इंग्लैण्ड में अंग्रेजी की संघर्ष गाथा

सन् 1362 में फ्रांसीसी मूल के इंग्लैण्ड के राजा एड्वर्ड तृतीय ने, वहां की संसद को, पूर्व परिपाटी के विरूद्ध, फ्रांसीसी भाषा के स्थान पर राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में सम्बोधित किया था। 15 अगस्त 1947 को, स्वतंत्रता की बेला में, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय संसद को राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के स्थान पर, विदेशी भाषा अंग्रेजी में सम्बोधित किया था।

आज हमारे देश में अंग्रेजी का बोल-बाला है। अंग्रेजी का ऐसा रुतबा है कि उसके सामने सभी भारतीय भाषाऐं पानी भर रहीं हैं। हिन्दी को अपना अस्तित्व बनाए रखना भारी हो रहा है। किन्तु एक समय ऐसा भी था, जब अंग्रेजी को स्वयं अपने देश इंग्लैण्ड में पैर जमाऐ रखना मुश्किल हो रहा था। अगर तब उसने संघर्ष न किया होता तो संसार से अंग्रेजी नाम की भाषा का नामों-निशां मिट जाता। इंग्लैण्ड में अंग्रेजी के स्थान पर फ्रांसीसी बोली जाती, और दो सौ साल की अंग्रेजों की गुलामी के बाद, भारत में उच्च और शिक्षित वर्ग उसी गर्व और अभिमान से फ्रांसीसी बोलता, जैसे आज अंग्रेजी बोलता है।


ईसा पूर्व 55 में इंग्लैण्ड पर रोमन सम्राट जूलियस सीज़र ने आक्रमण किया था। उस समय वहां ‘‘केल्ट’’ जाति के लोग रहते थे। केल्ट जाति इंडो-यूरोपियन (आर्य) जाति की एक शाखा थी। ईसा के पश्चात् जब चौथी और पांचवी शताब्दी में इंग्लैण्ड से रोमन आधिपत्य समाप्त हुआ तो जर्मनी की ट्यूटोनिक जातियों ने इंग्लैण्ड पर हमला किया। ये आक्रमण तीन प्रमुख लहरो में हुए - पहला जूट्स नामक उपजाति द्वारा सन् 499 में, दूसरा सैक्सन नामक उपजाति द्वारा सन् 577 में तथा तीसरा एंगल्स उपजाति द्वारा 613 में। इन लोगों ने धीरे-धीरे पूरे इंग्लैण्ड पर कब्जा कर लिया। वहां पर पहले से रह रहे केल्ट लोगों को उन्होंने मार डाला। जो बच सके, उन्होेने भाग कर वेल्स के पहाड़ों में और स्कॉटलैण्ड के पठारों में शरण ली, जहां स्थानीय लागों में घुल-मिल कर उनकी पहचान समाप्त हो गई। वर्तमान अंग्रेज़ अपने को इन जर्मन जातियों की सन्तान मान कर, अपने आपको ‘एंग्लो-सैक्सन’ कहते हैं। इन्हीं के नाम पर वे अपने को और अपनी भाषा को ‘इंगलिश’ कहने लगे।


इंग्लैण्ड पर एक अन्य महत्वपूर्ण आक्रमण सन् 1066 में ‘नॉरमन’ जाति के लोगों के द्वारा हुआ। ये मूलरूप से फ्रांस के ‘नारमेंडी’ प्रदेश के थे, अतएव इन लोगों ने फ्रांसीसी भाषा को ही इंग्लैण्ड में राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। पराजित लोगों की भाषा अंग्रेज़ी उपेक्षित होकर निम्नवर्ग तक सीमित हो गई। उच्च समाज में उसका कोई स्थान नही रह गया। सरकार और उच्च वर्ग की भाषा, पठन-पाठन की भाषा, साहित्य रचना की भाषा, अदालतों की भाषा - प्रायः सभी क्षेत्रों में फ्रांसीसी स्थापित हो गई। वह सभ्यता की पर्यायवाची भी बन गई, ठीक उसी प्रकार, जैसे भारत में आज अंग्रेजी है।

जिस प्रकार हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, ठीक उसी प्रकार अंग्रेजी को भी फ्रांसीसी भाषा के विरूद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ी। यह लड़ाई लगभग तीन सौ वर्षाें तक चली। इस अवधि में यद्यपि सरकार से अंग्रेजी को कोई संरक्षण नही था, तब भी अंग्रेजों ने अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में अंग्रेजी को जीवित रखा तथा अंग्रेजी में थोड़ी बहुत साहित्य रचना भी हुई।

चौदहवीं शताब्दी में इतिहास ने एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया। इंग्लैण्ड के नॉरमन राजा एडवर्ड तृतीय तथा फ्रांस के राजा फ़िलिप्स षष्ठम् में ठन गई। एडवर्ड तृतीय ने दावा किया कि वह फ्रांस के सिंहासन का हक़दार है, क्योंकि वह फ्रांस के पूर्व स्वर्गवासी राजा चार्ल्स चतुर्थ की पत्नी की बहन का पुत्र है। फिलिप्स ने इंग्लैण्ड को फ्रांस के उन प्रदेशों से उखाड़ फेंकना चाहा जिन पर उसका कब्जा पहले से चला आ रहा था। परिणामतः सन् 1338 में अंग्रेज-फ्रांसीसी युद्ध छिड़ गया। इसे सौ वर्षीय युद्ध भी कहते हैं क्योंकि यह, रुक रुक कर सन् 1453 तक चलता रहा। इस युद्ध के माध्यम से, इंग्लैण्ड में फ्रांस के विरूद्ध जो भावना उदय हुई, उससे अंग्रेजी-राष्ट्रीयता संपुष्ट हुई।

नॉरमन राजा एडवर्ड तृतीय में फ्रांसीसी रक्त प्रहावित था। वह अंग्रेजांे की अपेक्षा फ्रांसीसी भाषा का ही पक्षधर था। किन्तु जब फ्रांस से युद्ध हुआ, तब उसके पास अंग्रेजी राष्ट्रीयता से जुड़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था। स्वयं को फ्रांसीसी भाषा का हिमायती कह कर वह सामान्य अंग्रेज को फ्रांस के विरूद्ध युद्ध करने के लिए प्रेरित नही कर सकता था। अंग्रेज बन कर ही वह अंग्रेजो को अपने साथ ले कर चल सकता था। अतएव उसने स्वयं को अंग्रेजी राष्ट्रधारा में समर्पित कर दिया। अंग्रेजी राष्ट्रीयता के पर्यायवाची के रूप में अंग्रेजी भाषा के प्रतिष्ठा स्वाभाविक है। अतएव सन् 1362 में एडवर्ड तृतीय ने संसद को पहले से फ्रांसीसी भाषा में संबोधित करने की चली आ रही परिपाटी के स्थान पर, अंग्रेजी में संबोधित किया। साथ ही अदालतों में भी फ्रांसीसी के स्थान पर अंग्रेजी भाषा के प्रयोग का आदेश दिया। यह एक क्रांतिकारी कदम था। इसने इंग्लैण्ड की आने वाली शताब्दियों का स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया। राष्ट्रीय भाषा के विकास के साथ अंग्रेजों में राष्ट्रीयता बोधन और चरित्र का ऐसा विकास हुआ कि उसने विश्व के इतिहास को प्रभावित किया।

इसी राष्ट्रीयता बोध के परिणाम के स्वरूप सन् 1375 में वाइक्लिफ़ नामक एक विद्वान ने बाइबिल का अनुवाद यूनानी से अंग्रेजी में किया। अंग्रेजी साहित्य की प्रथम महत्वपूर्ण रचना ‘कंटरबरीज़ टेल्स’ का इस काल में अविर्भाव इस तथ्य को रेखांकित करता है कि नव-जाग्रत राष्ट्रबोध और आत्मविश्वास की ही अभिव्यक्ति इस कृति के माध्यम से हुई, जिसमें एक अतिसंपन्न साहित्य-परंपरा की आधारशिला रखी।

जो स्थिति चौदहवीं शताब्दी मे इंग्लैंड मे अंग्रेजी भाषा की थी, वही स्थिति आज भारत मंे भारतीय भाषाओं की है। आज भारत मे अंग्रेजी उच्चवर्ग की भाषा होने की गरिमा से मण्डित है। चाहे राजनेता हो या नौकरशाह, बड़े उद्योगपति हों या बड़े कलाकार सब ही की अभिव्यक्ति का एकमात्र सम्मानित माध्यम अंग्रेज़ी है। सच तो यह है कि अंग्रेजी भाषा सभी क्षेत्रों में बड़प्पन नापने का पैमाना बन गई है। और बिना अंग्रेजी जाने कोई राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, न्यायपालिका, आदि में बड़ा पद नहीं प्राप्त कर सकता है। कोई बड़ा सेल्समैन, बड़ा मैकेनिक, बड़ा चर्मकार या बड़ा काष्ठकार आदि भी नहीं बन सकता है। अंग्र्रेजी के इस एकछत्र शासन के अन्तर्गत भारतीय भाषाएं जीवित रहने के सतत संघर्ष में पराजित हो रहीं हैं। इसमें हिन्दी की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है। अन्य भारतीय भाषाएं प्रायः एक प्रदेशीय भाषाएं हैं। अल्पमत भाषाएं होने के कारण इनके बोलने वालो में इनके प्रति एक भावुक लगाव है, क्योंकि ये उनकी पहचान बनाती हैं। किन्तु हिन्दी के संदर्भ में ऐसा कुछ नही है। वह किसी विशेष प्रदेश की भाषा नही है। वह किन्ही लोगों की अलग पहचान नही बनाती। अतएव वह सबकी होकर किसी की भी भाषा नही है। इसलिए हिन्दी को उखाड़ना सबसे आसान है। हिन्दी राष्ट्रभाषा के गौरवमय पद से हटायी जा चुकी है। राजभाषा भी वह केवल नाम के लिए है। अब उसके स्वरूप को भ्रष्ट करने का प्रयत्न किया जा रहा है। टी.वी. चैनलों द्वारा हिन्दी समाचारों से एक प्रदूषित दोग़ली भाषा ‘हिंगलिश’ (हिन्दी और इंगलिश भाषाओं का वर्ण-संकर) उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जा रहा है। यह सब इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि आज़ादी के बाद भारत में राष्ट्रीय-भावना को नकारा गया है।

सन् 1362 में फ्रांसीसी मूल के इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड तृतीय ने वहां की संसद को, पूर्व परिपाटी के विरूद्ध फ्रांसीसी भाषा के स्थान पर राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में संबोधित किया था। इस परिप्रेक्ष्य में यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि 15 अगस्त 1947 को, स्वतंत्रता की बेला में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय भाषा हिन्दी के स्थान पर विदेशी भाषा अंग्रेज़ी में संबोधित करने का निर्णय लिया। भारत मे अंग्रेज़ी और हिन्दी भाषाओं के तुलनात्मक विकास के विश्लेषण में यह तथ्य आधारभूत महत्व का है। जब भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भारतीय संसद को भारतीय भाषाओं में संबोधित करते हुए, अपनी भाषा के प्रयोग में गर्व अनुभव करेंगे, तब देश में राष्ट्रीय आत्म-विश्वास जागेगा। तब भारतीय भी अंग्रेजों के समान विश्वपटल पर अपनी ग़रिमामय पहचान बनायेंगे।

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