एक नाटकीय अनुभव

मैं उस समय लगभग तेरह-चौदह वर्ष का था और फैज़ाबाद (वर्तमान अयोध्या) के रिषीटोला मोहल्ले के अपने पुरखों के बनाये घर में रहता था। वहाँ मेरे घर के सामने एक मन्दिर है - रामजानकी मन्दिर। वहाँ रामलीला के ‘सरूपों’ का ‘सिंगार’ होता था। किशोर जिज्ञासा से प्रेरित, मैं प्रायः प्रतिदिन ही वहाँ पहुंच जाता था। वहाँ सामान्य से लड़को और आदमियों को कपड़े बदल कर, ‘सिंगार’ (मेक-अप) द्वारा सहज ही देवता, दानव, बन्दर, लंगूर, भालू और राक्षस में परिवर्तित होते देखता था। वहां की गहमा-गहमी, रौनक़, उत्साह और व्यस्तता मुझे बहुत आकर्षित करती थी। वहां मैं रोज ही जाता था। घंटो उस नाटकीय माहौल का आनन्द लेता था।


और एक दिन एक व्यक्ति मेरे पास आया। वह चूड़ीदार पाज़ामा और बनियान पहने था। उस हाथ में दो कुल्हड़ और एक कपड़ा था। उसने मेरे हाथ में कपड़ा देकर, दोनों उल्टे कुल्हड़ अपने सीने पर लगाए, और मुझसे कहा कि इस पर कपड़ा बांधो। उसके कहने के अनुसार, मैंने उन कुल्हड़ों को उसके सीने पर कपड़ों से बांधकर, पीठ पर गांठ लगाई। उसने कुल्हड़ों को हिला कर देखा कि वे ठीक से बँधे हैं या नहीं। फिर उसने ब्लाउज़ पहना। चूड़ीदार के उपर लहंगा पहना। हाथों में चूड़ियाँ और गले में मालाएँ पहनी। सर पर बालों का ‘‘विग’’ लगाया। ‘‘सिंगार’’ करने वाले उस्ताद ने उसके चेहरे पर एक सफे़द लेप लगाया, जिसे ‘‘मुर्दासंख’’ कहते थे। फिर उसनें गालों पर लाली लगाई, काजल और बिन्दी लगाई। मेरे देखते ही देखते एक आदमी, औरत बन कर सूर्पनखा बन गया। मेरे लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।


और उस दिन शाम को रामलीला में वह अदाऐं मारता, कुल्हे मटकाता और कुल्हड़ हिलाता घूम रहा था। मेरी निगाहें उन कुल्हड़ों पर से नहीं हट रही थी। उस दिन, पहली बार यौवन की पहली आहट अनुभव की।


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