पाकिस्तान में भीउर्दू की विभाजक भूमिका

पिछली कई दशाब्दियों से कराची जलता रहा है। कभी सुलगता है। तो कभी लपट बनकर भभक उठता है, और कभी चुपचाप अंगारे सा राख में छिपे कोयले सा दहकता है। पिछले कई वर्षों में अखबारों में कराची में हो रहे दंगो, तोड़-फोड़, आगजनी, बम-विस्फोट और हत्याओं के समाचार आते रहे हैं। यह सिलसिला कभी थम जाता है, कभी भड़क उठता है। इस पूरे कांड के केंद्र में हैं-उर्दूभाषी मुहाजिर।


मुहाजिर का अर्थ है-शरणार्थी। यानि वे उर्दूभाषी लोग जो देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में शेष हिंदुस्तान से शरणार्थी बनकर गए। वही आज वहा तोड़-फोड़ में संलग्न हैं। यह अलग विषय है कि क्यों विभाजन के पश्चात जिन हिंदुओं और सिखों ने पाकिस्तान से भागकर भारत में शरण ली थी, पिछले इतने वर्षों में इतना रच-बस गए हैं कि आज भारत में कोई भी शरणार्थी नहीं हैं, जबकि पाकिस्तान में भारत से गए मुसलमान, वहां के समाज से अलग-थलग आज भी शरणार्थी बने हुए हैं। इस बात को हिंदुस्तान के मुसलमान कब समझेंगे।

यह तो सर्वविदित है कि पाकिस्तान के निर्माण में उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमानों की भूमिका सिंध, पंजाब, और उत्तर पश्चिम सीमांत के मुसलमानों की अपेक्षा अधिक प्रखर और निर्णायक थी। और जब पाकिस्तान बना तो उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमान भारी संख्या में, अपने ‘सपनों के देश’’ में अपने सपने सच करने पंहुच गए। इनमे से अधिकांश ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में डेरा जमाया। वह इतनी संख्या में थे कि सिंध प्रांत के प्रायः सभी बड़े नगरों के सिंधी अल्पमत में हो गए। कराची में इनकी संख्या नब्बे प्रतिशत हो गई। शेष सिंध में इनकी संख्या तीस प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश और बिहार से गए हुये ये सभी शरणार्थी उर्दू बोलते थे। अतएव सिंध के सिंधिभाषियों से अलग इनकी पहचान बनी। इन लोगों ने सिंधी सीखने का प्रयत्न ही नहीं किया, क्योंकि पाकिस्तान की मांग के लिए किए गए आंदोलन के दौरान मुस्लिम लीग ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा घोषित किया था। हिन्दी और उर्दू में सिवाय लिपि के कोई विशेष अंतर नहीं है। फिर भी मोहम्मद अली जिन्ना ने, जो स्वयम् उर्दू नहीं जानते थे, उर्दू भाषा का इस्तेमाल, हिंदुओं और हिन्दी से विभेद करने के लिए, मुस्लिम अलगाववाद के एक हथियार के रूप में किया। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप लाखों हिंदुओं ने उर्दू छोड़कर हिन्दी को अपनाया। और जब यही पाकिस्तान के निर्माण के लिए लड़ने वाले सिपाही उत्तर प्रदेश और बिहार छोड़कर सिंध पहुंचे, तो वहां भी उन्होने उसी आक्रमकता के साथ, उर्दू को प्रतिष्ठित किया। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली और पाकिस्तान संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना, दोनों ही मुहाजिर थे। सरकार में मुहाजिरों का बोलबाला था। अतएव पाकिस्तान की राजभाषा का सेहरा उर्दू के सर बांधा गया।


अविभाजित भारत के बंगाल और पंजाब को विभाजित कर और उनमें सिंध, उत्तर पश्चिम सीमान्त तथा बिलोचिस्तान प्रांतो को मिलाकर पाकिस्तान बनाया गया था। इन प्रान्तों में से किसी भी प्रान्त की भाषा उर्दू नहीं थी। पंजाब में पंजाबी, सिंध में सिंधी, बंगाल में बंगाली, बिलोचिस्तान में बिलोची तथा उत्तर पश्चिम सीमान्त प्रदेश में पश्तो बोली जाती थी। इसलिए जब वहां एक बाहरी भाषा (उर्दू) लादी गई तो विरोध हुआ। प्रारम्भ में यह मात्र सुगबुगाहट थी, लेकिन कालांतर में यह विरोध विस्फोटक बनकर फूटा, जिसने पाकिस्तान को विभाजित करके बांग्लादेश अलग कर दिया। अब सिंध विभाजित होने की कगार पर खड़ा है।


बांग्लादेश बनने के पहले, पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी बांग्लाभाषी थी। शेष में पंजाबी, सिंधी, बिलोची और पश्तोभाषी थे। बंगाली स्वाभाविक रूप से यह आशा करते थे कि बहुमत की भाषा होने के कारण पाकिस्तान कि राजभाषा बंगाली होगी। किन्तु मोहम्मद अली जिन्ना ने ढ़ाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को 24 मार्च, 1948 को चेतावनी देते हुये कहा- ‘किसी गलतफहमी में न रहना। सरकारी जबान सिर्फ एक होगी........ और वह सिर्फ उर्दू ही हो सकती है।’ यह तो कुछ वैसी ही बात हुई जैसे भारत में जहां हिन्दी बहुमत की भाषा है, कोई कहे कि पश्तो राजभाषा होगी। इसने पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष का वह बीज बोया, जिसकी परिणति पाकिस्तान के विभाजन में हुई।


और जब पाकिस्तान की ‘कॉन्स्टीच्यूएन्ट असेम्बली’ (संविधान सभा) की ‘बेसिक प्रिंसिपल्स कमेटी’ ने 26 जनवरी, 1952 को अपनी सिफ़ारिश की घोषणा की कि पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू होनी चाहिए, तो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में कहर फूट पड़ा। जुलूस, बंद और हड़तालों के बीच पुलिस की गोली से तमाम विद्यार्थियों की जाने गई। सच पूछा जाए तो जिस दिन इनकी स्मृति में शहीद स्मारक बनाया गया, उसी दिन पाकिस्तान के विभाजन का शिलान्यास हो गया था। यह आंदोलन तब तक लगातार चलता रहा जब तक कि 1956 के संविधान में बंगाली को उर्दू के समकक्ष दर्जा नहीं दे दिया गया।


बांग्लादेश बन जाने के बाद शेष पाकिस्तान में राजभाषा के रूप में उर्दू का एकदम साम्राज्य हो गया। किन्तु यह साम्राज्य अन्य भाषाओं की सहमति से नहीं था, उनके ऊपर थोपा हुआ था। उर्दू के विरुद्ध विद्रोह किया सिंधी ने।


जब जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे और उनके चचा मुमताज़ भुट्टो सिंध के मुख्यमंत्री थे, तो सिंध की प्रांतीय विधानसभा ने जुलाई 1972 में ‘टीचिंग, प्रमोशन एंड यूज़ आफ सिंधी लैंगवेजेज़ ऐक्ट’ पास किया, जिसके द्वारा सिंधी का अध्यापन सभी सरकारी स्कूलों में पुनः प्रारम्भ कर दिया गया। सरकारी कामकाज में भी उसका प्रयोग होने लगा। इसके पहले पाकिस्तान के सभी सरकारी स्कूलों में सिर्फ उर्दू पढ़ाई जाती थी। सिंधी की पुनः प्रतिष्ठा से सबसे बड़ा झटका उर्दूभाषी मुहाजिरों को लगा। पूरा सिंध, सिंधी और मुजाहिरों के दंगो का रणस्थल बन गया।

प्रधानमंत्री जुल्फ़ी भुट्टो की सहानुभूति सिंधियों के साथ थी। इसके तीन कारण थे-पहला वह स्वयं सिंधी थे। दूसरा, उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सिंध में अधिकांश समर्थक सिंधी थे। तथा तीसरा, पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू होने की वजह से मुहाजिर महत्वपूर्ण पद प्राप्त कर लेते थे, जबकि सिंधिभाषी पिछड़ जाते थे। अतएव सिंधी की पुनः प्रतिष्ठा के निर्णय के पक्ष में जुल्फी भुट्टो ने तर्क दिया- ‘पंजाब, फ्रंटिअर प्रोविन्स और बिलोचिस्तान ने उर्दू को प्रांतीय राजभाषा के रूप में स्वीकार किया है - यह तथ्य अप्रासंगिक है। इन प्रांतो में से किसी की भी भाषा और साहित्य इतने पुराने और सम्पन्न नहीं हैं जितने सिंधी के।’ भुट्टो ने यह भी कहा कि सिंध में कुछ ऐसे नाम हैं जो सिवाय सिंधी के किसी अन्य भाषा में नहीं लिखे जा सकते। हर सिंधी बच्चे की सिंधी भाषा में शिक्षा न्यायोचित आकांक्षा है।


जुल्फी भुट्टो की सिंधी भाषा के पक्ष में वकालत देखकर उर्दूभाषी मुहाजिरों के विरोधियों ने पोस्टर निकाले - ‘हमंे पाकिस्तानी सदर (राष्ट्रपति) चाहिए, सिंधी सदर नहीं।’

जुल्फी भुट्टो ने पाकिस्तानी जनता को संबोधित करते हुये कहा-‘‘मैं आप लोगों को कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं पाकिस्तानी हूँ ? आप मुझसे और क्या चाहते हैं ? पंद्रह बरस की उम्र से मैंने इस मुल्क के लिए खून और पसीना बहाया है। मैं कैसे दिखा सकता हूं कि मैं पाकिस्तानी हूं ? क्या सिंधियों का कत्ल करके ? सिंध की तहजीब को मिटाकर ? हम लोगों ने अपनी ज़मीनें दी, अपने घर मिटा दिये, अपनी जिंदगियाँ दीं, उन पंजाबी, पठानों और मुजाहिरों के लिए जो सिंध में रह रहें हैं।’’ इस भावुक तकरीर के बावजूद भुट्टो के विरोधियों के मन नहीं पसीजे। वे जुल्फी को अनादर और व्यंग से ‘राजा दाहिर’ कहने लगे। राजा दाहिर मुसलमानों के प्रथम आक्रमण के समय सिंध का हिन्दू राजा था।


और जब जुल्फी भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी तो जो संघर्ष सिंधियों और मुहाजिरों के बीच जुल्फी भुट्टो के वक्त प्रारम्भ हुआ था, उसकी बेटी के शासन में और प्रचंड रूप में सामने आया। उर्दूभाषी मुहाजिरों को आशंका हुई कि उनको मिटाने का काम जो पिता ने शुरू किया था, उसे बेटी पूरा करना चाहती है। इसीलिए फौजी दमन के बावजूद मुहाजिर खामोश नहीं हुये। कराची कि हर गली और कूचे में दहशत समा गई। मुहाजिरों ने हड़ताल की घोषणा की और पूरे नगर पर कब्रिस्तान की मुर्दानगी छा गयी। रस्सा-कसी आज भी चल रही है।


विभाजन के पूर्व भारत में हिन्दू और मुसलमानों के बीच विभेद करने के लिए उर्दू भाषा का इस्तेमाल किया गया। फिर पाकिस्तान में ज़ोर-जबर्दस्ती उसको बंगाल पर थोपा गया, जिसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान का विभाजन हुआ। अब सिंधी, पंजाबी और पश्तों पर हावी होकर, उर्दू पाकिस्तान के दूसरे विभाजन की भूमिका बना रही है।


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