आयाराम-गयाराम के जनक: नेहरू

प्रायः यह समझा जाता है कि भारतीय प्रजातन्त्र में आयाराम-गयाराम का जन्म हरियाणा में हुआ। किन्तु इतिहास कुछ और ही कहता है।


भारत में सबसे पहले इस कलुषित प्रथा का उद्भव उत्तर प्रदेश में हुआ और इसके जन्मदाता कोई और नहीं, स्वयं भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे।

सन् 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के अंतर्गत सन् 1937 में प्रांतीय स्वायत्तता के लिए निर्वाचन हुआ। उस समय जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे; उनके पिता के मुंशी रफ़ी अहमद किदवई उनके विशेष सहायक थे। नेहरू जी और रफ़ी अहमद किदवई को विश्वास नहीं था कि मुसलमान कांग्रेस के प्रत्याशियों को वोट देंगे। अतएव दोनों ने यह योजना बनाई कि कांग्रेस के कुछ मुस्लिम सदस्य अस्थायी रूप से कांग्रेस से त्याग पत्र देकर मुस्लिम लीग के सदस्य बन जाएं, तथा मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनाव लड़ंे। फिर चुने जाने पर वह पुनः कांग्रेस पार्टी में वापस आ जाएं। इस योजना के अंतर्गत चौधरी खलीकुज्जमाँ तथा नवाब मोहम्मद इस्माइल तथा अन्य कुछ मुस्लिम कांग्रेसियों ने कांग्रेस छोड़कर मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत भी गए।


मुस्लिम लीग के प्रधान मोहम्मद आली जिन्ना को नेहरू-रफी के इस षड्यंत्र का पता नहीं था। जिन्ना को भी विश्वास नहीं था कि निर्वाचन के बाद मुस्लिम लीग अपने दम पर सरकार बना सकेगी। इसलिए उसने कांग्रेसी-मुसलमानों को इस आशा से टिकट दिया कि निर्वाचन के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मिली-जुली सरकार उत्तर प्रदेश में बन सकेगी। ऐसी मिली-जुली सरकार बनाने की अन्य कांग्रेसी नेताओं की आंतरिक सहमति भी थी। इस तरह दोनों पार्टियों के बीच एक अलिखित समझौता था। किन्तु चुनाव के परिणामों ने सब गणित उलट दिया।


सन् 1937 के चुनाव में, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भारी बहुमत से विजयी हुई। वह अब, अकेले, अपने दम पर सरकार बना सकती थी। अब उसे मुस्लिम लीग के साझे की जरूरत नहीं थी। इसलिए जब जिन्ना ने दोनों पार्टियों की मिली-जुली सरकार बनाने की पेशकश की, तो जवाहर लाल नेहरू ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

नेहरू और किदवई की जोड़ी ने चौधरी खलीकुज्जमाँ तथा नवाब मोहम्मद इस्माइल को पुनः कांग्रेस में वापस लाने की कोशिश की। जब जिन्ना को उनकी चाल का पता लगा, तो उसे बहुत बुरा लगा। इनको पुनः कांग्रेस में वापस जाने से रोकने के लिए उसने जी-जान लगा दी।

नेहरू और किदवई की जोड़ी जब चौधरी खलीकुज्जमा तथा नवाब मोहम्मद इस्माइल को कांग्रेस में वापस न ला सकी, तो उसने मुस्लिम लीग के दूसरे निर्वाचित विधायकों पर डाका डाला। हाफ़िज़ मोहम्मद इब्राहिम को कांग्रेस में मंत्री बनाने का लालच देकर फोड़ लिया। वह मुस्लिम लीग छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए, और मंत्री बना दिये गए। आज़ादी के बाद भी हाफ़िज मोहम्मद इब्राहिम, नेहरू जी और इन्दिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री बने रहे।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू से ये अपेक्षित था कि वह देश में प्रजातन्त्र की गौरवमयी परंपरा प्रतिष्ठित करे,ं किन्तु दुर्भाग्य से उनमें दृष्टि का अभाव था। उन्होने तथा उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी ने देश में प्रजातन्त्र संपुष्ट करने के बजाए, उन्होने ऐसी नीतियां अपनाई, जिससे वह स्वयं तथा उनके बाद उनके परिवार सत्ता में बने रहें।


‘आयाराम और गयाराम’ में विधायक/सांसद ख़रीदे और बेचे जाते हैं। यह भारत के प्रजातंत्र के इतिहास का विद्रूप और व्यंग्य ही कहा जायेगा, कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू स्वयम् इस अनैतिक व्यवस्था के आदिजनक थे।



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