भगत सिंह की फांसी : गांधीजी और अंग्रेजों की सहमति

दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, सन् 1931 में गांधी जी ने वायसराय इर्विन से अपनी वार्ता के दौरान भगत सिंह तथा उसके साथियों की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए नहीं कहा था। इसके विपरीत उन्होंने अंग्रेजों को आश्वासन दिया था कि वे भगतसिंह के पक्ष में होने वाली जनसभाओं को रोकने में उनकी सहायता करेंगे।


प्रीवी काउन्सिल ने भगत सिंह की अपील को 11 फरवरी, 1931 को रद्द करते हुए उसकी फांसी की सज़ा बहाल रखी। इसके ठीक छह दिनों बाद महात्मा गांधी और अंग्रेज वायसराय लार्ड इर्विन की की वार्ता प्रारम्भ हुई। पूरे भारत वर्ष को उम्मीद थी कि वार्ता में भगत सिंह की फांसी पर भी चर्चा होगी और गांधी जी भगत सिंह को फांसी के फंदे से बचा लेंगे।


26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस ने अपना उद्देश्य ‘पूर्ण स्वराज’ की प्राप्ति घोषित किया था। इसके पूर्व भी कांग्रेस के अनेक नेता और विभिन्न कांग्रेसी प्रस्ताव स्वराज की मांग करते रहे थे, परन्तु इस स्वराज का अर्थ केवल यह था कि वे अंग्रेजी आधिपत्य के अन्तर्गत ‘स्वशासन’ या ‘स्वायत्त शासन’ चाहते थे। अतएव ‘स्वराज’ का अर्थ अंग्रेजों के आधिपत्य से पूर्णतया मुक्त ‘आजादी’ या ‘स्वाधीनता’ नहीं था। पहली बार 1928 के कांग्रेस-अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ (आजादी) की मांग उठी थी। किन्तु गांधीजी एकदम से अंग्र्रेजों से आजाद होने के लिए तैयार नहीं थे। अतएव उन्होंने अपने व्यक्तित्व और प्रभाव के सहारे एक साल के भीतर हिन्दुस्थान को ‘ब्रिटिश कॉमनवेल्थ’ के अन्तर्गत ‘डोमीनियन स्टेटस’ देने की मांग का प्रस्ताव पारित करवाया। गांधी जी को उम्मीद थी, कि एक साल के भीतर अंग्रेज कांग्रेस की इस मांग को स्वीकार कर लेेंगे और आगे आन्दोलन नहीं चलाना होगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। अतएव विवश होकर गांधीजी को दिसम्बर 1929 में सम्पन्न हुए कांग्रेसी अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ के प्रस्ताव पर सहमति देनी पड़ी।


गांधीजी संदेह के घेरे में


‘पूर्ण-स्वराज’ के प्रस्ताव के पारित हो जाने के बाद सुभाष चन्द्र बोस और उनके साथियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष का प्रस्ताव रखा। सुभाष ने तो यह भी प्रस्तावित किया कि अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध स्वतन्त्र भारत की एक समानान्तर सरकार की घोषणा की जाए। किन्तु गांधी जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ प्रारंभ किया। इसके अन्तर्गत सत्याग्रहियों को अंग्रेजी राज्य व्यवस्था की अवज्ञा करते हुए, सीधे समुद्र से नमक बनाना था। यह ‘नमक-आन्दोलन’ सांकेतिक था। इस घोषणा से कांग्रेस के युवा सदस्य प्रसन्न नहीं थे। उनका कहना था कि नमक खुद ही मिट्टी के मोल है और उस पर अंग्रेजों द्वारा लगाया जा रहा कर एक पैसे में भी कम है। अगर इस आन्दोलन के कारण अंग्रेज यह नमक-कर हटा भी लेते हैं, तो उनकी आर्थिक स्थिति पर तनिक भी विषम प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनका यह भी आक्षेप था कि गांधी ने जानबूझ कर कमजोर मुद्दा उठाया है, जिससे अंग्रेजों के हितों को आन्दोलन के कारण कोई वास्तविक हानि न हो।


सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तार्किक परिणति के पूर्व ही गांधी जी ने उसे भंग कर दिया। उन्हंे वायसराय इर्विन ने वार्ता हेतु आमंत्रित किया था। यह गांधी-इर्विन वार्ता 17 फरवरी, 1931 को प्रारम्भ हुई और 5 मार्च, 1931 तक चली। 5 मार्च को गांधी-इर्विन समझौता घोषित हुआ। समझौते के अनुच्छेद 12 तथा 13 में कहा गया कि वे सब मुकदमें वापस ले लिए जाएंेगे और वे सब बंदी जेलों से छोड़ दिए जाएंगे जो केवल ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन से संबंधित हैं, यदि उन पर हिंसा या हिंसा भड़काने का आरोप न हो।’ इस शर्त से स्पष्ट है कि गांधी-इर्विन समझौते के अन्तर्गत भगत सिंह और उसके दो साथियों का मामला नहीं आता था। उस समय भगत सिंह का नाम हर हिन्दुस्तानी की ज़बान पर था। बच्चे, बूढे़, जवान, सब ही उनके साहस और देश-प्रेम से प्रभावित थे। वे मामूली से मामूली आदमी की निगाह में ‘नायक’ थे। उनके दिल में उनके लिए सम्मान और जगह थी। सब उम्मीद करते थे कि गांधी-इर्विन वार्ता के परिणाम-स्वरूप भगत सिंह और उसके साथियों की फांसी की सजा या तो रद्द कर दी जाएगी या आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दी जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांधी-इर्विन समझौते से निराशा का वातावरण छा गया।


जनता भ्रम में रही


गांधी जी भी जन-भावना से अनभिज्ञ नहीं थे। वह जहां भी जाते वहां लोगों की आंखों में प्रश्न देखते। वे लोग गांधी जी से जानना चाहते थे कि भगत सिंह की फांसी की सजा क्यों नहीं रद्द हो सकी ? लोगों को गांधी जी पर अटूट विश्वास था। वे समझते थे कि गांधी जी अगर चाहेंगे तो वायसराय से कहकर भगत सिंह की सजा को कालापानी में परिवर्तित करवाकर, उनकी जान तो जरूर बचा लेंगे। और जब अचानक उन्होंने सुना कि 23 मार्च, 1931 की शाम को भगत ंिसंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दे दी गई, तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। सबके मन में बार-बार यह उठ रहा था:- गांधी जी ने भगत सिंह की जान बचाने के लिए बहुत प्रयत्न किया होगा, लेकिन इर्विन अपनी बदमाशी से बाज नहीं आया और उसने भगत सिंह को फांसी देकर ही सन्तोष किया। स्वयं गांधी जी ने भी इस आशय के बयान दिए।


‘यंग इंडिया’ नामक अखबार में गांधी जी ने जून 1931 को लिखा - ‘मैंने अपने आपको भगत सिंह की मौत की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित करवाने के आन्दोलन में लगा दिया था। मैंने इस काम में अपनी पूरी जान लगा दी थी।’


इसके पहले 26 मार्च 1931 के एक पत्रकार-सम्मेलन में उन्होंने पत्रकारों से कहा था - ‘मैंने भगत सिंह और उसके साथियों को बचाने के लिए जो प्रयत्न किये थे, उसका ब्यौरा देकर मैंने आपको परेशान नहीं किया था। जितनी अधिक से अधिक संभव थी, उतनी मैंने वायसराय से चिरोरी की। मैंने अपनी शक्तिभर उनको (वायसराय को) इसके लिए राजी करने का प्रयत्न किया था।’


गांधी जी के उपरोक्त शब्दों से तो यही लगता है कि गांधी जी ने भगत सिंह की जान बचाने का पूरा प्रयत्न किया था। किन्तु पत्रकार ए.जी. नूरानी ने 1996 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ट्रायल ऑफ भगत सिंह’ (कोणार्क प्रकाशन) में अनेक प्रमाणों से यह सिद्ध किया है कि गांधी जी ने भगत सिंह की जान बचाने का कोई गंभीर प्रयत्न नहीं किया। इस पुस्तक में ‘गांधी जी का सत्य’ शीर्षक से एक अध्याय है, जिसमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि भगत सिंह के संदर्भ में ‘गांधी का सत्य’ वास्तव में असत्य था। सहसा यह विश्वास नहीं होता कि महात्मा गांधी के स्तर का व्यक्ति वास्तविकता को छिपाने के लिए सार्वजनिक रूप से असत्य बोलेगा। महात्मा गांधी को लोग राष्ट्रपिता मानते हैं। अतएव यह आवश्यक है कि उन तथ्यों का परीक्षण किया जाए जिनके आधार पर ए.जी. नूरानी गांधी जी पर यह आरोप लगाते हैं।


ए.जी. नूरानी लिखते हैं कि 17 फरवरी से 5 मार्च 1931 तक गांधी-इर्विन वार्ता के दौरान 18 फरवरी को गांधी जी ने भगत सिंह की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने का उल्लेख किया। इर्विन ने इस बातचीत के आधार पर उसी दिन जो व्यक्तिगत ‘नोट’ बनाया था, उसका आखिरी परिच्छेद इस प्रकार हैः उन्होंने (गांधीजी ने) भगत सिह का मामला उठाया। उन्होंने सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने के लिए नहीं कहा... उन्होंने परिस्थितियों को देखते हुए मृत्युदण्ड को कुछ काल के लिए निलंबित (सस्पंेड) करने के लिए अवश्य कहा.... (ए.जी. नूरानी: ट्रायल ऑफ भगत सिंह, पृष्ठ 236)। इर्विन का यह ‘नोट’ राष्ट्रीय अभिलेखागार में है। इसको पढ़ने से यह निर्विवाद रूप से स्थापित होता है कि गांधी जी ने भगत सिंह के जीवन बचाने के लिए गांधी-इर्विन वार्ता के दौरान कोई प्रयत्न नहीं किया। वह केवल कुछ समय के लिए उसकी फांसी को टालना चाहते थे।


इर्विन के ‘नोट’ के तथ्यों की पुष्टि गांधी जी के सचिव महादेव देसाई की डायरी से भी होती है। गांधीजी ने स्वयं महादेव देसाई को बताया थाः ‘मैंने उनसे (लार्ड इर्विन से) कहा - इसका हमारी वार्ता से कोई सम्बन्ध नहीं है, और हो सकता है कि यह उल्लेख अनुचित भी हो। किन्तु आप आज के वातावरण को अनुकूल बनाना चाहते हैं तो आपको भगत सिंह की फांसी स्थगित कर देनी चाहिए।’ वायसराय को मेरी बात बहुत अच्छी लगी। उन्होंने कहा - ‘मैं आपका बड़ा कृतज्ञ हूं कि आपने यह मामला मेरे सामने इस प्रकार रखा। सजा को आजीवन कारावास में बदलना बहुत कठिन है, किन्तु निलंबन पर विचार किया जा सकता है।’


नूरानी ने उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि गांधी जी ने इर्विन से भगत सिंह की जान बचाने के लिए कभी कहा ही नहीं। अतएव गांधीजी का उपरोक्त 26 मार्च, 1931 को पत्रकारों के सम्मुख दिया हुआ कथन कि ‘मैंने भगत सिंह और उसके साथियों को बचाने के लिए प्रयत्न किए थे,....जितनी अधिक से अधिक संभव थी, उतनी मैंने वायसराय से चिरोरी की थी’- सत्य नहीं है। इसी प्रकार 11 जून, 1931 को ‘यंग इंडिया’ में जो गांधी जी ने लिखा कि ‘मैंने अपने आपको भगत सिंह की मौत की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित करवाने के आन्दोलन में लगा दिया था, मैंने इस काम में पूरी जान लगा दी थी।’ भी सत्य की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इससे यह निस्सन्देह सिद्ध होता है कि गांधीजी ने 17 फरवरी से 5 मार्च तक इर्विन से वार्ता के दौरान भगत सिंह की जान बचाने के लिए नाम मात्र का भी प्रयत्न नहीं किया। ज्यादा से ज्यादा कुछ दिनों के लिए फांसी के निलंबन के लिए कहा जिससे गांधी-इर्विन समझौते के देशवासियों द्वारा स्वीकार किए जाने में कोई बाधा उत्पन्न न हो। इस निष्कर्ष की पुष्टि 16 तथा 20 मार्च 1931 को गांधीजी की कथनी और करनी से भी होती है।


16 मार्च को गांधीजी की वायसराय लार्ड इर्विन से मुलाकात हुई। इस मुलाकात में हुई बातचीत के आधार पर इर्विन ने उसी दिन लिखा- ‘‘गांधी ने बताया कि इस समझौते के कराची (कांग्रेसी अधिवेशन) में अनुमोदन में कोई कठिनाई नहीं होगी... चलते चलते गांधी ने पूछा कि क्या वह भगत सिंह के मामले का उल्लेख कर सकते हैं। यह कहते हुए उन्होंने कहा कि अखबारों से यह ज्ञात हुआ है कि भगत सिंह की फांसी 24 मार्च के लिए निश्चित है। यह दुर्भाग्य पूर्ण दिन है, क्योंकि इसी दिन कराची में कांग्रेस का नया अध्यक्ष पदासीन होगा, और जनता में उस दिन बड़ी उत्तेजना होगी।... मैंने उन्हें (गांधी को) बताया कि मैंने इस मामले पर बहुत ही सावधानी पूर्वक विचार किया किन्तु मुझे कोई ऐसा न्यायोचित कारण नहीं मिला जिसके आधार पर मैं (भगत ंिसंह की) सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर सकता। अब तक मैं कांग्रेस के अधिवेशन तक इसे स्थगित करने की संभावना पर विचार कर रहा था, किन्तु सोच-समझ कर मैंने इस विचार को त्याग दिया है।’’


ए.जी. नूरानी के शब्दों में: ‘मार्च 16 की इस वार्ता में स्वर और दिशा वही थी, जो 18 फरवरी की वार्ता में थी, जो 18 फरवरी की वार्ता में थी। ये इस मत का समर्थन नहीं करते कि वायसराय ने सज़ा को आजीवन कारावास में बदलने का आश्वासन दिया था और फिर मुकर कर उसने गांधी को ‘धोखा’ दिया। इसके विपरीत उसने (वायसराय ने) फांसी की सजा के परिवर्तन को ही नहीं, स्थगन तक को साफ शब्दों में अस्वीकार कर दिया था। न इस बार और न 18 फरवरी को गांधी जी ने जोरदार शब्दों में अपनी बात रखी थी। सच तो यह है कि 24 मार्च के लिए निश्चित भगत सिंह की फांसी की सजा को उन्होंने स्वीकार कर लिया था।’


16 मार्च की शाम को गांधी जी की भंेट भारत सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव एच.डब्ल्यू. एमर्सन के साथ हुई। तीन घंटे तक चली इस भेंट में हुई वार्ता का सारांश स्वयं एमर्सन के शब्दों में राष्ट्रीय अभिलेखगार में उपलब्ध है। इसमें एमर्सन ने लिखा है- ‘‘...सरकार ने इस पर बहुत गंभीरता पूर्वक विचार किया कि फांसी कराची अधिवेशन के पूर्व दी जाए या बाद में। यह सोचा गया कि फांसी का निलम्बन... गांधी के लिए न्यायोचित नहीं है क्योंकि इससे लोगों में यह धारणा बनेगी कि फांसी की आजीवन कारावास में परिवर्तन विचाराधीन है, जबकि ऐसा कुछ भी विचाराधीन नही है। वह (गाँधी) इससे सहमत थे कि यह अच्छा होगा कि अब और प्रतीक्षा (विलम्बन) न की जाय। उन्हांेने यह भी प्रस्तावित किया - बहुत गंभीरता पूर्वक नहीं, कि एक तीसरा रास्ता भी है कि सजा को कारावास में परिवर्तित कर दिया जाए। उनका इस मुद््दे पर विशेष आग्रह नहीं था। मैंने उनको बताया कि यह बिना किसी फसाद के निबट जाए तो हम लोग अपने को भाग्यवान समझेंगे। मैंने उनसे यथासंभव उन आम सभाओं और उत्तेजक भाषणों को रोकने के लिए अनुरोध किया जो अगले कुछ दिनों में दिल्ली में होने जा रहे है। गांधीजी ने अपनी शक्तिभर इन्हें रोकने का वादा किया।’’


सन् 1931 से अभिलेखागार के बस्ते मंे बन्द एमर्सन के ये शब्द चिल्ला कर कह रहे हैं कि अंग्रेजों और गांधी जी के बीच भगत सिंह और उसके साथियों को फांसी देने के संबन्ध में एक अनकही सहमति थी। इसीलिए अंग्रेजों को गांधी जी के हित की चिन्ता थी और गांधी जी ने अंग्रेजों के हित में भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिए आयोजित होने वाली सार्वजनिक सभाओं और उनमें अपेक्षित उत्तेजक भाषणों को रोकने का जिम्मा लिया था।


अगले दिन 20 मार्च 1931 को एमर्सन और गांधी के बीच जो पत्र व्यवहार हुआ, वह दोनों के बीच घनिष्ठता और सौहार्द का निश्चित परिचायक है-

गवर्नमेंट ऑफ इंडिया

होम डिपार्टमेंट, नई दिल्ली

मार्च 20, 1931


प्रिय मि. गांधी,

......भगत सिंह की फांसी के कारण लोगों की भावना के भड़कने की संभावना पर कल रात में हम लोगों में वार्ता हुई थी, उसके संदर्भ में चीफ कमिश्नर ने मुझे सूचित किया है कि सुभाषचन्द्र बोस ने शहर में एक इष्तहार जारी किया है कि वह आज शाम 5.30 बजे एक आम सभा में भाषण देगा। सरकार इसके लिए आपकी बहुत प्रषंसा करेगी अगर आप इसको रोकने में सहायता करेंगे....

भवदीय

एच.डब्ल्यू.एमर्सन

एम.के.गांधी

1, दरियागंज, दिल्ली

इसका उत्तर गांधी ने उसी दिन दिया-

1, दरियागंज, दिल्ली

मार्च 20, 1931

प्रिय मि. एमर्सन,

मुझे आपका पत्र अभी ही मिला। आपने आमसभा का उल्लेख किया है, इसके बारे में मैं जानता था। मैने यथा संभव सब ही सावधानियां ले ली हैं, और उम्मीद करता हूं कि कुछ अवांछित नहीं होगा। मेरी सलाह है कि वहां पर पुलिस दल न दिखाई दें, और न सभा में किसी प्रकार की रुकावट डाली जाए। इस बैठक से तो चिढ़न निस्संदेह होगी। लेकिन यह ज्यादा अच्छा होगा कि लोग अपने दिल की भड़ास बैठक के जरिये निकाल लें।

भवदीय

(एम.के.गांधी)

एच.डब्ल्यू.एमर्सन

चीफ सेक्रेटरी टु गवर्नमेंट ऑफ इंडिया

नई दिल्ली

ए.जी. नूरानी के शब्दों मेंः ‘‘इनको (गांधी को) बार-बार यह बता दिया गया था कि फांसी की सजा क्रियान्वित की जाएगी; इस पर भी उन्हांेने एक कदम और आगे बढ़कर सरकार को सलाह दी कि फांसी से उत्पन्न होने वाली स्थितियों से कैसे निपटा जाए।’’


उपरोक्त निष्कर्षों की पुष्टि डा. पट्टाभि सीतारमैय्या के लेखन से भी प्राप्त होती है। उन्होंने लिखा है: ‘‘इर्विन ने इस मामले में कुछ भी कर सकने में अपनी असमर्थता व्यक्त की, किन्तु उसने फांसी की सजा को कराची कांग्रेस के बाद तक स्थगित रखने की पेशकश की।... गांधी ने स्वयं ही वायसराय से निश्चय के साथ कहा - अगर इन लड़कों को फांसी पर लटकाना है तो यही बेहतर होगा कि यह कांग्रेस अधिवेशन के पहले ही हो जाए, बाद में नहीं। इससे लोगों के हृदयों में झूठी आशा नहीं बनी रहेगी।’’


किन्तु 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह और उसके दो साथियों की फांसी के कुछ ही घंटे पहले गांधी जी ने वायसराय को इन तीन क्रान्तिकारियों के जीवन बचाने के लिए एक मार्मिक और भावुक पत्र लिखा। वायसराय ने भी पत्र पाते ही, तुरन्त ही खेद व्यक्त करते हुए अपना उत्तर गांधी जी को भेज दिया था। उसके कुछ घंटे के पश्चात शाम सात-साढे़ सात बजे तीनों वीर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गए। सारे देश में उदासी भरा सन्नाटा छा गया। लोगों में क्रोध भी धधक रहा था। इस क्रोध को सुभाष चन्द्र बोस ने मुखर किया।


जब गांधी जी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने कराची पहुंचे, तो रेलवे स्टेशन पर सुभाषचन्द्र बोस और उनकी नौजवान सभा के सदस्यों ने गांधी जी को काले झण्डे दिखाए। वे नारे लगा रहे थे- ‘गांधी वापस जाओ।’ ‘गांधी मुर्दाबाद।’ बाद में, उसी दिन कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी पर शोक प्रस्ताव स्वयं ही लिखा। इसमें भगत सिंह की वीरता और बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी।


ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी जी, भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी से बचाने के पक्ष में नही थे। 17 फरवरी से 22 मार्च तक उन्होंने फांसी रुकवाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। लेकिन जब 20 मार्च को सुभाष चन्द्र बोस द्वारा भगत सिंह के पक्ष में आयोजित अभूतपूर्व विशाल जन सभा से गांधी जी को इन युवा क्रांतिकारियों की लोकप्रियता का अनुमान हुआ तो पहली बार उनको यह अनुभव हुआ कि अगर वह भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिए कोई प्रत्यक्ष और दिखावे कार्य नहीं करते, तो वह जन-आक्रोश से बच नहीं पायेंगे। और भगत सिंह की हत्या का सारा दायित्व उन पर ही मढ़ दिया जाएगा। अतएव उन्होंने भगत सिंह की मृत्यु के केवल कुछ ही घंटे पहले 23 मार्च, 1931 को पत्र लिखा। गांधी जी का भगत सिंह के लिए वायसराय को यह पहला पत्र था। गांधी जी जानते रहें होंगे कि आखिरी वक्त पर भगत सिंह हेतु जीवन याचना का कोई अर्थ नहीं है। फिर भी उन्होंने यह पत्र लिखा-केवल यह दिखाने के लिए कि उन्होंने भगत सिंह का जीवन बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


ए.जी. नूरानी ने अपनी पुस्तक ‘ट्रायल ऑफ भगत ंिसंह’ के अध्याय ‘गांधीज़ ट्रुथ’ का अन्त करते हुए लिखा हैः- ‘‘फरवरी 18 से 22 मार्च के बीच गांधी की भूमिका अत्यन्त खेदपूर्ण है। 20 मार्च को गांधी ने एक नौकरशाह-एमरर्सन को....स्थिति पर नियंत्रण करने हेतु परामर्श दिया। गांधी की 18 फरवरी और 16 मार्च की वार्ता कम खराब नहीं थी। उससे कहीं अधिक खराब तो यह था कि उन्होंने गृह सचिव को, भगत सिंह की फांसी से उत्पन्न होने वाले अपने लोगों के ही क्रोध को दबाने के लिए ब्रिटिश शासकों को सलाह दी।’’


‘अकेले गांधी ही भगत सिंह का जीवन बचा सकते थे। लेकिन भगत ंिसंह के जीवन के अन्तिम दिन के पहले तक उन्होंने ऐसा करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।’ बाद में उनका (गांधी का) दावा, जैसे कि ‘मैंने उनको (वायसराय को) भरसक मनाने का प्रयत्न किया-उन अभिलेंखों द्वारा, जो चार दशकों बाद प्रकाश में आए हैं, असत्य सिद्ध होता है। इस दुःखपूर्ण दुर्घटना में गांधी जी ने भगत सिंह के जीवन को बचाने संबंधी अपनी लार्ड इर्विन से हुई वार्ता के बारे में न तो राष्ट्र के साथ, और न अपने सहयोगियों के साथ सत्य बोला।’


भारत में गांधी जी की बहुत मान्यता है। वह देवताओं के समान पूजे जाते हैं। अधिकांश लोगों की उनमें अन्ध-श्रद्धा है। वे उनके विरुद्ध एक शब्द भी सहन नहीं कर सकते। लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे गांधी भक्तों के लिए नूरानी का शोध एक चुनौती होना चाहिए। उन लोगों से यह अपेक्षा की जाती है, कि वह नूरानी के तर्काें और साक्ष्यों को काटने वाले प्रति-तर्क और प्रति-साक्ष्यों का अन्वेषण कर गांधी जी की छवि को पुनः प्रतिष्ठित करें। क्या कोई इस चुनौती को स्वीकार करेगा ? प्रजातन्त्र का सकारात्मक पक्ष शास्त्रार्थ है।


+++

Featured Posts
Recent Posts