प्रथम प्रधानमंत्री की प्रणय कथाएं

नेहरू जी के जीवनकाल में ही कुछ लोग इस तथ्य से परिचित थे कि उनके प्रधानमंत्री अत्यंत कोमल-हृदय प्रेमी (आशिक मिज़ाज) हैैं। उनके दिल में बहुतों के लिए स्थान था। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके प्रेम-प्रसंग खुलकर चर्चा में आएं। पुपुल जयकर तथा नेहरू जी के सचिव एम. ओ. मथाई ने इस बारे में विस्तार से लिखा। अन्य भी कई स्थानों पर इसकी चर्चा हुई।


हिन्दुस्तान के अंग्रेज प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के संबध अपनी पत्नी कमला नेहरू से कभी बहुत आत्मीय नहीं रहे। नेहरू के परिवार में, उनकी माता और बहनों ने कमला की इतनी अवहेलना की, इतना सताया कि वह बीमार रहने लगी। वह अकेलापन और बीमारी ज्यादा दिन नहीं झेल सकी, और फरवरी 1936 में चल बसी। उस समय नेहरू की आयु 47 वर्ष थी।


विधुर नेहरू का नाम अनेक स्त्रियों से जुड़ा, किन्तु जो दो स्त्रियां नेहरू के जीवन में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं - वह हैं पद्मजा नायडू और एडविना माउण्टबैटेन।


सांवले रंग और मझोले कद की पद्मजा, सरोजनी नायडू की पुत्री थी। साँवले रंग के बावजूद किसी किसी में बहुत आकर्षण होता है। पद्मा का शरीर सौष्ठव और अंग-सौन्दर्य उनको अजन्ता के भित्ति चित्रों की राजकुमारी की याद दिलाता था। 18 नवंबर 1937 को उन्होंने पद्मजा को पत्र लिखा - ‘‘जबसे अजंता की राजकुमारी (का फोटो चित्र) मेरे कमरे में आई है, तबसे तुम सदा मेरे पास रहती हो। ऐसा क्या है कि जब भी मैं उसके चित्र को देखता हूं, मुझे तुम्हारी याद आती है।.... तुम्हारा प्यारा चेहरा देखने के लिए मैं कितना बेचैन हूं।’’


एक अन्य पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने पद्मजा नायडू को लिखा- ‘‘मुझे वह लिफाफा बहुत प्यारा लगा, जो तुम्हारा खत लेकर आया था। मैंने उसे पढ़ा, और एक अकेलेपन के एहसास ने मुझे जकड़ लिया। इससे मुक्त होना मेरे लिए बड़ा कठिन है।’’ (नेहरू: एम.जे. अकबर, पृष्ठ 568)


इस पत्र को लिखने के समय नेहरू की आयु 48 वर्ष थी, और पद्मा की 37 वर्ष। अधेड़ उम्र के इस ‘रोमांस’ का आधार दैहिक था। नेहरू पद्मजा के मांसल सौंदर्य से अभिभूत थे। तब ही तो, जब अनेक वर्षों बाद पुपुल जयकर ने नेहरू और पद्मजा के संबंधों के बारे में विजयलक्ष्मी पंडित (नेहरू की बहन) से पूछा, तो उसने कहा - ‘‘पुपुल, क्या तुम नहीं जानती। भाई (जवाहर लाल नेहरू) बरसों तक पद्मजा के साथ रहते थे।’’(इंदिरा गांधी: पुपुल जयकर ; वाईकिंग ; पृष्ठ - 91-92)


सन् 1936 से 1937 के ग्यारह महीनों में नेहरू ने पद्मजा को अट्ठाइस पत्र लिखे। उपलब्ध पत्रों के अनुसार पद्मजा से नेहरू के संबंध कमला नेहरू की मृत्यु के तुरंत बाद ही स्थापित हो गये थे। संबंधो के प्रारंभिक चरण में ही नेहरू ने पद्मजा को स्पष्ट कर दिया था कि उनकी ‘इच्छा इच्छाहीन (वासनाहीन) होने की नहीं है।’(पुपुल जयकर: पृष्ठ 90) और यह दैहिक-व्यवस्था दोनों के बीच दस-ग्यारह वर्षों तक चलती रही।


देश की आजादी के बाद, पद्मजा नायडू को नेहरू ने बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया था। छोटी बड़ी नौकरी के लिए परीक्षाएं होती हैं, साक्षात्कार होते हैं। पद्मजा को शायद ऐसी कोई नौकरी आसानी से न मिल पाती, किन्तु उनको राज्यपाल का पद बिना किसी विशेष योग्यता के प्राप्त हो गया। राज्यपाल का पद उनको प्रधानमंत्री के साथ हमबिस्तर होने के पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हो गया था।


भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउण्टबैटेन की पत्नी एडविना, नेहरू के जीवन में अंतिम नारी थी। जब नेहरू साठ के आसपास पंहुच रहे थे, तब एडविना के प्रेमरोग ने नेहरू को जकड़ लिया। उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में भारत में अंग्रेजी-शिक्षा के प्रचार के हक में अपना तर्क देते हुए लॉर्ड मैकॉले ने लिखा था -‘इस समय हम लोगों को एक ऐसा वर्ग निर्माण करने का सर्वाधिक प्रयत्न करना चाहिए जो हम लोगों और उन अरबों लोगों के बीच सेतु का काम करे, जिन पर हम शासन करते हैं। यह ऐसे लोगो का वर्ग होगा, जो केवल रक्त और रंग में हिन्दुस्तानी होगा, किन्तु अपनी पसंद, अपने विचारों, अपनी नैतिकता और अपनी विद्वत्ता में अंग्रेज होगा।’


मैकाले के सपने को यदि किसी हिन्दुस्तानी ने शत प्रतिशत सच किया, तो वह जवाहर लाल नेहरू थे। वह सिवाय रंग और रक्त के अपनी पसंद, विचार, नैतिकता और विद्वत्ता में पूरे अंग्रेज थे। वह सही अर्थों में लॉर्ड मैकाले के ‘मानसपुत्र’ थे। इसकी पराकाष्ठा अमरीकी राजदूत गॅलब्रेथ को कहे गये स्वयं उनके कथन में देखी जा सकती है - ‘‘भारत में शासन करने वाला मैं अन्तिम अंग्रेज हूं।’’ भारत की गुलाम मानसिकता वाले प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लिए, जो अपने आपको अंग्रेज कहने में गर्वित अनुभव करते थे, एक अंग्रेज औरत से प्रेमलीला रचाने का अवसर, उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही होगी।


एक दिन घर पहुंचने पर नेहरू ने देखा कि एडविना की जो तस्वीर मेज पर रखी रहती थी, जमीन पर पड़ी है। नेहरू समझ गए। पूछा - क्या पद्मजा आई थी? जैसे जैसे नेहरू पर एडविना का जादू बढ़ने लगा, पद्मजा का रंग ढलने लगा। और जब भारत की आजादी के बाद माउण्टबैटेन के साथ एडविना को भारत छोड़कर वापस इंग्लैंड जाना पडा, तो नेहरू के दिल की दुनिया खाली हो गई। रोज रात के दो बजे सोने से पहले वह एडविना को पत्र लिखते। उस समय कृष्णा मेनन इंग्लैंड में भारत के राजदूत थे। उन्हीं के माध्यम से नेहरू एडविना को प्रेमपत्र भेजते थे। नेहरू के ऐसे सैकडों प्रेमपत्र आज भी सुरक्षित हैं। अगर वे छापे जाएं तो उनमें उच्चकोटि का साहित्य है। एक साल तक नेहरू ने हर दिन एक खत लिखा, बिना किसी क्रमभंग के, लगातार। साल भर बाद हर सप्ताह, फिर लगभग छह-सात सालों तक हर पंद्रह दिन पर। इन पत्रों में अगर नेहरू का अनावृत्त हृदय है, उनके मन का संगीत हैै, उनके सपनों के रंग हैं, और उनके जीवन का दर्शन है, तो साथ ही सामयिक विषयों पर विचारांे का विमर्श भी है। वे दोनो व्यक्तिगत समस्याओं के लिए एक दूसरे का परामर्श मांगते थे। नेहरू तो अपनी राजनीतिक समस्याओं पर भी एडविना की सलाह लेते थे।


एडविना और नेहरू का प्रेम-प्रसंग माउण्टबैटेन की जानकारी में था। सच कहा जाए तो यह सब माउण्टबेैटेन की सहमति और स्वीकृति से था। माउण्टबैटेन और एडविना सामान्य पति-पत्नी नहीं थे। वे दोनों ही विशेष थे। दोनों आजाद ख्यालों के व्यंिक्त थे, जिनकी राहें एकदम विपरीत थीं, किन्तु दोनांे में एक समानता थी। दोनो ही समान रूप से अति महत्वाकांक्षी थे और केवल अपनी-अपनी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पति-पत्नी के रूप में एकसाथ थे। एडविना को अपने पिता की तरफ से करोड़ों-अरबों की जायदाद विरासत में मिली थी। माउण्टबैटेन के पास धन नहीं था, किन्तु राज-परिवार से उनका निकट का संबंध था। इंग्लैण्ड का सम्राट उनका चचेरा भाई था। इस विवाह से जहां एडविना को राजवंश से संबंधित होने का गौरव मिला, वहीं माउण्टबैटेन को अकूत धनराशि। दोनांे एक दूसरे के पूरक बन गये। दोनों के निहित स्वार्थों ने दोनों को साथ रखा, नहीं तो वह विवाह के प्रथम वर्ष में ही अलग हो जाते। दोनों के बीच एक प्रकार का करार था, समझौता था। दोनों ने एक दूसरो को बिल्कुल छूट दे रखी थी। इस समझौते के अंतर्गत माउण्टबैटेन के योला नामक एक फ्रांसीसी महिला के साथ शारीरिक संबंध थे, तो एडविना के अनेक पुरूषों के साथ। इस समझौते के बावजूद कभी-कभी उनके बीच ईर्ष्या का झोंका आ जाता। माउण्टबैटेन ने एडविना को पत्र लिखा - ‘जहां तक योला का संबंध है, हम सब इतने अच्छे दोस्त हैं कि एक साथ होने पर सबको आनंद आता है....लेकिन कभी उसके साथ अकेले होने का मेरा मन करता है। जैसे तुम्हे मेरी परिस्थितियों के कारण मेरे घर पर होने की संभावना पर रोना आ गया था, जब तुम वहां जवाहर से मिलने की योजना बना रही थीं। इसी तरह मैं कभी-कभी योला के साथ अकेले होना चाहता हंू। ....तुम जानती हो कि मैंने मलमक और जवाहर के साथ तुम्हारे मिलने पर कभी कोई आपत्ति नहीं की।’ मलमक सार्जेंन्ट एक गायक था जिसके साथ भी एडविना के वैसे ही प्रेम-संबंध थे, जैसे नेहरु के साथ थे।


अनेक इतिहासकारों का मत है कि एडविना का नेहरू के लिये प्रेम माउण्टबैटेन की एक सोची-समझी चाल थी। सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज, और फरवरी 1946 के नौसेना और वायुसेना में विद्रोह के बाद अंग्रेजो ने समझ लिया था कि उनको भारत से अपना बिस्तर गोल करना है। वह भारत छोड़ने के पहले भारत में अंग्रेजांे द्वारा निवेशित पूंजी को संरक्षित करना चाहते थे। इसलिये भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने के पूर्व, ब्रिटिश कामनवॅल्थ के अंतर्गत कुछ वर्षों के लिए भारत को ‘डोमिनियन स्टेटस’ देना चाहते थे और देश का विभाजन करना चाहते थे। कांग्रेस की मंाग अखंड भारत का पूर्ण स्वराज्य थी। एडविना के माध्यम से माउण्टबैटेन ने सबसे पहले नेहरू को ‘डोमिनियन स्टेटस’ तथा देश विभाजन के लिये राजी किया और फिर कांग्रेस को। इस दृष्टि से एडविना ने माउण्टबैटेन के साथ किया गया समझौता निबाहते हुए ब्रिटिश शासन की अमूल्य सेवा की। किन्तु इस दौरान, वह नेहरू से सचमुच प्रेम करने लग गई, और जब तक जीवित रही, नेहरू के प्रेम से मुक्त नहीं हो सकी।


नेहरू के अनेक भक्त और कांग्रेसी इतिहासकार यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि नेहरू और एडविना का प्रेम एकदम मानसिक और आध्यात्मिक था, उनमें शारीरिक संबंध नहीं थे। ऐसा कहने वाले लोग प्रेमगति कम समझते हैं। प्रेम में तन और मन के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं होती। मई 1956 में नेहरू ने एडविना को उड़ीसा के कोणार्क मंदिर के काम-शिल्पों के फोटो-चित्रों की एक पुस्तक अपने पत्र के साथ लंदन भेजी। पुस्तक के चयन से ही स्पष्ट है कि एडविना-नेहरु संबंधों में तन-मन की विभाजन रेखा नहीं थी।


नेहरू अपने बटनहोल में यों ही गुलाब नहीं लगाते थे। एडविना को गुलाब और उसकी खुशबू बहुत प्रिय थी। उसी की याद में नेहरू ने आजीवन कोट में गुलाब लगाया। जब एडविना उन्हें लन्दन से फोन करती थी तो यह पूछना नहीं भूलती थी कि आज उनके गुलाब का रंग क्या है ? दूसरी ओर नेहरू को महिलाओं का अपने जूड़े में फूल लगाना बहुत पसंद था। इसलिए एडविना भी आजीवन भारतीय नर्तकियों की तरह बालों में फूल लगाती रही।


एडविना का जब निधन हुआ तो बीमार होने के कारण नेहरू उन्हें देखने नहीं जा सके। एडविना की इच्छा के अनुसार समुद्र में उन्हें जल समाधि दी गई। एडविना का शव जब समुद्र में उतारा गया तो नेहरु द्वारा भेजी गई पीले गेंदे की माला उन्हें पहनाई गई। शव समुद्र की तलहटी की तरफ बढ़ चला, लेकिन नेहरू के भेजे गेंदे के पीले फूल देर तक लहरों पर तैरते रहे।


नेहरू हर साल तरह-तरह के बहाने करके लंदन जाते और एडविना से मिलते। एडविना भी किसी-न-किसी बहाने से दिल्ली आती। लोगों में चर्चा न हो, इसलिए छिप-छिप कर वे मिलते। एक बार एडविना ने दिल्ली आने का अपना हवाई टिकट मिसेज एशले के नाम से बनवाया।

एडविना-नेहरू की प्रणय-गाथा अपनी संवेदनशीलता, कविता और उदात्तता में अनुपम होती, अगर इसका प्रारंभ राजनैतिक छल के साथ न हुआ होता।


पद्मजा नायडू और एडविना माउण्टबैटेन के अतिरिक्त नेहरू के सचिव एम. ओ. मथाई ने अपनी पुस्तकों - ‘‘रेमिनीसेन्सेज़ ऑफ नेहरू एज’’ तथा ‘‘माई डेज़ विद नेहरू’’ में नेहरू के श्रद्धामाता नाम की साधुनी के प्रेम-प्रसंग का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि श्रद्धामाता ने उनके पुत्र को भी जन्म दिया था। मथाई का यह कथन अनुत्तरित रहा है।


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