था कि हिन्दुस्तान से अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया जाए। लेकिन वह यह भी चाहते थे कि हिन्दुस्तान में जो अरबों-खरबों की ब्रिटिश पूँजी लगी है, उसे वह हिन्दुस्तान छोड़ने के पहले यहां से निकाल ले जाएं। अगर हिन्दुस्तान को आजाद कर दिया और हिन्दुस्तान की आजाद सरकार ने सारे ब्रिटिश निवेशों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, तो ब्रिटेन पर दोहरी मार होगी। एक तरफ तो भारत से ब्रिटिश साम्राज्य समाप्त होगा और दूसरी तरफ, उसका अपार निवेश भी चला जाएगा। ब्रिटिश सरकार हर हालत में अपना निवेश बचाना चाहती थी। अतएव पूर्ण आज़ादी देने से पहले वह चाहती थी कि भारत को ब्रिटिश ताज के अन्तर्गत स्वायत्त शासन (डोमिनियन स्टेटस ) दे दिया जाए। ‘‘डोमीनियन स्टेटस’’ की अवधि में भारत को ब्रिटिश निवेश का राष्ट्रीयकरण करने का विधिक अधिकार नहीं होगा, और ब्रिटिश नागरिक उसे बिना किसी बाधा के ब्रिटेन ले जा सकेंगे।


ब्रिटिश सरकार यह भी जानती थी कि भारत के नेताओं को ‘‘डोमीनियन स्टेटस’’ के लिए राजी करवाना बहुत कठिन कार्य है। दिसंबर 1929 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन में काग्रेस ने अपना ‘लक्ष्य’ पूर्ण स्वराज घोषित किया था। फिर 26 जनवरी 1930 को सब कांग्रेसियों ने ‘पूर्ण स्वराज’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की शपथ ली थी। इन्हीं कांग्रेसी नेताओं को ‘पूर्ण स्वराज’ के स्थान पर ‘डोमीनियन स्टेटस’ स्वीकार करने को मनवाना असंभव सा ही प्रतीत होता था। इसके अतिरिक्त अंग्रेज भारत छोड़ने के पहले हिन्दुस्तान को विभाजित कर, उसके एक हिस्से को पाकिस्तान के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना को देना चाहते थे। मोहम्मद अली जिन्ना की ब्रिटिश सरकार को सेवाएं बड़ी लाभदायक सिद्ध हुई थी। जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने हिन्दू और मुसलमान के बीच विभेद और शत्रुता बढ़ा कर राष्ट्रीयता की शक्तियों को क्षीण किया था, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में भी अंग्रेजों की महती सहायता की थी। कृतज्ञ ब्रिटिश सरकार भारत को छोड़ कर जाने के पहले जिन्ना को पुरस्कार रूप में पाकिस्तान देना चाहती थी। किन्तु गांधी जी, एक बार नहीं, अनेक बार सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके थे कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। इस धमकी के रहते, ब्रिटिश सरकार जानती थी कि कांग्रेस को देश विभाजन के लिए राजी करना दुष्कर कार्य है।


उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में ब्रिटिश सरकार एक ऐसे वाइसराय की तलाश में थी, जो भारत से ब्रिटिश हुकूमत समाप्त करने के पूर्व कांग्रेस को ‘डोमीनियन स्टेटस’ और देश के विभाजन के लिए राजी करे। यह तलाश माउण्टबैटेन पर समाप्त हुई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने माउंटबैटेन को अंतिम वाइसराय के पद के लिए चुना। उससे यह अपेक्षा की थी कि वह भारत में फहराते ‘यूनियन जैक’ को नीचा करने से पहले देश का विभाजन और विभाजित देशों को ‘डोमिनियन स्टेटस’ देना सुनिश्चित करेगा। माउण्टबैटेन को इस पद के लिए चुनने के कारण पर प्रकाश डालते हुए एटली ने अपनी डायरी में लिखा था: ‘‘माउण्टबैटेन की हर प्रकार के आदमियों से निभा लेने की असाधारण क्षमता थी और उनकी पत्नी बहुत ही असामान्य (अनयूज़अल) थी।’’ (जेनेट मॉर्गन: एडविना माउण्टबैटेन, पृष्ठ 378)


यह कारण थे, जिनके लिए माउण्टबैटेन को भारत का ब्रिटिश साम्राज्य समेटने का काम सौंपा गया। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि अगर माउण्टबैटेन की पत्नी ‘असामान्य’ न होती, तो वह इस पद के लिए नहीं चुना जाता।


माउण्टबैटेन की पत्नी किस प्रकार ‘असामान्य’ थी ? प्रधानमंत्री एटली ने उसमें ऐसा क्या देखा जिसके कारण उसके पति को भारत का वायसराय बनाया गया ?


एडविना माउण्टबैटेन जिस परिवार में जन्मी थी, वह इंगलैड के सर्वाधिक धनी परिवारों में से एक था। उसके पितामह सर अर्नेस्ट कैसल, ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम के घनिष्ट मित्र थे। जब उसका विवाह माउण्टबैटेन से 1922 में हुआ, तब उसके पास अपने पितामह से विरासत में प्राप्त बीस लाख पाउण्ड थे। उस समय माउण्नटबैटेन ब्रिटिश नौसेना में था और उसे प्रतिवर्ष केवल 624 पाउण्ड (52 पाउण्ड प्रतिमाह) मिलते थे। दोनों की आर्थिक स्थिति में धरती-आकाश का अन्तर था। यह अन्तर केवल एक तथ्य कम करता था। माउण्टबैटेन इंगलैण्ड के राजपरिवार से संबंधित था। वह महारानी विक्टोरिया का पौत्र था, और इंगलैण्ड के राजा का चचेरा भाई। इस तरह एडविना और माउण्टबैटेन की राम-मिलाई जोडी थी। एक के पास धन था, तो दूसरे के पास सामाजिक स्तर और राजपरिवार से संबंध। दोनों एक दूसरे के पूरक थे। दोनों के बीच कोई अन्य समानता नहीं थी।


एडविना और लुई माउण्टबैटेन के बीच विभेद का मुख्य कारण काम- असंगति थी। ‘‘एडविना माउण्टबैटेन एक बिगड़ी हुई अय्याश रईसजादी थी, जो अपने आप में इतनी मस्त रहती थी कि वह भूल जाती थी कि कहाँ उसने अपनी दो बेटियों और उनकी आया को छुट्टी बिताने भेजा है। लेडी माउण्टबैटेन सदा ही अपने पति के प्रति वफादार नहीं रही। उसके पार्कलेन के घर ‘बु्रक हाउस’ में बटलर (नौकर) को हमेशा यह समस्या रहती थी कि कैसे (एडबिना के प्रेमी) ‘ह्यू’ ‘लॅडी’ और ‘बनी’ को एक दूसरे के बारे में पता न लगे, जब तीनों एक साथ वहां संयोग से आए हों। उसे इनके अलावा ‘माइक’, ‘लैरी’ और ‘टैड’ की भी फ़िकर करनी थी। एडविना को अपनी बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए 1920 और 1930 के दशकों में कोई काम महत्वपूर्ण नहीं लगा और उसने अतिकाम (निम्फोमेनिया) तथा द्विलैंगिक काम (बाई सेक्सुअल्टी) में शरण ली।’’ (एंड्रयू रोबर्टस: एमीनेंट चर्चीलियन, पृष्ठ 58)। प्रायः सभी जीवनीकारों ने एडविना के विवाहेत्तर काम संबंधों और सतही उत्श्रृंखल जीवन शैली का उल्लेख किया है। कोई भी सामान्य पति ऐसी चरित्रहीन पत्नी को तुरन्त त्याग देता। किन्तु माउण्टबैटेन ऐसा नहीं कर सका। एडविना की अपार धनराशि ने विवाह टूटने नहीं दिया।


माउण्टबैटेन में कुछ अपनी दुर्बलता भी थी। स्वभाव और शरीर से माउण्टबैटेन में कामवासना मंद थी। वह एडविना की अतिकामुकता को संतुष्ट करने में सक्षम नहीं था। ‘‘वह एक ऐसा व्यक्ति था जो कामक्रीड़ा का आनन्द व्यवहार से अधिक सिद्धांत में लेता था। जब उसने एडविना की बेवफाइयों से समझौता कर लिया तो वह उससे (एडविना से) उनके बारे में सुनना पसंद करता।’’ (रिचर्ड ह्यूः माउण्टबैटेन, पृष्ठ 96)। ऐसे पौरुषहीन व्यक्ति को कोई पत्नी सहन नहीं कर सकती । फिर भी एडविना अपने पति से अलग नहीं हुईं। माउण्टबैटेन का राजपरिवार से संबधित होना उसे ब्रिटेन में एक विशिष्ट समाजिक स्थान देता था, जिसे एडविना खोना नहीं चाहती थी। इसने भी एडविना और माउण्टबैटेन के विवाह को (ऊपरी तौर से तथा कानूनी दृष्टि से) बनाए रखा।


एडविना और माउण्टबैटेन के विवाह को बनाए रखने में दोनो के अपने निहित स्वार्थ थे। दोनों के बीच कालान्तर में समझौता हो गया था। दोनों एक दूसरे की मदद करते थे। एडविना को अपने प्रेमी से मिलना हो तो माउण्टबैटेन कहीं बाहर चले जाते थे। इसी तरह एडविना भी माउण्नटबैटेन को उसकी प्रेमिका के साथ मिलने के लिये वांछित सहयोग देती थी। ऐसे जोड़े सामान्य रूप से नहीं मिलते। इस अर्थ में माउण्टबैटेन और एडविना दोनों ही असामान्य थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने बहुत सोच कर ही इस जोड़े को भारत के अंतिम ब्रिटिश अभियान के लिये भेजा था। इस जोड़े का दायित्व था - येन केन प्रकारेण (चाहे जिस तरह संभव हो, उस तरह) भारत के कांग्रेसी नेताओं को देश के विभाजन और ‘‘डोमिनियन स्टेटस’’ स्वीकार करने के लिये पटाना। इस कार्य में ब्रिटेन का हित था। माउण्टबैटेन दंपत्ति ने यह कार्य बखूबी निभाया।


18 फरवरी 1946 को भारत में ‘तलवार’ नामक जहाज पर अंग्रेज नौसेना के हिन्दुस्तानी ‘रेटिंग्ज’ नौसैनिक ने बंबई में विद्रोह कर दिया। विद्रोह नौसेना तक सीमित नहीं रहा। हवाई सेना में भी विद्रोह की चिंगारी पंहुची और आग बन कर नगरों में भड़की। ब्रिटिश शासन घबरा गया। अंग्रेजी शासन इस देश में हिन्दुस्तानी सिपाहियों की वफ़ादारी पर टिका था।


इस वफ़ादारी को सुभाषचन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज ने पहला झटका दिया था। अंग्रेज उससे उभर न पाये थे, कि यह दूसरा झटका लग गया। अंग्रेजों को लगा कि 1857 जैसा सैनिक विद्रोह अब ज्यादा दूर नहीं। अतएव उसके आने के पहले ही अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान को आजाद करके यहंा से भाग जाना बुद्धिमत्ता का काम समझा। नौसेना विद्रोह के तीसरे दिन ही 20 फरवरी 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने ऐलान किया कि शीघ्र ही मंत्रिमंडल-मिशन भारत भेजा जाएगा, जो भारत के नेताओं से वार्ता करके, निश्चित करेगा कि किस प्रकार भारत को आजाद किया जाए।


नौसेना विद्रोह की तिथि के ठीक एक महीने बाद 18 मार्च 1946 को अंग्रेज सरकार ने जवाहर लाल नेहरू को सिंगापुर भेज कर माउण्टबैटेन तथा लेडी माउण्टबैटेन से मिलने की व्यवस्था की। नौसेना विद्रोह के संदर्भ में केबिनेट-मिशन योजना और नेहरू-माउण्टबैटेन की भंेट का उद्देश्य एक ही था-जल्दी से जल्दी उन्हें भारत से सुरक्षित पलायन।


माउण्टबैटेन उस समय सिंगापुर में ‘एलाइड फोर्सेज’(मित्र सेना) के दक्षिणपूर्व एशिया के सुप्रीम कमांडर थे। जेल से छूटने के बाद, नवंबर-दिसंबर 1945 में एशियन रिलेशंस कॉन्फ्रेंस के प्रेसीडेंट के रूप में माउण्टबैटेन ने नेहरू जी को सिंगापुर लाने की व्यवस्था की। ब्रिटिश एयर फोर्स के हवाई जहाज में वह सिंगापुर ले जाए गए।


यद्यपि जवाहर लाल नेहरू किसी औपचारिक पद पर नहीं थे, तब भी माउण्टबैटेन ने एयरपोर्ट पर उनका स्वागत उन समस्त औपचारिकताओं के साथ आयोजित किया, जैसे उनका भारत के भावी प्रधानमंत्री के लिये उनका नाम तय हो गया हो। (सर्वपल्ली गोपाल: जवाहर लाल नेहरू खण्ड एक, पृष्ठ 310)। माउण्टबैटेन ने अपनी ‘लिमोज़िन’ मोटर उनको हवाई अड्डे से लाने के लिये भेजी। उनके स्वागत में नगर में द्वार बनाये गये और सड़क के दोनों ओर खड़े हिन्दुस्तानियों ने उनकी जय-जयकार की। प्रश्न उठता है कि माउण्टबैटेन ने नेहरू का इतना भव्य स्वागत क्यों किया ? एक ऐसा स्वागत जो किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के लिये होता है ? इसका उत्तर है कि मार्च है 1946 में ही ब्रिटिश सरकार इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि सब कांग्रेसी नेताओं में जवाहर लाल नेहरू ही सर्वाधिक दुर्बल व्यक्तित्व के हैं, जिनके द्वारा कांग्रेस को देश के विभाजन और ‘डोमिनियन स्टेटस’ के लिए राजी किया जा सकता है। अतएव जवाहर लाल को प्रलोभित करने का प्रारंभ सिंगापुर से हुआ।


जब जवाहर लाल नेहरू और माउण्डबैटेन हिन्दुस्तानियों की आम सभा संबोधित करने सिंगापुर स्थित वाई०एम०सी०ए० की बिल्डिंग पंहुचे, तो वहंा एडविना पहले से मौजूद थी। इसके पहले कि नेहरू से उनका परिचय हो पाता, हिन्दुस्तानियों की एक भीड़ नेहरू की जय-जयकार करती वहा पहुंची। भीड़भाड़ में एडविना जमीन पर गिर पड़ी। इंदिरा गंाधी ने एडविना से नेहरू जी की पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा था ‘‘लेडी माउण्टबैटेन धरती पर चित पड़ी हुई थी, जब मेरे पिता उनसे सिंगापुर में मिले थे’’। (स्टैंनली वोलपोर्ट: नेहरू, पृष्ठ 361) नेहरू ने धरती पर पड़ी एडविना को अपनी बाहों में उठा कर खड़ा किया, और स्टेनली वोलपोर्ट के शब्दों में ‘‘उसके प्रेम में बंध गए।’’


जवाहर लाल नेहरू को जरूर एडविना के साथ पहली नजर में प्यार हो गया होगा। पर एडविना के लिये यह नाटक था। वह विशाल नाटक जो विश्व के फलक पर ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने हित में इस देश में खेला जा रहा था। इस नाटक में माउण्टबैटेन और एडविना ने अपनी-अपनी भूमिकाएं बखूबी निभाई। इन दोनों ने नेहरू जी को मंत्रमुग्ध कर दिया। वह माउण्टबैटेन के निर्देशों पर नाचने लगे। जवाहर लाल को सिंगापुर के कार्यक्रम में आजाद हिन्द फौज मेमोरियल पर फूल रखने जाना था, किन्तु माउण्टबैटेन के मना करने पर उन्होंने अपना यह कार्यक्रम रद्द कर दिया।


18 मार्च 1946 की रात को देर रात तक एडविना, माउण्टबैटेन और जवाहर लाल नेहरू ने बातें की। ‘‘तीनों ने इस रात एक साथ खाना खाया, उन तीनों ने जिनको जल्दी ही भारत में हुकूमत करनी थी’’। (स्टेनली वोलपर्ट: नेहरू, पृष्ठ 361)


दिसम्बर 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने जिन्ना और जवाहर लाल को वार्ता के लिए लंदन बुलाया। वहां माउण्टबैटेन ने नेहरू को अपने साथ ठहरने के लिये आमंत्रित किया। ‘‘किन्तु नेहरू ने तय किया कि उनके लिये डोरचेस्टर होटल में ही ठहरना बेहतर होगा। वहां एडविना का एक ‘स्वीट’ था। (स्टैनली वोलपर्ट: नेहरू, पृष्ठ 377) यह तथ्य पर्याप्त रूप से संकेत करता है कि 18 मार्च 1946 की सिंगापुर की मुलाकात के बाद जवाहर लाल का माउण्टबैटेन, और विशेषकर एडविना से संपर्क और पत्राचार बराबर चलता रहा था। तभी तो लंदन आकर जवाहर लाल ने रात उस होटल में बिताने की सोची, जहां स्थाई रूप से एडविना के नाम से कमरे सुरक्षित रहते थे। क्या उन कमरों में उन दिनों एडविना थी ? अगर नहीं होती तो, जवाहर लाल माउण्टबैटेन की मेहमानदारी छोड़ कर क्या खाली कमरे देखने उस होटल में ठहरते ?


ब्रिटिश गुप्तचर विभाग अपनी कार्यक्षमता के लिये सदा से प्रख्यात है। गुप्तचर विभाग के कौशल ने ही हिन्दुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य को दो सौ वर्षों तक बनाए रखा था। इस परिप्रेक्ष्य में यह निष्कर्ष सत्य होगा कि दिसंबर 1946 के प्रथम सप्ताह में नेहरू और एडविना ने लंदन के डोरचेस्टर होटल में जो गुल खिलाए उनकी खबर ब्रिटिश प्रधानपमंत्री तक पंहुच गई। खबर से एटली आश्वस्त हुए होंगे।


दिसंबर 1946 में ही जब जवाहर लाल नेहरू लंदन में डोरचेस्टर होटल ठहरे थे, जहां एडविना के नाम से सुरक्षित कमरे थे; तब उनके परममित्र और भक्त कृष्ण मेनन ने ब्रिटिश सरकार के मंत्री स्टॅफर्ड क्रिप्स से कहा कि जवाहर लाल नेहरू चाहते हैं कि भारत के वाइसराय लार्ड वेवल को हटा कर उनकी जगह लुई माउण्टबैटेन को भारत का वाइसराय बनाया जाए। (कॉंलिन एंड लैपिये: फ्रीडम एट मिडनाइट, पृष्ठ 8) दो और दो चार तो कोई भी जोड़ सकता है। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी प्रेमिका को अपने निकट रखने के लिए इस युक्ति का सहारा लिया। भला ब्रिटिश सरकार को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। शिकार स्वयं ही जाल में फंसने को उतावला हो, तो शिकारी को प्रसन्नता होगी। नेहरू की लंदन से वापसी के कुछ दिन बाद ही, 18 दिसंबर 1946 को एटली ने लुई माउण्टबैटेन को अपने कार्यालय में बुलवाया, और भारत के वाइसराय पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव दिया।


23 मार्च, 1947 को माउण्टबैटेन ने नई दिल्ली में भारत के वाइसराय का पद ग्रहण किया। भारत में आते ही एडविना और जवाहर लाल नेहरू की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया। सामान्य सुरक्षा व्यवस्था के कारण किसी वाइसरीन के लिये यह संभव नहीं था कि वह जब चाहे, जिससे चाहे, मिल ले। किन्तु माउण्टबैटेन ने स्वयं एडविना की जवाहर लाल नेहरू से मुलाकातों का रास्ता आसान कर दिया था। हिन्दुस्तान के लिये चलने के पहले माउण्टबैटेन ने एटली से कह दिया था - ‘‘मैं और मेरी पत्नी हिन्दुस्तानी नेताओं से उनके घरों में बिना स्टाफ के मिलना चाहेंगे; बिना ‘प्रोटोकाल’ की औपचारिकता के मिलना चाहेंगे’’। एटली ने इस पर सहमति दे दी थी। एटली ‘साम्राज्य से निकल भागने’ के लिए माउण्टबैटेन और एडविना की हर शर्त मानने को तैयार थे। इसलिए जब भी मौका मिलता, शाम को, या रात को, एडविना अकेली नेहरू के यहा पहुंच जाती थी।


मई 1947 के प्रथम सप्ताह में माउण्टबैटेन और लेडी माउण्टबैटेन छुट्टी ममाने शिमला गए। एडविना की सलाह पर माउण्टबैटेन ने नेहरू को भी शिमला छुट्टी मनाने आमंत्रित किया। नेहरू ने आमंत्रण स्वीकार किया, और वह शीघ्र ही कृष्णामेनन के साथ शिमला पहुंच गए। वहां वाइसराय लॉज के कई एकडों में फैले विशाल बगीचे में, झाड़ियों, झुरमुठों, बेलों, लतरों, पेडों, फूलों, क्यारियों आदि के बीच, एकान्त स्थलांे में नेहरू और एडविना ने एक दूसरे के प्यार की कसमें खाईं। जब शिमला के वाइसराय लॉज में बाहें डाले, वे रंग छिटकी हरियाली के बीच, फूलों बिछी पगडंडियों पर टहल रहे थे, उस समय नीचे, मैदान में हिन्दुस्तान जल रहा था।


दो व्यक्तियों का पारस्परिक प्रेम, उनका आपसी व्यक्तिगत मामला है। किसी तीसरे व्यक्ति को उस मामले से क्या लेना देना। किसी को यह अधिकार नहीं है कि उस पर टीका टिप्पणी करे या उसे सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाए। लेकिन जब दो सार्वजनिक व्यक्तियों का पारस्परिक प्रेम समाज को विषम रूप से प्रभावित करता है, और इतिहास की धारा को मोड़ता है, तो हर व्यक्ति को उस संबंध को जांचने परखने का अधिकार है। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या नेहरू-एडविना संबंध ने भारत की सत्ता हस्तान्तरण की प्रक्रिया को प्रभावित किया ? अगर हां, तो किस तरह ? किस सीमा तक ? इससे भारत का हित हुआ या अहित ?


अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवियों ने इस प्रश्न पर पिछले पचास सालों में मौन ही रखा है। कारण स्पष्ट है। इस अवधि में केन्द्र में कांग्रेस ही लगातार शासन करती रही है। सरकार से उपकृत बुद्धिजीवियों ने इतना साहस नहीं दिखाया कि कांग्रेस के कर्णधार का सत्य उद्भासित करते।

सत्ता हस्तान्तरण पर लिखने वाले विदेशी विद्वानों तथा माउण्टबैटेन के निकटस्थ लेखकों की मान्यता है कि एडविना का सत्ता-हस्तान्तरण के निर्णयों में कोई हाथ नहीं था। किन्तु निष्पक्ष और स्वतंत्र विद्वानों ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि एडविना ने सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया को निश्चयात्मक रूप से प्रभावित किया था।


रिचर्ड ह्यू के शोध का निष्कर्ष है कि ‘‘एडविना के नेहरू के साथ प्रणय (अफै़र) का सत्ता हस्तान्तस्ण की वार्ता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था।’’(रिचर्ड ह्यूःमाउण्टबैटेन, पृष्ठ 224)


जैनेट मॉर्गन लिखती हैं कि हस्तान्तरण वार्ता के दौरान ‘‘एडविना बैठकों (मीटिंग्स) में मौजूद नहीं रहती थी, किन्तु लंच मंे, और सत्रों के बीच नेहरू के साथ टहलते हुए यह जानकारी प्राप्त कर लेती थी कि वार्ता कैसे चल रही है। वी०पी० मेनन ने बाद में अपनी बेटी को बताया कि नेहरू ने ‘कामनवैल्थ की सदस्यता’ (डोमिनियन स्टेटस) स्वीकार करने के लिये जो मन बनाया, उसके पीछे लेडी माउण्टबैटेन का बहुत महत्वपूर्ग योगदान था। माउण्टबैटेन ने सर एच०एल० इस्में को लंदन तार भेजा: सत्ता के हस्तान्तरण का उदेश्य है- भारत और पाकिस्तान दोनों को डोमिनियन स्टेटस। (जैनेट मॉर्गन: एडविना माउण्टबैटेन, पृष्ट 394)


नेहरू पर एडविना के प्रभाव का उल्लेख करते हुए रिचर्ड ह्यू ने लिखा है - ‘‘उस देश (भारत) में जहां राजनैतिक निर्णयों पर स्त्रियों का प्रभाव बिल्कुल नहीं होता था, सत्ता स्थानान्तरण समझौता वार्ता में जो लोग थे, उनकी पत्नियों की विशेष भूमिका थी; और इसमें अग्रणी भूमिका स्वयं एडविना की थी, और उसके नायक जवाहर लाल नेहरू की, जो विधुर और अकेला था, और जिसे अपने जीवन में एक औरत की जरूरत थी।’’ (पृष्ठ 323)


नेहरू को जीवन में एक औरत की जरूरत थी; और उस जरूरत को एडविना ने पूरा किया। माउण्टबैटेन ने एडविना को नेहरू की जरूरत पूरा करने के लिये प्रोत्साहित किया। माउण्टबैटेन और एडविना के प्रति नेहरू कृतज्ञता से भर उठे। वे सब कुछ उन पर निछावर करने पर तैयार हो गये। उन्होंने देश की अखंडता एडविना पर निछावर कर दी और पाकिस्तान का निर्माण स्वीकार कर लिया। 26 जनवरी, 1930 की शपथ निछावर कर दी और पूर्ण स्वराज के स्थान पर डोमिनियम स्टेटस स्वीकार कर लिया।


18 मई, 1947 को माउण्टबैटेन अपनी देश-विभाजन की योजना लेकर लंदन के लिए प्रस्थान किया। वहां प्रधानमंत्री एटली ने योजना को सार्वजनिक करने के पूर्व चर्चिल की अनुमति लेना आवश्यक समझा। एटली जानते थे कि बिना चर्चिल की टोरी पार्टी के सहयोग के ब्रिटिश संसद में ‘इंडिया इंडपेंडेंस एक्ट’ पास नहीं हो सकता। अतएव चर्चिल के पास जाकर माउण्टबैटेन ने उनको अपनी योजना से अवगत करावाया। चर्चिल को विश्वास नहीं हुआ कि कांग्रेस ने अपना पूर्ण स्वराज का लक्ष्य त्यागकर ‘डोमिनियम स्टेटस’ स्वीकार कर लिया है तथा उसको विभाजन भी स्वीकार है। उत्तर में माउण्टबैटेन ने उनको नेहरू की लिखित स्वीकृति दिखाई, जो वह अपने साथ हिन्दुस्तान से लाया था। नेहरू की सहमति के पत्र को देख कर चर्चिल के तनाव भरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने माउण्टबैटेन को अपना आशीर्वाद दिया। (कॉलिन एण्ड लेपियो: फ्रीडम एट मिडनाइट; पृष्ठ 150)


नेहरू जी ने विभाजन और डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करने का पत्र माउण्टबैटेन को देने के पहले, न तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी का परामर्श लिया था और न अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का। कांग्रेस प्रेसीडेण्ट मौलाना आजाद से भी अनौपचारिक अनुमति नहीं ली थी। फिर भी अपने स्तर से, बिल्कुल अपने स्तर से, नेहरू ने विभाजन और डोमिनियन स्टेटस को स्वीकार करते हुए माउण्टबैटेन को लिखित सहमति दे दी थी। कोई भी नेता इतना बड़ा निर्णय अपने आप लेने का जोखिम नहीं उठाता। किन्तु नेहरू पर तो एडविना का जादू था। वही जो सर चढ़ कर बोले। एडविना के प्यार में, नेहरू वह सब कुछ करने को तैयार हो गये जो देश हित में नहीं था।


देश के विभाजन में दस लाख लोग मरे, या बीस लाख या तीस लाख, सही आंकडे कोई नहीं जानता और न जान सकता है। पूरे के पूरे गांव साफ़ हो गये। फिर मरने वालों की गवाही देने कौन आता। मुरदे तो मरने वालों की सूची में नाम लिखाने नहीं आ सकते। विभाजन की जिम्मेदारी कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार पर थी। इन तीनों के फैसले से देश खंडित किया गया था। अतएव विभाजन की विभीषिका का दायित्व भी इन तीनों के हिस्सों में जाता है। तब ही अंग्रेजों ने, और हिन्दुस्तान तथा पाकिस्तान की सरकारों ने विभाजन के फलस्वरूप मरने वालों की संख्या को छिपाया है। भारत में तो कांग्रेस सरकार ने जैसे 1947 के हत्याकांडो को भूल ही जाना चाहा है। जो भी हत्याकांडो को याद करता उसे सांप्रदायिक की संज्ञा दी जाती है।


कांग्रेस द्वारा विभाजन करने में सर्वाधिक क्रियाशील भूमिका जवाहर लाल नेहरू की थी और जब भी विभाजन के दौरान हत्याओं, आगजनी, बलात्कार, आमहत्याओं का लेखा-जोखा लिया जायेगा, तो नेहरू और एडविना माउण्टबैटेन के नाम एक साथ लिए जाएंगे। एडविना के प्रयत्न के फलस्वरूप ही भारत में निवेशित अपनी अपार धनराशि ब्रिटेन बचा सका। इस सेवा के लिए कृतज्ञ ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण के बाद एडविना माउण्टबैटेन को जी.बी.ई. की उपाधि और ‘चाइनीज़ आर्डर ऑफ ब्रिलिएंट स्टार’ से अलंकृत किया। अपनी पत्नी को जवाहर लाल नेहरू को अर्पित करने के महान कार्य द्वारा ब्रिटेन की सेवा करने के लिए लार्ड माउण्टबैटेन (लुई फ्रांसिस एलबर्ट विक्टर निकोलस माउण्टबैटेन) को ‘अर्ल’ की उपाधि से विभूषित किया गया।


प्राचीन काल में किसी शत्रु राजा को पराजित करने के लिए सुन्दर बालाएं उसको सम्मोहित करने के लिए भेजी जाती थीं। इन सुन्दरियों को विषकन्या कहा जाता था। ब्रिटिश हित साधन के लिए जवाहर लाल नेहरू को प्रलोभित करके अपने प्रेमजाल में फांसने वाली एडविना माउण्टबैटेन को क्या भारतीय इतिहास की आधुनिक विषकन्या कहना अनुचित होगा?


इतिहास गवाह है कि, अपवादों को छोड़कर, विदेशी सदा ही इस देश को लूटने और उजाड़ने आये हैैं। विदेशियों ने अनेक-अनेक रूपों में इस देश पर आक्रमण किया-कभी शक बनकर, तो कभी हूण, तुर्क, अफ़गान, ईरानी या मुगल बनकर। विदेशियों ने पुर्तगाली, डच, फ्रंासीसी और अंग्रेज बनकर भारत की आजादी का हरण किया और भारतवासियों को गुलाम बनाया। आजादी के बाद पाकिस्तान ने चार बार और चीन ने एक बार भारत की सीमाओं का अतिक्रमण कर भारत पर हमला किया। हमंे अपनी आजादी की सतत् रक्षा करनी होगी, क्योेंकि विदेशी किसी भी रूप में, कभी भी, हम पर आक्रमण कर सकता है।


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