भारत के प्रथम राष्ट्रपति और प्रथम प्रधान मन्त्री के बीच "संबंधो में खटास"

जब प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रशासन के अंतर्गत जीप घोटाला, धरमा तेजा कांड, मुंधरा कांड आदि जैसे भ्रष्टाचार के मामलों का लगातार भंडाफोड़ हो रहा था, तो राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिख कर सावधान किया --"भ्रष्टाचर एक दिन कॉंग्रेस के ताबूत मेँ कील सिद्ध होगा।" (दुर्गादास: 'इंडिया फ़्रोम कर्ज़न टु नेहरू एंड आफ्टर': पृष्ठ 336; प्रकाशक: रूपा एंड कंपनी, नई दिल्ली)। राजेन्द्र प्रसाद ने उस पत्र मेँ राष्ट्रपति के अधीन एक 'ट्रिबूनल' बनाने या लोकपाल नियुक्त करने के सी. डी. देशमुख के प्रस्ताव का समर्थन किया। किन्तु जवाहर लाल ने इस पत्र का उत्तर नहीं दिया। आज लगभग साठ वर्षों बाद राजेंन बाबू की भविष्यवाणी शत-प्रतिशत सही सिद्ध हो रही है। आज वास्तव मेँ भ्रष्टाचार कॉंग्रेस के ताबूत में कील सिद्ध हो रहा है।


पिछली शताब्दी के तीसरे दशक से ही कॉंग्रेस पार्टी दो घटकों मेँ विभाजित थी। एक के नेता सरदार पटेल थे, तथा दूसरे के नेता जवाहर लाल नेहरू। सरदार पटेल को कॉंग्रेस मेँ बहुमत का समर्थन था। किन्तु नेहरू पर गांधीजी का वरद हस्त था, इसलिए वह पटेल पर भारी पड़ते थे। राजेन्द्र प्रसाद पटेल घटक में थे। दोनों घटकों के बीच विभेद और संघर्ष उस काल का कोंग्रेसी-सत्य है।


जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति पद हेतु प्रत्याशी का चुनाव करने का प्रश्न आया, तो पटेल घटक ने राजेन्द्र प्रसाद का नाम आगे बढ़ाया। राजेन्द्र प्रसाद को नेहरू पसंद नहीं करते थे। वह उनको पुरातन पंथी, दक़ियानूसी, और साम्यवादी शब्दावली मेँ 'प्रतिक्रियावादी' समझते थे। अतएव उन्होने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का नाम प्रस्तावित किया।


नेहरू ने राष्ट्रपति के पद हेतु प्रत्याशी का चुनाव करने के लिए एक औपचारिक बैठक बुलाई। उसमें उन्होने राजगोपालाचारी के पक्ष मेँ कसीदे पढे। किन्तु कोंग्रेसी नहीं पसीजे। राजगोपालाचारी ने 1942 के आंदोलन मेँ भाग नहीं लिया था। पाकिस्तान की मांग के समर्थन में भी वे पहले कोंग्रेसी थे। अधिकांश कांग्रेसी राजगोपालाचारी के विरोध में थे। मजबूरन जवाहर लाल नेहरू को भी राजेन बाबू को ही राष्ट्रपति पद हेतु स्वीकार करना पड़ा।


नेहरू इस पराजय को नहीं भूल सके। और जब राजेन्द्र प्रसाद को राष्ट्रपति पद पर दूसरा सत्र देने का प्रश्न आया, तो नेहरू ने उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का नाम प्रस्तावित किया। उन्होने दक्षिण भारत के चारों मुख्यमंत्रिओं की एक बैठक बुलाई, और उनको प्रेरित किया कि वे मिलकर राजेन्द्र प्रसाद के बाद एक दक्षिण भारतीय को राष्ट्रपति बनाने की मांग करें। नेहरू का यह षड्यंत्र असफल हो गया क्योंकि मुख्य मंत्रियों ने कहा की वे राजेन्द्र प्रसाद से संतुष्ट है, और इस मामले को उत्तर-दक्षिण विभेद का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। अंतत: नेहरू की इच्छा के विरुद्ध राजेन्द्र प्रसाद दूसरी बार राष्ट्रपति बनाए गए। नेहरू इसे स्वीकार नहीं कर सके। पूरे दस साल तक वह राष्ट्रपति के प्रति अपना वैर निभाते रहे, और हर तरह से उनको नीचा दिखाने का प्रयत्न करते रहे। सतत उनको पिन चुभाते रहे।


राष्ट्रपति पद से अवकाश प्राप्ति के दस माह पूर्व राजेन्द्र प्रसाद गंभीर रूप बीमार हो गए थे। सबको लगा कि उनका अंत निकट है। पत्रकार दुर्गादास के अनुसार नेहरू ने लाल बहादुर शास्त्री को उनके अंतिम संस्कार के लिए यमुना के घाट पर स्थान देखने को कहा। साथ ही यह हिदायत भी दी कि वह स्थान गांधी जी की समाधि के बहुत निकट न हो। कदाचित नेहरू वह स्थान अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते थे। मृत्यु के बाद भी वह राजेन्द्र प्रसाद से अपनी शत्रुता जारी रखना चाहते थे।


राजेन्द्र प्रसाद की अवकाश-प्राप्ति के कुछ महीनों पश्चात पटना में मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि मृत्यु के पश्चात मृतक के सब गुनाह क्षमा करके उसके प्रति शत्रुता को भूल जाना चाहिए। किन्तु नेहरू का हृदय इतना विशाल नहीं था। वह मृत्यु के बाद भी राजेन्द्र प्रसाद के प्रति अपनी शत्रुता की भावना को नहीं दबा पाये। उन्होने राष्ट्रपति राधाकृष्णन को पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना जाने से माना किया। सरदार पटेल की मृत्यु के पश्चात भी उन्होने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को पटेल के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए मुंबई जाने से माना किया था। किन्तु राजेन्द्र प्रसाद प्रधानमंत्री के परामर्श की अवहेलना करके मुंबई गए थे। ठीक उसी प्रकार, राष्ट्रपति राधाकृष्णन भी नेहरू के परामर्श की अवहेलना करके राजेन्द्र प्रसाद के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना गए।


राज्यपालों, राजदूतों तथा संवैधानिक पदों पर, प्रधान मंत्री के स्तर से ही नेहरू नियुक्ति कर देते थे, जिसकी सूचना राष्ट्रपति को समाचार पत्रों से प्राप्त होती थी। विदेशी राज्यों से राष्ट्रपति के लिए निमंत्रण आने पर भी राजेन्द्र प्रसाद को नेहरू विदेश नहीं जाने देते थे। अमेरिका के राष्ट्रपति आईसेन्होवर ने राजेन्द्र प्रसाद को निमंत्रित करते हुए यह सूचित किया कि वह स्वयं उनके साथ अमेरिका में यात्रा करेंगे। लेकिन नेहरू के विदेश मंत्रालय ने सहमति नहीं दी। बड़ी कठिनाई से राजेन्द्र प्रसाद को आसपास के देशों जैसे श्री लंका, इंडोनेशिया, वितनाम आदि देशों में जाने दिया। एक बार बड़ी जद्दोजहद के बाद रूस जाने दिया।


प्रसाद से नेहरू का व्यक्तिगत मतभेद लखनऊ के कॉंग्रेस अधिवेशन से प्रारम्भ हुआ जिसमें नेहरू ने अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा- "मैं पूर्णतया आश्वस्त हूँ कि विश्व की समस्याओं और भारत की समस्याओं का हल समाजवाद में है।" उन्होने आगे कहा कि कॉंग्रेस संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार समाप्त कर देगी, और फायदे के लिए किए जा रहे व्यक्तिगत व्यापार के स्थान पर सहकारिता लाएगी। नेहरू की इस घोषणा का राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को एक पत्र लिखकर विरोध किया। उस पत्र पर सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी तथा राजगोपालाचारी ने भी हस्ताक्षर किए। बाद में कॉंग्रेस वर्किंग कमेटी के सात सदस्यों ने कमेटी से त्यागपत्र दे दिया। गांधीजी के हस्तक्षेप से मामला रफा-दफा हुआ।


नेहरू की इछा के विपरीत के एम मुंशी ने सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। उसके शिलान्यास हेतु मंदिर निर्माण समिति ने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को निमंत्रित किया। पत्रकार दुर्गादास की पुस्तक 'इंडिया फ़्रोम कर्ज़न टु नेहरू एंड आफ्टर' के अनुसार प्रधान मन्त्री नेहरू ने राष्ट्रपति को परामर्श दिया कि एक पंथ-निरपेक्ष राज्य के प्रधान को इस प्रकार के धार्मिक पुनरुत्थानवादी कार्यक्रम से नहीं जुड़ना चाहिए। " प्रधान मन्त्री की अवज्ञा करके राजेन्द्र प्रसाद वहां गए। उन्होने कहा- " मेरी धर्म में श्रद्धा है। मैं अपने आपको उससे अलग नहीं कर सकता।" अपने परामर्श की अवज्ञा से क्रुद्ध नेहरू ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को आदेश दिया कि वे सोमनाथ मंदिर के शिलान्यास पर राष्ट्रपति द्वारा दिये गए अभिभाषण पर प्रैस-नोट नहीं जारी करें। हिन्दी में एक कहावत है—खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।


राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जब वाराणसी गए तो उन्होने एक संत के सार्वजनिक रूप से चरण स्पर्श किए। जब नेहरू ने इसपर आपत्ति की, तो उन्होने पत्र लिखकर उसका प्रतिवाद किया और कहा देश के उच्चस्थ पद पर आसीन व्यक्ति भी एक विद्वान से छोटा होता है।


राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियो एवं असमानता के सुधार के पक्षधर थे। हिन्दू कोड बिल पर राजेन्द्र प्रसाद का विरोध सैद्धान्तिक था। वे चाहते थे कि सुधार की मांग स्वयं समाज से आए। समाज सुधार हिन्दू और मुसलमान, दोनों में एक साथ होना चाहिए। सरकार द्वारा केवल एक समाज के सुधार का अधिनियम सांप्रदायिक होगा। नेहरू में इतना साहस नहीं था कि इस्लामी शरीयत कानून से छेदछाड़ करें।


राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद प्रधान मंत्री नेहरू की कश्मीर नीति और तिब्बत तथा चीन नीति से भी सहमत नहीं थे। वे कश्मीर के भारत में सम्पूर्ण विलय के पक्षधर थे। वे तिब्बत की स्वायत्तता बनाए रखना चाहते थे। वे चीन के सम्मुख समर्पण के विरोधी थे। अगर प्रधान मंत्री ने राष्ट्रपति के परामर्श को सुन लिया होता तो आज के भारत की दुर्दशा नहीं होती।


राजेन्द्र प्रसाद निम्न माध्यम वर्ग में जन्मे थे। किन्तु वे अपने घोर परिश्रम और क्षमता से आगे आए थे। पटना हाई कोर्ट के बड़े और सफल वकीलों में उनकी गिनती होती थी। पत्रकार दुर्गादास के अनुसार अगर वे कॉंग्रेस में शामिल न हुए होते, तो हाईकोर्ट के जज होते। इसके विपरीत जवाहर लाल अतिधनी परिवार में जन्मे थे। उनकी वकालत कभी नहीं चली। वे अपनी पत्नी और पुत्री सहित अपने पिता पर आश्रित रहे। और बाद में जब कॉंग्रेस में आए तो गांधी जी के हस्तक्षेप पर कॉंग्रेस के महामंत्री(1924), अध्यक्ष (1929, 1936 तथा 1937) बन सके। 1946 में अन्तरिम सरकार में प्रधान मन्त्री भी वह गांधी के हस्तक्षेप से ही बने थे, जबकि बहुमत सरदार पटेल के पक्ष में था। नेहरू ने जीवन में जो कुछ भी पाया वह सिफ़ारिश के आधार पर थे। राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू में वही अंतर था जो एक क्षमतावान और सिफारशी के बीच होता है। यह सही है कि सांसारिक दृष्टि से नेहरूजी राजेन्द्र प्रसाद से अधिक सफल थे। किन्तु अभी इतिहास का अंतिम निर्णय आना शेष है।

Featured Posts
Recent Posts