देवनागरी लिपि: सर्वश्रेष्ठ होने का दावा

इस देश की सर्वाधिक प्रचलित और लोकमान्य भाषा हिंदी जिस लिपि में लिखी जाती है वह है देवनागरी लिपि। संसार की भाषाआंे के समकक्ष हम जब इस लिपि को रखते-परखते हैं, तो यह पाते हैं कि अपनी भाषाई क्षमता के कारण यह संसार की श्रेष्ठतम लिपि है। 56 व्यंजन और 12 स्वरों वाली इस समृद्ध लिपि में दुनिया की किसी भी भाषा को, उसके स्वरानुकूल लिखने की क्षमता है। इस श्रेष्ठता के प्रमाण में भावुक नहीं, ठोस साक्ष्य प्रस्तुत हैं इस लेख में।


सबको अपनी बोली, अपनी धरती की मिट्टी और अपना आकाश सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है। यदि हिंदीभाषी लोगों को भी अपनी लिपि देवनागरी संसार की सभी भाषाओं की लिपियों से सर्वश्रेष्ठ लगे तो आश्चर्य क्या? किंतु सच भी यही है कि देवनागरी वास्तव में संसार की सभी भाषाओं की लिपियों से श्रेष्ठ है। यह कथन भावना या भावुकता से प्रेरित नहीं है बल्कि प्रामाणिक और विज्ञान-परीक्षित है।


जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तो मुझे सबसे कठिन अंग्रेजी की वर्तनी लगती थी। रट-रटकर अंग्रेजी शब्दों की वर्तनी याद करनी पड़ती थी, क्योंकि अंग्रेजी वर्तनी किसी सिद्धांत पर आधारित नहीं है। अंग्रेजी में पी०यू०टी० - ‘पुट’ होता है, तो बी०यू०टी० - ‘बुट’ क्यों नहीं होता ? ‘बट’ क्यों होता है ? इस प्रश्न का उत्तर आज तक मुझे कोई नहीं दे सका। अंग्रेजी-प्राध्यापक तक नहीं।


प्राथमिक कक्षाओं में ही पढ़ाया जाता है कि अक्षर दो प्रकार के होते हैं-स्वर तथा व्यंजन। व्यंजन को अंग्रेजी में ‘कोन्ज़ोनन्ट’ कहते हैं तथा ‘स्वर’ को ‘वोवॅल’। क-ख-ग से क्ष-ञ-ज्ञ तक के अक्षर व्यंजन कहलाते हैं तथा अ-आ, से अं-अः तक स्वर। स्वर ही व्यंजनों में मात्रा के रूप में लगाए जाते हैं, जिससे अक्षरों को विभिन्न ध्वनियों में प्रकट किया जा सकता है। हिंदी में 56 व्यंजन हैं और 12 स्वर। इसके समक्ष अंग्रेजी में केवल 21 व्यंजन (कोन्ज़ोनन्ट) और 5 स्वर (वोवॅल) हैं। कदाचित इसी कारण रोमन लिपि में उन अधिकांश ध्वनियों को नहीं लिखा जा सकता जिन्हें देवनागरी लिपि में व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए हिंदी व्यंजन ‘त’ रोमन लिपि के माध्यम से नहीं लिखा जा सकता। ‘सतीश’ नाम रोमन लिपि में सदैव ‘सटीश’ ही लिखा जाएगा। रोमन लिपि में ‘त’ व्यंजन को व्यक्त करने के लिए कोई अक्षर नहीं है। रोमन लिपि का ‘टी’ अक्षर देवनागरी के ‘त’ अक्षर के निकटतम है, अतएव अंग्रेजी भाषी ‘त’ के स्थान पर ‘ट’ उच्चारित करके काम चला लेते हैं। अंग्रेजी बोलनेवालों के लिए ‘तारा’ हमेशा ‘टारा’ रहेगी और ‘दिव्या’ हमेशा ‘डिव्या’ रहेगी। इसी तरह ‘खेत’ हमेशा ‘केट’ रहेंगे और ‘घर’ हमेशा ‘गर’ रहेंगे। रोमन लिपि की तुलना में देवनागरी बहुत समृद्ध है। शायद ही कोई अंग्रेजी शब्द हो, जो देवनागरी में न लिखा जा सके। इसीलिए हिंदीभाषी लोगों को अंग्रेजी शब्दों के उच्चारण में कोई कठिनाई नहीं होती।


व्यंजनों की तरह देवनागरी स्वरों में भी संपन्न है। बारहखड़ी (अ-आ से अं-अः) के माध्यम से जो ध्वनियां व्यक्त होती हैं। उनको रोमन लिपि केवल पांच स्वरों (ए, ई, आई, ओ, यू) के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयत्न करती है, अतएव बहुत सफल नहीं होती। रोमन लिपि में एक-एक स्वर से कभी दो या कभी तीन-चार तक ध्वनियां इंगित होती हैं, और कमी-कभी एक ही ध्वनि दो या तीन स्वरों से भी अलग- अलग व्यक्त होती है। इसके फलस्वरूप विभिन्न स्वरों के उच्चारण में अराजकता और नियमहीनता की स्थिति बन जाती है। इसी कारण अंग्रेजी सीखनेवाले विदेशियों को दस-पंद्रह वर्षों के बाद भी अपने अंग्रेजी उच्चारण पर आत्मविश्वास नहीं हो पाता।


रोमन लिपि के पहले अक्षर और स्वर ‘ए’ का कोई एक निश्चित उच्चारण नहीं है। अंग्रेजी के विभिन्न शब्दों में, इस स्वर के अलग-अलग उच्चारण हैं; जैसे ‘ऐड’ (जोड़ना) में ‘ऐ’, ‘चार्म’ (आकर्षण) में ‘आ’, ‘अबव’ (ऊपर) में ‘अ’ तथा ‘केयर’ (फिक्र) में ‘एय’। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि रोमन लिपि का अक्षर ‘ए’, की चार प्रकार की ध्वनियों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। किंतु किस शब्द में, किस परिस्थिति में, अंग्रेजी अक्षर ‘ए’ की किस ध्वनि का प्रयोग होगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। बस जैसा उल्टा-सीधा पहले से चला आ रहा है, वैसा का वैसा ही प्रयोग होता है। उच्चारण के नियम के अभाव के कारण ही अंग्रेजी अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से बोली जाती है।


‘अबव’ अंग्रेजी शब्द में ‘ए’ का प्रयोग हिंदी के ‘अ’ स्वर के रूप में किया गया है। इसी तरह अंग्रेजी शब्द ‘फोकस’ में भी ‘यू’ स्वर का प्रयोग हिदी के ‘अ’ स्वर के रूप में किया क्या है। हिंदी के ‘अ’ स्वर की ध्वनि के लिए अंग्रेजी शब्दों में कहां ‘ए’ शब्द का प्रयोग किया जाएगा, और कहां ‘यू’ का, इसका कोई नियम नहीं है। इसलिए अंग्रेजी के विद्यार्थियों को हर शब्द की अलग-अलग वर्तनी रटनी पड़ती है और किसी बच्चे की जिज्ञासा का उत्तर नहीं दिया जाता। उससे बस कहा जाता है-रटो-‘पी-यू-टी-पुट’, ‘बी-यू-टी-बट’।


देवनागरी लिपि में स्वरों और व्यंज़नों के नियोजन में व्यवस्था है। एक स्वर का प्रयोग, केवल एक ही निश्चित ध्वनि की अभिव्यक्ति के लिए होता है। देवनागरी लिपि में ‘अ’ स्वर का प्रयोग ‘ऊ’ या ‘ऐ’ की ध्वनि प्रकट करने के लिए कभी नहीं किया जा सकता। लिपि की वैज्ञानिकता अक्षरों के वर्गीकरण से ही प्रकट होती है। अक्षरों के उच्चारण में ध्वनि, मुख के किस भाग विशेष जैसे-कंठ, दंात, हांेठ, तालू आदि के प्रयोग से उत्पन्न होती है, इसका विचार करके ही व्यंजन वर्गीकरण की रचना की गई हैः

कंठ ध्वनि-कवर्गः क, ख, ग, घ, ङ

तालव्य ध्वनि-चवर्गः च छ ज झ ञ

मूर्धन्य ध्वनि-टवर्गः ट ठ ड ढ ण

दंत ध्वनि-तवर्गः त थ द ध न

ओष्ट ध्वनि-पवर्गः प फ ब भ म


उपरोक्त पांचो वर्गों में अंतिम व्यंजनों (ङ, ञ, ण, न तथा म) में नासिका ध्वनि (नेज़ल साउण्ड) है। प्रत्येक वर्ग में पहले और तीसरे व्यंजन के उच्चारण में सांस का उपयोग नहीं होता, जबकि दूसरे तथा चौथे व्यंजन के उच्चारण में सांस बाहर निकलती है। उदाहरण के लिए ‘क’ तथा ‘ग’ अक्षरों के उच्चारण करते समय सांस अपनी जगह, जैसी है वैसी ही, रुकी रहती है। ‘ख’ और ‘घ’ अक्षरों के उच्चारण के समय सांस का हल्का-सा झोंका बाहर निकलता है।


देवनागरी लिपि की एक विशेषता उसका लचीलापन है। विदेशी भाषाओं के नवीन शब्दों को, जिनके उच्चारण को परंपरागत रूप से देवनागरी में व्यक्त करने की क्षमता नहीं है, उनको भी सामान्य परिवर्तन के बाद, देवनागरी लिपि में व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ख’ तथा ‘ग’ अक्षरों के नीचे बिंदी लगाकर, उर्दू के अनेक शब्दों के उच्चारण को वैसा का वैसा ही व्यक्त करने की क्षमता देवनागरी लिपि ने प्राप्त कर ली है। अब आसानी से उर्दू के शब्द क़लम, क़ातिल, खु़़दा, ख़ंजर, ग़रीब, ग़ैर आदि हिंदी में लिखे जा सकते हैं।


जब अधिकांश मानवता सभ्यता के स्पर्श से अछूती थी, तब देवनागरी के अक्षरों (स्वर तथा व्यंजन) का संस्कार आज से ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व भारतीय भाषाशास्त्री पाणिनि ने किया था। पाणिनि ने न केवल यह अध्ययन किया कि अलग-अलग अक्षरों के उच्चारण में मुख के किस भाग - कंठ, ओंठ, तालू, दांत का विशेष उपयोग होता है, उसने यह भी अध्ययन किया कि इन अक्षरों के उच्चारण में संास की क्या गति होती है। पिछले तीन हजार वर्षों के विश्व इतिहास में पाणिनी सर्वथा मौलिक, अग्रगामी और अद्वितीय भाषाशास्त्री हैं। इस भारतीय प्रतिभा के लिए सिर अनायास आदर से झुक जाता है।


रोमन लिपि में ‘‘द’’ ध्वनि इंगित करने के व्यंजन नहीं है, अतएव अंग्रेजी शब्द ‘गैदर’ में ‘द’ की ध्वनि के लिए, ‘टी’ एवं ‘ऐच’ अक्षरों को जोड़कर काम निकाला जाता है। इसी प्रकार रोमन लिपि में ‘थ’ ध्वनि के लिए भी कोई व्यंजन नहीं है, अतएव ‘थिन’ शब्द में भी ‘थ’ की ध्वनि के लिए भी ‘टी’ तथा ‘एच’ अक्षरों को जोड़कर काम निकाला जाता है। रोमन लिपि की तरह उर्दू में भी पर्याप्त व्यंजनों के अभाव में खींच-तानकर काम निकाला जाता है। उदाहरण के लिए उर्दू में हिंदी का शब्द ‘प्रकाश’ नहीं लिखा जा सकता। उर्दू में ‘प्रकाश’ लिखना हो तो वह ‘परकाश’ ही लिखा जाएगा रोमन लिपि के समान अरबी-फ़ारसी लिपि में ख,घ,ध आदि अक्षर नहीं हैं। उर्दू में अगर ‘खटाई’ लिखना हो, तो वह ‘कहटाई’ लिखा जाएगा। पढ़ते समय ‘कह’ को सन्दर्भ के अनुसार ‘ख’ पढ़ा जाएगा। इसी तरह ‘ध’ लिखने के लिए उर्दू में ‘दह’ लिखेंगे, और ‘घ’ के लिए ‘गह’ लिखेंगे। ‘धनवान’ उर्दू में लिखने पर ‘दहनवान’ हो जाता है और ‘घर’ ‘गहर’। रोमन लिपि के सामान उर्दू में अरबी-फारसी अक्षरों का वर्गीकरण भी नहीं है। आलिफ़-बे से हे-ये तक अक्षर बिना किसी सुघड़ व्यवस्था या नियम के अरबी-फ़ारसी लिपि की वर्णमाला में बेतरतीब जमां किए गए हैं।


हिंदी को देवनागरी लिपि संस्कृत की देन है। हिंदी ने देवनागरी लिपि संस्कृत से विरासत में पाई है। देश की अन्य भाषाओं की लिपियंा भी संस्कृत से प्रभावित हैं। गुजराती, और मराठी भाषाएं तो देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती हैं। किंतु तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बांग्ला, गुरुमुखी आदि भाषाओं की लिपियां यद्यपि देवनागरी से प्रभावित हैं, किन्तु उसमें देवनागरी जैसी पूर्णता नहीं है। देवनागरी अक्षरों के समान न तो उनका वैज्ञानिक वर्गीकरण है, और न ही उनमें ध्वनि व्यक्त करने की देवनागरी के समान विशद क्षमता। उदाहरण के लिए तमिल लिपि में कवर्ग में केवल ‘क’ तथा ‘ङ’ व्यंजन हैं, ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ नहीं हैं। अतएव तमिल लिपि में खर, गर, घर शब्द नहीं लिखे जा सकते। अगर लिखना ही हुआ तो तीनो शब्दों के लिए ‘कर’ लिखा जाएगा। चवर्ग में तमिल में केवल ‘च’ और ‘ञ’ है। ‘छ, ‘ज, तथा ‘झ’ नहीं है। टवर्ग में केवल ‘ट’ तथा ‘ण’ स्वर हैं। ‘ठ’, ‘ड’ तथा ‘ढ’ अक्षरों के समकक्ष अक्षर नहीं हैं। तवर्ग में केवल ‘त’ तथा ‘न’ अक्षर हैं। थ, द तथा ध के समकक्ष अक्षर नहीं हैं।


सीमित व्यंजनों के कारण विभिन्न ध्वनियों को प्रामाणिक रूप से व्यक्त करने की क्षमता तमिल की भी सीमित है। ‘‘बाटा’’ की जूते की दुकान अपनें बोर्ड पर तमिल में ‘‘पाटा’’ लिखती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि तमिल में ‘ब’ अक्षर नहीं है, अतएव मजबूरन जहां कहीं भी ‘बाटा’ लिखना हो, ‘पाटा’ ही लिखा जाएगा।


इसी प्रकार बांग्ला, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं की ध्वनियों को लिखने की क्षमता सीमित है। भारत में प्रचलित लिपियों में केवल देवनागरी ही एक ऐसी लिपि है, जो भारत की सभी भाषाओं को सफलतापूर्वक और प्रामाणिकता के साथ लिखने में सक्षम है। कदाचित देवनागिरी की इसी क्षमता के कारण सन् 1961 में मुख्यमंत्रियों की सभा में भारत की सभी भाषाओं के लिए देवनागरी प्रयोग करने का प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने दिया था। उनको आशा थी कि जिस तरह यूरोप की सभी भाषाओं के लिए रोमन लिपि प्रयोग होती है, उसी तरह अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लेंगी, तो राष्ट्रीय एकता संपुष्ट होगी। सभी मुख्यमंत्रियों ने एकमत से स्वीकार करते हुए प्रस्ताव पास किया। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने भी इसे अन्य मुख्यमंत्रियों के साथ एकमत से स्वीकार किया गया था। केरल के मुख्यमंत्री श्री पोट्टम तनुपिल्लई ने भी राष्ट्रपति के इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया था। किंतु दुर्भाग्य से तत्कालीन भारत के शिक्षा मंत्री हुमायूँ कबीर और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे। अतएव यह प्रस्ताव कार्यान्वित नहीं किया गया। और देश की एकता और भाषाई सौमनस्य का एक सुनहरा अवसर खो दिया गया।


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