नेहरू की राजनैतिक अदूरदर्शिता

ब्रिटिश सरकार ने ‘गोलमेज सभाओं‘ में आए भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श करने के पश्चात् सन् 1932 में ‘रैमजे मेक्डोनेल्ड अवार्ड’ घोषित किया। कंाग्रेस पर जेैसे बिजली गिर पड़ी। केवल दो वर्ष पूर्व ही अंग्रेजी शासकों की नेक-नियती पर भरोसा करके गांधी जी ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ बीच मंे ही रोक कर वायसराय इरविन से बात करने गए थे, जो ‘गांधी इर्विन पैक्ट’ के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजों पर भरोसा करके ही गांधी जी गोलमेज सभा में भाग लेने लन्दन पहंुचे थे। उनको आशा थी कि सरकार शीघ्र ही ‘ब्रिटिश ताज’ के अन्तर्गत भारत को स्वराज दे देगा। किन्तु ‘रैमजे मेक्डोनेल्ड अवार्ड’ ने गांधी जी और पूरी कांग्रेस की आशा को निराशा में बदल दिया। बात यहीं पर समाप्त हो जाती, तब भी खैरियत थी। ब्रिटिश सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर कांग्रेस की राष्ट्रीयता के दावे को एक तमाचा भी मारा। उन्होंने घोषित किया कि ‘‘दलित’’ अपने प्रतिनिधि अलग निर्वाचक मण्डल के द्वारा चुनेंगे। यह दलितों और सवर्ण हिन्दुओं के बीच खाई डालने की सोची-समझी चाल थी।


सन् 1909 में अंग्रेजों ने प्राविधानित किया था कि मुसलमान और हिन्दू अलग-अलग निर्वाचक मण्डलों द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनंेगे। इस एक अकेली व्यवस्था ने मुस्लिम संप्रदायवाद का एक ऐसा राक्षस जन्मा, जिसने आगे चल कर देश को विभाजित करके भी विश्राम नहीं लिया। तेईस वर्ष पश्चात् जब अंग्रेजों ने उसी अलग निर्वाचक मण्डल की चाल के द्वारा हिन्दुओं के बीच एक रथाई दरार डालने का प्रयत्न किया तो गांधी को इसके दूरगामी विषम प्रभावों को समझने मंे देर नहीं लगी । यह 1909 के मुसलमानों के अलग निर्वाचक मण्डल का ही परिणाम था कि सन् 1930 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन मंे सर मोहम्मद इकबाल ने भारत में एक ‘‘मुस्लिम भारत’’ की मंाग रखी थी। अगर दलितों के लिए भी अलग निर्वाचक मण्डल बना, तो दलित भी भारत को विभाजित करके अलग ‘‘दलित भारत’’ की मांग करेंगे। देश को छोटे-छोटे टुकडों में खंडित करके भारत की राष्ट्रीयता की भावना को दुर्बल करने की चाल को नाकाम करने के लिए गांधी जी ने मृत्यु-पर्यन्त उपवास का ऐलान किया। गांधी जी के इस उपाय के फलस्वरूप ही ‘पूना-समझोैता’ हुआ, और दलितों के लिए अलग ‘निर्वाचक मण्डल’ का प्राविधान निरस्त किया गया। हिन्दू समाज को एकजुट रखने में गांधी का नाम सदा आदर से लिया जाएगा। गांधी जी में अगर दूर-दृष्टि न होती तो आज दलितों औेर सवर्णो के बीच वही विभेद होता जैसा आज हिन्दुओं औेर मुसलमानों के बीच है। जब गांधी जी ने उपवास किया, तो जवाहरलाल नेहरू को गांधी जी पर एक महत्वदीन मुद्दे के लिए जीवन बलिदान करने के उनके निर्णय पर बहुत क्रोध आया। ऐसा महत्वहीन विषय-मात्र निर्वाचक मंडल का प्रश्न!


जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि में दलितांे के लिए अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था एक महत्वहीन मुद्दा था। हिन्दू समाज में जो स्थाई विभाजन कर भारतीय राष्ट्रीयता को क्षीण कर द,े नेहरु जी की दृष्टि में महत्वहीन था। इस मुद्दे के दूरगामी परिणामों को देखने और समझ पाने की उनमंे क्षमता नहीं थी। यद्यपि वह गांधी के शब्दों में उनके चयनित उत्तराधिकारी थे, किन्तु उनमंे गांधी जी की दूर-दृष्टि नहीं थी। नेहरू में दूर-दृष्टि के इस अभाव से देश को जो हानि सहन करनी पड़ी, वह भारत का दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास है।


भारत सरकार के सन् 1935 के अधिनियम के अन्तर्गत सन् 1937 में निर्वाचन हुआ। इस निर्वाचन का विशेष महत्व था, क्योकिं इसमंे सफलता प्राप्त करने वाले राजनैेतिक दल को प्रान्तीय सरकार में मंत्रिमंडल गठित करने का अवसर मिलने वाला था। अतएव कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने ही इसमें जी-जान लगा दी। कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू थे और मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना।


कंाग्रेस को आशा नहीं थी कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान उसको वोट देंगे। अतएव रफी अहमद किदवई ने जवाहरलाल नेहरू की सलाह से यह योजना बनाई कि कुछ कांग्रेसी मुसलमान, मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनाव लड़ंे। उनके मुस्लिम लीग के टिकट पर विजयी होने पर भी, अन्ततः राष्ट्रीय मुसलमान ही चुन कर विधानसमा में आएं। इसके लिए कांग्रेस ने लीग से समझौेता किया, और चौधरी खलीकुज्जमां, नवाब मोहम्मद इस्माइल तथा कुछ अन्य कांग्रेसी मुस्लिम नेताओं को मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए राजी किया।


1937 के चुनाव के बाद कंाग्रेस ग्यारह में से आठ प्रदेशों में भारी बहुमत से विजयी हुई। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को पीछे छोड़ दिया था। जब मंत्रिमंडल बनाने का प्रश्न उठा, तो मुस्लिम लीग ने मांग की कि कंाग्रेस और लीग की मिली-जुली सरकार बने। चुनाव के पूर्व कंाग्रेस और लीग के बीच जो समझौेता हुआ था, उसके संदर्भ मंे गांधी जी, पटेल, आजाद, पंत आदि लीग और कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बनाने के पक्ष में थे, किन्तु जवाहरलाल सहमत नहीं हुए। चुनाव में प्राप्त कंाग्रेस की आशातीत सफलताओं से उनका सिर घमण्ड और अहंकार से फिर गया था।


जब जिन्ना ने मांग की कि कंाग्रेस मत्रिमण्डल के पंाचो मुसलमान, मुस्लिम लीग द्वारा मनोनीत हों, तो जवाहरलाल नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया। उल्टे एक मुस्लिम लीग के विधायक को तोड़कर कांग्रेस से शामिल कर लिया। यह भारत की पहली आयाराम-गयाराम की घटना थी, जो नेहरू जी के आशीर्वाद से संपन्न हुई थी।


नेहरू ने ऐलान किया-‘‘मुस्लिम सामान्यजन तक मुस्लिम संप्रदायवाद से दूर हो रहे हैं और वह आर्थिक आधार पर सोचने लगे हैं। आज कांग्रेस सर्वोपरि है.....सामान्य मुसलमान तक उसकी (कंाग्रेस की) ओर राहत के लिए देखते हैं।’’ उनकी तत्कालीन गर्वोक्ति जो प्रायः उद्धृत की जाती है, इस प्रकार है -‘ अन्तिम विश्लेषण में भारत में आज केवल दो शक्तियां हैं - ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा भारतीय राष्ट्रवाद की प्रतिनिधि कंाग्रेस... मैं मि. जिन्ना को बताना चाहूंगा कि मैं मुसलमानों को मुस्लिम लीग के अधिकांश सदस्यों के मुकाबले में, ज्यादा जानता हूं।’ इसका उत्तर जिन्ना ने दिया-‘‘भारत मंे चार शक्तियां हैं। ब्रिटिश राज, देशी रियासतंे, हिन्दू औेर मुसलमान।’’ समय-चक्र ने नेहरु जी को नकार कर जिन्ना को सही सिद्ध किया।


केवल दस वर्षों के भीतर ही हुए देश के विभाजन ने सिद्ध कर दिया कि नेहरू जी मुस्लिम मानसिकता के बारे में कुछ नहीं जानते थे। नेहरू जी का दावा था कि ‘‘मुसलमान मुस्लिम संप्रदायवाद से दूर हो रहे हैं’’ रेत के घिरौंदे सा अलगाववाद की पहली आंधी में ही ढ़ह गया। 1946-47 में 74-75 प्रतिशत मुसलमानों ने पकिस्तान के समर्थन में अपनी आवाज उठाई। जिस मुस्लिम लीग को जवाहरलाल ने सन् 1937 में खारिज कर दिया था, उसी के आगे कांग्रेस को घुटने टेकने पड़े। अन्ततः जिन्ना का सन् 1938 का कथन ही सच निकला- ‘‘भारत से इस समय चार शक्तियां हैं -‘‘ब्रिटिश राज, देसी रियासतें, हिन्दू तथा मुसलमान।


सन् 1937 तथा 1938 की ये घटनाएं भी केवल एक दिशा में संकेत करती हैं - जवाहरलाल नेहरू में दूर-दृष्टि का सर्वथा अभाव था। वह केवल आज को देखते थे, आने वाले कल को देखने और समझने की उनमें क्षमता नहीं थी।


सन् 1946 मंे अंग्रेजों ने घोषित कर दिया कि वह हिन्दुस्तान को आजाद कर देंगे। आजादी देने के पहले हिन्दुस्तानियांे को आजाद देश की सरकार चलाने के लिए तैयार करने की दिशा में ‘‘कैेबिनेट मिशन योजना’’ के अन्तर्गत अन्तरिम सरकार गठित करने की घोषणा की। कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार में भाग लेने की अपनी सहमति दे दी, किन्तु लीग ने इसके बहिष्कार का एलान किया। अतएव वायसराय लार्ड वैेवल ने कंाग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस की अंतरिम सरकार में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। तद्नुसार जवाहर लाल नेहरू ने अन्तरिम सरकार में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल गठित किया तथा स्वयम् उपाध्यक्ष (प्रधानमंत्री के समकक्ष) का पद-2 सितम्बंर 1946 को ग्रहण किया । अब जिन्ना को लगा कि ‘अन्तरिम सरकार’ का बहिष्कार करके उसने गलती की है। सत्ता से बाहर अलग-थलग पड़े रहने का अर्थ होगा- कंाग्रेस की मजबूती और मुस्लिम लीग का बिखराव। इसलिए जिन्ना ने वायसराय के पास सर सुल्तान अहमद और नवाब छतारी के माध्यम से अन्तरिम सरकार में मुस्लिम लीग के भी शामिल किए जाने के लिए संदेश भेजे। उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल हो जाएगी, अगर वायसराय जिन्ना को बुलाकर स्वयम् बात करते हैं। किन्तु इसमें कठिनाई थी।


संविधान के अन्तर्गत मंत्रिमण्डल का विस्तार या उसमें किसी दूसरी पार्टी का समावेश अन्तरिम सरकार के उपाध्यक्ष की सहमति के बिना नहीं हो सकता था। अतएव वायसराय ने नेहरू जी से जिन्ना से वार्ता की सहमति मांगी। नेहरू जी ने उत्तर दिया -‘‘अगर आप मिलना चाहते हैं तो मैं कैसे मना कर सकता हूं।’’ नेहरू जी के इस घुमावदार जवाब में उनकी अप्रत्यक्ष अस्वीकृति थी, किंतु वायसराय ने इसे उनकी पूर्ण स्वीकृति मानते हुए ‘‘अन्तरिम सस्कार’’ में मुस्लिम लीग को शामिल कर लिया। अगर नेहरू जी ने राजनैेतिक विवेक का परिचय दिया होता, तो वह स्पष्ट शब्दों में मुस्लिम लीग के ‘‘अन्तरिम सरकार’’ में शामिल करने के वायसराय के प्रस्ताव को अस्वीकार देते। इससे मुस्लिम लीग सत्ता से अलग-थलग होकर क्षीण हो सकती थी, और देश का विभाजन न होता। नेहरू जी की दूरदृष्टि के अभाव की भारी कीमत देश को विभाजन और लगभग बीस लाख लोगों की हत्याओं और मृत्यु के रूप में चुकानी पड़ी।


‘कैेबिनेट मिशन योजना’’ के अन्तर्गत यह शर्त थी कि केवल वह राजनैतिक दल अन्तरिम सरकार में शामिल होंगे, जो आजाद भारत के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा मंे भी भागीदारी करेंगे। मुस्लिम लीग की मांग थी कि पाकिस्तान और भारत के संविघानों के लिए दो अलग-अलग संविधान सभाएं गठित हों। किन्तु कैेबिनेट मिशन के प्रस्ताव में एक ही संविधान सभा के गठन का प्राविधान था, इसीलिए मुस्लिम लीग ने अन्तरिम सरकार में भागीदारी से इन्कार कर दिया था। और अब उसने अन्तरिम सरकार में शामिल होना चाहा तो यह अपेक्षित था कि वह संविधान सभा में भी शामिल होगा। सरदार पटेल ने जब इस संबध में आपत्ति उठाते हुए नेहरू जी से पूछा कि क्या मुस्लिम लीग अन्तरिम सरकार के साथ संविधान सभा में भी शामिल होगी तो नेहरू जी ने बताया कि वायसराय वैवल ने बताया कि जिन्ना ने बाद में संविधान सभा मंे शामिल होने का आश्वासन दिया है। सरदार पटेल ने मुस्लिम लीग द्वारा लिखित प्रतिबद्धता मांगी कि जिससे जिन्ना बाद से कोई चालाकी न दिखा सकें। नेहरू जी ने कहा कि वायसराय ने आश्वासन दिया है कि ‘सब ठीक होगा’ और वे इससे आश्वस्त हैं। नेहरू जी ने वायसराय और लीग पर विश्वास कर लिया, किन्तु जल्दी ही उनको अपनी भूल का एहसास हुआ।


अंतरिम सरकार में शामिल होने के कुछ दिनों बाद ही मुस्लिम लीग ने संविधान सभा में शामिल होनेे से इंकार करते हुए पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा गठित करने की अपनी मांग को दोहराया। नेहरू जी ने अनुभव किया होगा कि मुस्लिम लीग पर विश्वास करके उन्होंने गलती की। उनकी इस गलती ने देश को विभाजन की दिशा में निश्चित रूप से ढकेल दिया। यदि नेहरू जी में राजनैतिक विवेक और दूर-दृष्टि होती, तो वह मुस्लिम लीग के असली इरादों को भंापने में गलती न करते।


नेहरू जी में राजनेैतिक विवेक, अपने शत्रुओं के प्रच्छन्न इरादों को भंपने की क्षमता, मुद्दों को परिप्रेक्ष्य में देखने की दृष्टि और दूरगामी परिणामों को विश्लेषित करने की योग्यता का सर्वथा अभाव था। इसीलिए आजादी के पूर्व मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की कूटनीति से बराबर पराजित होते रहे। और आजादी के बाद शेख अब्दुल्ला और चीन के नेेताओं के भुलावे में आकर उनके द्वारा विश्वासघात के शिकार हुए। अगर पटेल की जगह नेहरू भारत के गृह मंत्री होते तो कश्मीर की तरह भारत की अन्य पांच सौे चौसठ देशी रियासतें भी कश्मीर के समान ही देश के लिए नासूर होतीं। अपनी मृत्यु के केवल पांच हफ्ते पहले सरदार पटेल ने अपने 7 नवम्बर, 1950 के नेहरू को लिखे पत्र के द्वारा भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन चीन धोखा देगा, और नेहरू की ‘‘हिन्दी-चीनी: भाई-भाई’’ की नीति के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की थी। चीन की जिस बदनियती को सरदार पटेल ने 1950 में ही समझ लिया था, उसे नेहरू जी को समझने में बारह साल लगे, जब 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। नेहरू ने प्रताप सिंह कैरांे, धर्म तेजा, कृष्ण मैनन, (जीप घोटाला) टी.टी कृष्णमचारी, कृष्णा देव मालवीय आदि के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालकर सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को पलने और बढ़ने की भूमिका का निमार्ण किया, जिसने आज पूरे देश को ही निगल लिया है। प्रजातांत्रिक रूप से निर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष पुरुषोत्तम दास टंडन को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने के षड़यंत्र तथा कालान्तर में अपनी पुत्री इन्दिरा गांधी को काँग्रेस अध्यक्ष बनवाने की तिकड़मों में शामिल होकर जवाहरलाल नेहरू ने देश में प्रजातंत्र की जड़ों को काटा था।


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