पोप और चीन की राष्ट्रीय चर्च

कुछ समय पूर्व एक समाचार प्रकाशित हुआ था कि पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने बहुत क्षोभ प्रकट किया है कि चीन सरकार ने बिना उनकी स्वीकृति के, एक चीनी ईसाई (जोसेफ़ गुओ जिंकाई) को चीन की रोमन कथोलिक चर्च के बिशप पद पर नियुक्त कर दिया है। यह उनके अनुसार चर्च के विधान का ‘‘गंभीर-अतिक्रमण’’ है। उन्होंने इस पर भी खेद प्रकट किया कि उनके द्वारा नामित पुराने तीन बिशपों को, उपरोक्त अवैधानिक नियुक्ति के समारोह में भाग लेने के लिए चीनी सरकार द्वारा विवश किया गया। संभावना प्रकट की जा रही है कि पोप चीन सरकार द्वारा नियुक्त बिशप को धर्मच्युत करके, गै़र-ईसाई घोषित कर सकते हैं।


पोप की धर्मसत्ता के विरुद्ध पहला विद्रोह, 16वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में हुआ था। चीन की चर्च का विद्रोह, इस श्रंखला में अद्यतन है।


पोप, पूरे संसार के रोमन कैथोलिक ईसाइयों के सर्वोच्च धर्मगुरु माने जाते हैं। ईसाई धर्म में, 16वीं शताब्दी में प्रोटेस्टेेंट संप्रदाय के उदय के पूर्व, योरप के सब राजा-रानी, पोप की सत्ता के सम्मुख सिर झुकाते थे। योरप के किसी भी देश में राजसिंहासन पर वही आरूढ़ हो सकता था, जिसे पोप की स्वीकृति प्राप्त हो। पोप की स्वीकृति के अभाव में राजा अवैधानिक माना जाता था। इसलिए सिंहासन के दावेदारों में पोप का आशीर्वाद पाने के लिए होड़ लगी रहती थी। पोप एक तरह से राजाओं का राजा होता था।


पोप को धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि का दर्जा प्राप्त था। योरप के ईसाई जगत में मान्यता थी कि पूरे जगत का स्वामी ईश्वर है, अतएव पूरा जगत उसके प्रतिनिधि ‘पोप’ की सत्ता के आधीन है। इसी अधिकार के अन्तर्गत पोप एलेक्ज़ेन्डर षष्टम ने सन् 1493 में विश्व को दो भागों में बांटकर, पूर्वी भाग पुर्तगाल को, तथा पश्चिमी भाग स्पेन को विजय करने और वहां ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सौंप दिया। इसी आदेश के अन्तर्गत पुर्तगाल ने भारत और अफ्रीका में अपने उपनिवेश बनाए और स्पेन ने दक्षिणी अमरीका को विजय करके उसका ईसाईकरण किया।


जब इंग्लैण्ड में ट्यूडर वंश का हेनरी-अष्टम राजा बना, तो उसने भी योरप के अन्य राजाओं के सामान पोप के आगे दण्डवत की। पोप ने उसे ‘‘डिफेंडर ऑफ फ़़ेथ’’ की उपाधि से भूषित किया। लेकिन जब उसी हेनरी अष्टम ने अपनी पत्नी केथरीन को तलाक़ देने की आज्ञा मांगी, और जब पोप ने यह आज्ञा नहीं दी, तो दोनों में ठन गई। हेनरी-अष्टम दबंग और बिगड़ैल किस्म का आदमी था, जो अपनी जिद़ के आगे किसी की नहीं सुनता था। उसने अपनी मर्ज़ी से छह विवाह किए। इनमें दो को उसने तलाक़ दिया, दो को मरवा दिया, और एक अपने आप मर गई। केवल एक पत्नी, उसके मरने के बाद तक जीवित रही। ऐसे बहुरंगी और बदरंगी इंसान की पहली पत्नी के तलाक़ में जब पोप ने बाधा डाली, तो उसे सहन नहीं हुआ। उसके आदेश से इंग्लैण्ड की चर्च ने पोप से सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया। हेनरी अष्टम ने अपने आप को ‘‘चर्च ऑफ इंग्लैण्ड’’ का सर्वाेच्च अधिकरी नियुक्त किया।


इस तरह रोमन केथोलिक चर्च से अलग और स्वतंत्र ‘‘चर्च ऑफ इंग्लैण्ड’’ की स्थापना सन् 1534 में हुई। इंग्लैण्ड के ईसाइयों ने भी रोमन केथोलिक संप्रदाय त्यागकर ‘प्रोटेस्टेन्ट’ संप्रदाय स्वीकार कर लिया। कालान्तर में, योरप के अनेक देशों ने अपने आप को पोप की धार्मिक अधीनता से मुक्त कर लिया। आज योरप की सरकारों पर पोप का वह अधिकार और दबदबा नहीं है, जो कुछ शताब्दियों पूर्व था। फिर भी वह रोमन कैथोलिक चर्च का सर्वाेच्च पदासीन अधिकारी है। संसार भर के रोमन केथोलिक ईसाई पोप को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर नमन करते हैं, और उसके आदेश को ईश्वरीय आदेश मानकर पालन करते हैं। आज भी, योरप, एशिया, अफ्रीका, अमरीका तथा आस्ट्रेलिया की सभी रोमन केथोलिक चर्चाेें के अच्च अधिकारी, जैसे आर्क-बिशप, बिशप, मिनिस्टर, कार्डिनल, विकर आदि पोप द्वारा ही नियुक्त किए जाते हैं।


चीनी सरकार ने चीन की चर्च में नियुक्ति करके, पोप के अधिकार और हस्तक्षेप को सदा के लिए समाप्त कर दिया है। विदेशी प्रभाव से मुक्त, चीन की राष्ट्रीय चर्च की स्थापना, ईसाई-इतिहास का एक नया अध्याय है। कुछ समय पूर्व, भारतीय चर्च के राष्ट्रीयकरण के सुझाव पर समाचार-पत्रोें में चर्चा हुई थी। विद्वानों ने सुझाव के पक्ष और विपक्ष में अपने मत रखे थे। किन्तु यह बात आगे नहीं बढ़ी। इस क्षेत्र में चीन की पहल, कालान्तर में, एशिया तथा अफ्रीका के देशों के लिए, उदाहरण बन सकती है। वे भी अपने देशों में, विदेशी हस्तक्षेप को समाप्त करके, स्वदेशीय चर्च की स्थापना कर सकते हैं।


और पोप का यह आदेश -

पोप का एक आदेश भी पिछले दिनों समाचार-पत्रों में देखने को मिला। वर्तमान पोप बेनेडिक्ट-सोलहवें ने आदेश दिया है कि उनके अनुयायी निरोध (कॉन्डम) का इस्तेमाल कर सकते हैं, बशर्ते यह ‘एड्स’ से सुरक्षा के लिए हो।


रोमन केथोलिक चर्च में सदा से ही परिवार-नियोजन का निषेध रहा है। गर्भपात तो वर्जित है ही, निरोध (कॉन्डम) का प्रयोग मना है। यह आदेश एक तरह से क्रान्तिकारी है, क्योंकि पहली बार पोप ने अपने अनुयायियों को कॉन्डम के प्रयोग की आज्ञा दी।


यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि ‘एड्स’ का ख़तरा प्रायः वेश्यागमन, अवैध संबन्धों तथा समलैंगिक संबन्धों में ही होता है। पति-पत्नी के पवित्र संबन्धों में नहीं।


पोप का यह आदेश अपने अनुयाइयों को, कॉन्डम का प्रयोग करते हुए, वेश्यागमन, अवैध स्त्रीसंबन्ध तथा समलैंगिक सम्बन्ध की अनुमति देता है। केवल परिवार-नियोजन के लिए पति-पत्नी के शारीरिक-संबन्ध के अवसर पर कॉन्डम के प्रयोग की आज्ञा नहीं देता है।


स्पष्ट ही, यह आदेश परिवार-नियोजन विरोधी है, और अप्रत्यक्ष रूप से वेश्यागमन, अवैध-स्त्रीसंबन्ध तथा समलैंगिक काम को मान्यता देता है। इसके बावजूद यह आदेश स्वागतयोग्य है, क्योंकि यह सोलह सौ साल पुरानी संस्था के नए युग में प्रवेश की आहट है।


Featured Posts
Recent Posts